Latest Bharatvarsh News, हाईकोर्ट का यह फैसला 5 दिन पहले आ जाता तो नहीं गिरती बाबरी मस्जिद!
Latest Bharatvarsh News, हाईकोर्ट का यह फैसला 5 दिन पहले आ जाता तो नहीं गिरती बाबरी मस्जिद!

हाईकोर्ट का यह फैसला 5 दिन पहले आ जाता तो नहीं गिरती बाबरी मस्जिद!

राज्य सरकार और विहिप, दोनों अदालत से जल्दी फैसला चाह रहे थे. केंद्र सरकार की आरएसएस और बीजेपी से जो बातचीत चल रही थी, उसमें सबसे बड़ा मुद्दा यही था कि केंद्र सरकार अदालत से निवेदन करे कि वह 6 दिसंबर से पहले फैसला दे.
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ढांचा गंवाने के बाद हाईकोर्ट भी सक्रिय हुआ. जिस फैसले का सबको इंतजार था, वह 11 दिसंबर, 1992 को हाईकोर्ट ने सुनाया. अगर यह फैसला 5 रोज पहले आ जाता तो ढांचा बचाया जा सकता था. फैसले के बाद 6 दिसंबर की कारसेवा जायज हो जाती. राज्य सरकार ने विवादित इमारत के आस-पास जिस 2.77 एकड़ जमीन का अधिग्रहण किया था, हाईकोर्ट ने इस फैसले में उसे रद्द कर दिया. यह फैसला तीन नवंबर से रिजर्व था.

6 दिसंबर की कारसेवा से पहले राज्य सरकार, विहिप और बीजेपी नेताओं की सारी कवायद इसी बात को लेकर थी कि हाईकोर्ट 2.77 एकड़ पर फैसला 6 दिसंबर से पहले कर दे. अगर 2.77 एकड़ पर अधिग्रहण को कोर्ट जायज ठहराता तो यह जमीन राम जन्मभूमि न्यास के पास रहती. राज्य सरकार ने अधिग्रहण कर यह जमीन न्यास को दे दी थी. इसलिए इस पर कारसेवा जायज होती.

अगर अदालत रद्द करती तो भी 2.77 एकड़ जमीन में से 2.07 एकड़ जमीन पर मालिकाना राम जन्मभूमि न्यास के पास वापस चला जाता. क्योंकि अधिग्रहण से पहले यह जमीन न्यास की थी. न्यास ने अलग-अलग लोगों से यह जमीन खरीदी थी. यह हिस्सा न्यास के पास अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू होने से पहले से ही था. 2.77 एकड़ जमीन विवादित ढांचे से अलग थी. यानी इस जमीन पर होने वाली कारसेवा विवादित ढांचे से अलग होती. दोनों ही स्थितियों में होने वाली कारसेवा कानूनन जायज होती.

कल्याण सिंह ने बाद में मुझे बताया कि ढांचे से अलग कर मैंने 2.77 एकड़ जमीन को ‘सेफ्टी वाल्व’ बनाया था. अपने फैसले में हाईकोर्ट ने कहा, यह अधिग्रहण कायरतापूर्ण ढंग से किया गया था. इस अधिग्रहण से संविधान में निहित मौलिक अधिकारों का हनन होता है. इसी जमीन पर पहले भी कारसेवा हो चुकी थी. जमीन के इसी टुकड़े पर शिलान्यास भी हुआ था. जुलाई 1992 में हुई कारसेवा इसी 2.77 एकड़ जमीन पर हुई थी. उस वक्त चबूतरा यहीं बना था. इसी जमीन पर सुमित्रा भवन, फलाहारी बाबा का आश्रम, संकट मोचन मंदिर और राम गोपाल तिवारी की कुटिया थी. जिसकी न्यास ने अपने नाम रजिस्ट्री कराई थी. बाद में इन्हीं इमारतों को गिरा जमीन का समतलीकरण हुआ. न्यास ने ये सारी जमीनें अलग-अलग लोगों से खरीदी थीं.

राज्य सरकार ने इस अधिग्रहण की पहली अधिसूचना 7 अक्तूबर, 1991 को जारी की थी. इसके जरिए 1937 के बंदोबस्त खसरे के प्लाॅट नं. 159, 160, 170 और 172 के कुछ हिस्से को पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए अधिग्रहीत किया गया था. बाद में राज्य के पर्यटन सचिव आलोक सिन्हा ने अदालत में एक हलफनामा देकर कहा कि अधिग्रहीत जमीन पर मंदिर निर्माण भी पर्यटन को बढ़ावा देने का एक जरूरी हिस्सा है. यह जनहित की परिभाषा में आता है. राज्य सरकार ने अधिग्रहण के इरादे में यह बदलाव विवादित जमीन को न्यास को सौंपने के लिए किया था.

दस अक्तूबर, 1991 की अधिग्रहण की इस अधिसूचना को 17 अक्तूबर को मोहम्मद हाशिम ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी. इस पर सुनवाई करते हुए दस नवंबर, 1991 को हाईकोर्ट ने पहली नजर में अधिग्रहण को जायज करार दिया और उस पर कब्जा लेने की इजाजत दे दी. लेकिन हाईकोर्ट ने यह शर्त लगा दी कि इस जमीन पर कोई स्थायी निर्माण नहीं हो सकता. न ही यह जमीन किसी को हस्तांतरित की जा सकती है.

बाद में इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने भी कायम रखा. 1992 की जुलाई में अधिग्रहीत 2.77 एकड़ जमीन पर कारसेवा को लेकर विवाद उठा. हाईकोर्ट ने 14 जुलाई को इस जमीन पर कारसेवा रोकने का आदेश जारी किया. क्योंकि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ यहां चबूतरा (स्थायी निर्माण) बन रहा था. और राज्य सरकार ने जमीन का हस्तांतरण राम जन्मभूमि न्यास को कर दिया था. तब से यह मामला अटका रहा.

राज्य सरकार और विहिप, दोनों अदालत से जल्दी फैसला चाह रहे थे. केंद्र सरकार की आरएसएस और बीजेपी से जो बातचीत चल रही थी, उसमें सबसे बड़ा मुद्दा यही था कि केंद्र सरकार अदालत से निवेदन करे कि वह 6 दिसंबर से पहले फैसला दे. हाईकोर्ट ने फैसला दिया, पर 11 दिसंबर को-ढांचा गिरने के पांच दिन बाद.

(यह लेख वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा की किताब ‘युद्ध में अयोध्या’ से लिया गया है.)

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