पिता के बदन को कफ़न बनाकर सो गई ‘गुड़िया’!

इंसानियत को झकझोर देने वाली ये तस्वीर देखकर दुनिया के हर पिता की आंखें नम हैं, हर बेटी सुबक रही है.

ज़िंदगी इतनी बेरहम कैसे हो सकती है? तक़दीर इतनी पत्थरदिल कैसे हो गई? बेटी को बचाने के लिए जान की बाज़ी लगाते पिता पर नदी की निष्ठुर लहरों को रहम क्यों नहीं आया? पिता के कंधों पर बच्चों का जनाज़ा और बच्चों के कंधों पर पिता की अंतिम यात्रा का दर्द कैसा होता है, ये तो हम सब जानते हैं, लेकिन इस तस्वीर में पिता की पीठ पर बेटी की अंतिम सांसें. कलेजा छलनी कर देने वाली इस तस्वीर में 23 महीने की वलेरिया अपने पिता ऑस्कर अलबर्टो मार्टिनेज रैमिरेज के कंधे पर हाथ रखकर हमेशा के लिए सो गई.

मेक्सिको की सरहद से अमेरिका में दाखिल होने की कोशिश करने वाले पिता ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि जिस मासूम को 23 महीने तक सीने से लगाकर दिन-रात प्यार किया, उसी लाडली की लाश उसकी पीठ पर होगी. अल सल्वाडोर का रैमिरेज करीब एक हफ्ते तक अमेरिका की सरहद से लगे मेक्सिको के शहर मतामोरोस में शरणार्थी कैम्प में रहा.

जब किसी भी तरह अमेरिका में शरण के लिए आवेदन की उम्मीद नहीं दिखी, तो उसने पत्नी तानिया और बेटी वलेरिया के साथ रियो ग्रांड नदी को तैरकर पार करने का फ़ैसला किया. रैमिरेज ने अपनी और परिवार की ज़िंदगीको बेहतर बनाने की उम्मीद में बेटी के साथ नदी में छलांग लगा दी.

पहली बार तो पिता और बेटी दोनों मौत के ख़तरे को पार कर गए. रैमिरेज ने बेटी वलेरिया को नदी के दूसरे छोर पर खड़ा कर दिया. पिता ने वादा किया कि उस पार खड़ी मां को भी जल्दी लेकर लौटेगा. पिता ने नदी में छलांग लगाई ही थी कि 23 महीने की मासूम भी पिता को देखकर नदी में कूद गई. उस बच्ची के लिए ये शायद खेल था, लेकिन पिता समझ गया कि बेटी की ज़िंदगी ख़तरे में है. वो बीच नदी की लहरों में ही वापस मुड़ा और बेटी को बचान के लिए उसके करीब पहुंचा. बच्ची तक पिता पहुंच गया और एक बार फिर उसे सुरक्षित पहुंचाने के लिए नदी पार करने लगा. बच्ची डूब ना जाए, इसलिए पिता ने उसे अपनी टी शर्ट के अंदर की ओर फंसा लिया. रैमिरेज को लगा कि पीठ का हिस्सा ऊपर की ओर ही रहेगा और इस तरह उसकी लाडली को कुछ नहीं होगा. मगर, कुछ ही देर में रैमिरेज ख़ुद ही डूबने लगा. नदी की बेरहम लहरों ने छटपटाते पिता को अपनी चपेट में ले लिया.

लाख कोशिशों के बावजूद रैमिरेज डूबने लगा. बच्ची को भी शायद एहसास होने लगा था कि पापा की ज़िंदगी खतरे में है. लिहाज़ा उसने अपने दाहिनी हाथ को पिता के कंधे पर रख लिया. बस यही आख़िरी कोशिश थी उस मासूम की. इसके बाद ना पिता बचा और ना बच्ची. दोनों नदी की लहरों से हार गए. जिस पिता की बाहों में कुछ देर पहले तक बच्ची मुस्कुरा रही थी, उसी पिता की टी-शर्ट को कफन बनाकर वो मासूम पिता की पीठ पर ही सो गई. लाचार पिता आख़िरी बार मासूम को सीने से भी नहीं लगा सका.

मेक्सिको से हर साल हजारों लोग गैरकानूनी ढंग से अमेरिका में दाखिल होने की कोशिश करते हैं, सिर्फ इसलिए कि उनकी आंखों में बेहतर जीवन का सपना होता है. अल सल्वाडोर के रहने वाले ऑस्कर अल्बर्टो मार्टिनेज रैमिरेज भी उन्हीं लोगों में से एक थे. रैमिरेज अपनी बेटी वलेरिया और पत्नी तानिया वनेसा एवलोस के साथ पिछले हफ्ते के आखिर में मेक्सिको के सरहदी शहर मतामोरोस पहुंचे थे ताकि वहां से अमेरिका जा सके और शरण के लिए आवेदन दे सकें. लेकिन इंटरनैशनल ब्रिज सोमवार तक बंद था. लिहाजा वो रविवार को पैदल ही नदी के किनारे तक पहुंचे. नदी का पानी पार करने लायक दिख रहा था.

उन्होंने फैसला किया कि नदी को तैरकर पार करेंगे. मासूम बेटी को पीठ पर लादा और तैरने लगे. पत्नी एवलोस भी एक फैमिली फ्रेंड की पीठ पर नदी पार कर रही थीं. बीच नदी से एवलोस और उनके फैमिली फ्रेंड ने लौटने का फैसला किया, क्योंकि नदी पार करना मुश्किल लग रहा था. लेकिन रैमिरेज अपने बेटी वलेरिया को लेकर आगे तैरते रहे. उनकी पत्नी ने बताया कि वो बुरी तरह थक चुके थे. किनारे पहुंचकर कुछ देर तक सांस ली और फिर पत्नी को लेने वापस आने ही वाले थे कि बेटी ने नदी में छलांग लगा दी. इसके बाद मेक्सिको की सरहद पर ही पिता और बेटी के सपने उनकी आंखों में हमेशा-हमेशा के लिए दम तोड़ गए.

यूनाइटेड नेशंस हाई कमिश्नर फॉर रिफ्यूजीज (UNHCR) की ओर से जारी रिपोर्ट के अनुसार 2018 में युद्ध और हिंसा समेत कई अन्य कारणों से 7 करोड़ से ज्यादा लोगों को अपना घर छोड़ने को मजबूर होना पड़ा है.
दुनिया के दो-तिहाई शरणार्थी यानी कुल शरणार्थियों में से 67 फीसदी शरणार्थी महज 5 देशों के नागरिक हैं.

शरणार्थियों की सबसे ज्यादा संख्या सीरिया से है जहां लंबे समय से हिंसा जारी है और पिछले साल 6.7 मिलियन यानी 67 लाख नागरिकों को इस कारण देश छोड़ना पड़ा. सीरिया के बाद अफगानिस्तान में (2.7 मिलियन), दक्षिणी सूडान में (2.3 मिलियन), म्यांमार में (1.1 मिलियन) और सोमालिया में (0.9 मिलियन) से सबसे ज्यादा नागरिकों को पलायन करना पड़ा. आज की तारीख में हर 5 में से 4 शरणार्थी कम से कम पिछले 5 साल से विस्थापित जीवन जी रहे हैं, जबकि हर 5 में से 1 शरणार्थी 20 साल या उससे ज्यादा समय से अपनी जड़ से दूर है.

भूमध्य सागर से यूरोपीय देशों में दाख़िल होने की कोशिश के दौरान समंदर में डूबकर मरने और लापता होने वाले लोगों का आंकड़ा हमेशा हर साल 3,000 से 5,000 के बीच ही रहा है. साल 2015 में मध्य पूर्व के देशों में अशान्ति और युद्ध के हालात से बचकर यूरोपीय देशों में दाख़िल होने की कोशिश करते हुए 340 से भी ज़्यादा बच्चों की मौत हो गई.

2018 में दुनिया के विभिन्न भागों में लापता या मारे जाने वाले शरणार्थियों की संख्या 1,319 है. सबसे ज्यादा मौतें भूमध्य सागर में हुईं, जहां अप्रैल के मध्य तक 798 लोग या तो मारे गये हैं या लापता हो गये हैं. ‘मिसिंग माइग्रेंट्स प्रोजेक्ट’ संस्था के अनुसार सन 2000 से लेकर 2018 लगभग 46,000 लोग शरण की आस में जान गंवा चुके हैं.

शरणार्थियों को रहने की इजाज़ देने के लिए अलग-अलग देशों में अपने-अपने नियम हैं. ये तो नहीं कहा जा सकता कि जितने भी शरणार्थी जहां रहना चाहते हैं, वहां उन्हें रहने दिया जाए, लेकिन हालात ऐसे बनाने चाहिए, जिससे या तो पलायन ना हो और अगर किसी वजह से पलायन हो रहा है, तो शरणार्थियों को बेहतर ज़िंदगी की आस में मौत ना मिले.