तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

तिब्बत पहले भारत और चीन के बीच एक प्राकृतिक दीवार था, बफर जोन. अब तिब्बत का अस्तित्व मिट जाने के बाद चीन हमारे सिर पर खड़ा मिलता है. उत्तराखंड के चमोली से लेकर अरुणाचल के तवांग तक उसकी सड़कें भारतीय सीमा को छूती हैं. इस सरहद पर हर रोज हम चीनी घुसपैठ की खबरें पढ़ते हैं.
Himlayan Blunder of India over tibet with china, तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 10

तिब्बत के सवाल पर हमारे देश ने न जाने किस मजबूरी में भयंकर गलती की. बाद में इसे ही ‘हिमालयन ब्लंडर’ कहा गया. अब लाख चाहकर भी उसे सुधारा नहीं जा सकता. तिब्बत पहले भारत और चीन के बीच एक प्राकृतिक दीवार था, बफर जोन. अब तिब्बत का अस्तित्व मिट जाने के बाद चीन हमारे सिर पर खड़ा मिलता है. उत्तराखंड के चमोली से लेकर अरुणाचल के तवांग तक उसकी सड़कें भारतीय सीमा को छूती हैं. इस सरहद पर हर रोज हम चीनी घुसपैठ की खबरें पढ़ते हैं. सिर्फ वर्ष 2011 में ही चीनी सैनिकों ने 108 बार भारतीय सीमा लांघी. 2012 में पांच सौ से ज्यादा घटनाएं भारतीय सीमा में चीनी घुसपैठ और उत्पात की हैं. लॉकडाउन के दौरान चीन सैनिक लद्दाख के पैंग्याग घाटी में घुस कर बैठे है. सीमा पर दोनों ओर ज़बर्दस्त जमाव है.

हमने जो बोया उसे ही काट रहे हैं. यह गलती क्यों हुई? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है. जब जवाहरलाल नेहरू ने सन् 1935 में तिब्बत को स्वतंत्र देश कहा तो फिर चीनी हमले के बाद उनका रवैया क्यों बदला? हमले के बाद नेहरू ने भी वही कहा, जो माओत्से तुंग का दावा था. दोनों ने तिब्बत को चीन का आंतरिक मामला कहा. हम हिंदी-चीनी भाई-भाई का राग अलाप रहे थे और चीन धोखे से हम पर हमले की तैयारी कर रहा था.

हमला किया भी. हम हारे. वर्ष 1962 में चीनी हमले का असर मानसरोवर यात्रा पर पड़ा. चीन ने यात्रा पर रोक लगा दी. हम अपने कैलास से वंचित हुए. 1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी तो उसके विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कैलास मानसरोवर यात्रा खोलने के लिए चीन सरकार से कई दौर की बात की. सरकार चली गई, पर डॉ सुब्रह्मण्यम स्वामी इस कोशिश में लगे रहे. उनकी अथक कोशिशों के बाद तबके वाइस प्रीमियर देंग शियाओ पेंग की सरकार ने यात्रा के लिए विशेष परमिट जारी करने की इजाजत दी. बीस यात्रियों का पहला जत्था डॉ. सुब्रह्मण्यम स्वामी के नेतृत्व में ही कैलास गया. उसमें हरीश रावत भी थे. तब से यह यात्रा जारी है; पर एक खास परमिट पर, जिसे ‘नत्थी वीजा’ कहते हैं.

Himlayan Blunder of India over tibet with china, तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

आज भी भारत से आए लोगों के प्रति तिब्बतियों में सहज आत्मीयता होती है, उम्मीद भी. तकलाकोट में हम अपने तिब्बती ड्राइवर दोरजी से चीनी उत्पीड़न की कथा सुनने की कोशिश कर रहे थे. वे कुछ-कुछ बता भी रहे थे. बातचीत में उन्हें पता चला कि मैं बनारस का हूं. रिनपोछेजी को जानता हूं. उनसे मिला हूं. दोरजी का व्यवहार एकदम बदल गया. वह मेरे हाथ चूमने लगे. उनकी आंखों में झर-झर आंसू थे. ढलती शाम के एकांत में दूर ले जाकर वह मुझसे सारनाथ और रिनपोछे के बारे में पूछने लगे. तिब्बती हारारकी में रिनपोछे दलाईलामा के बाद आते हैं तब रिनपोछे जी तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री थे. जब मैंने उन्हें बताया कि मैं दलाई लामा से भी मिला हूं, तो वह चमत्कृत हो एकदम मुझे देखने लगे. यकायक मेरे सामने साष्टांग लेट गए. मैं सकते में था. तिब्बत की इस पीढ़ी ने दलाई लामा को नहीं देखा है, केवल सुना और पढ़ा है. दलाई लामा उनके लिए किंवदंती हैं. दलाई लामा उनके देवता हैं. और वह शायद मुझमें देवदूत देखने लगे.

कुछ ही दूर पर चीनी सैनिक खड़े थे. यहां दलाई लामा की बात करना, फोटो रखना बगावत समझा जाता है और सजा का प्रावधान है. मैं भयभीत हुआ. अजीब मुसीबत गले पड़ी. मैंने उसे उठाया, गले से लगाया, समझाया; पर लगातार इस बात का ध्यान रख रहा था कि उस सैनिक को कुछ समझ में न आए. मैंने दोरजी को समझाया, ‘‘रिनपोछेजी बचपन से हमें जानते हैं. वे मेरे घर आते रहे हैं. मेरे पिता के अनन्य मित्रों में हैं. वे मेरी शादी की बारात में गए थे. हम आने से पहले उनसे बात करके आए हैं, जाकर फिर बात करेंगे.’’

दोरजी भावुक हो चले. वे समझ के पार चले गए थे. मुझे वहीं खड़ा कर कहीं गुम हो गए. मैं गाड़ी के पास चीनी सैनिकों पर नजर रखे खड़ा था. तब तक कुछ सैनिक और आ गए थे. थोड़ी ही देर में उस निर्जन स्थान में न जाने कहां से 20-25 लामा एक साथ और प्रकट हो गए. कोई मेरा हाथ चूम रहा था, कोई माथा. कोई मुझसे अपना माला स्पर्श करा रहा था. कोई खुद स्पर्श कर भाव-विभोर हो रहा था. मेरे लिए यह अजीब उलझन भरी स्थिति थी.

Himlayan Blunder of India over tibet with china, तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

मैं आया था यहां दर्शनार्थी बनकर और वे मेरे ही दर्शन कर कृतकृत्य हो रहे हैं. उनकी आस्था देख मेरी बेचैनी और बढ़ रही थी. दलाई लामा और रिनपोछे सहित अपने शीर्ष धार्मिक नेताओं के प्रति ऐसा समर्पण देख मुझे लगा, अब मैं यहां से खिसक लूं, वरना भावुकता में लामा कुछ भी कर सकते हैं. कहीं चीनी सैनिक मुझे भेदिया या घुसपैठिया न समझ लें, जिस पर लामा बिरादरी लट्टू है. घबराहट में लंबे-लंबे डग भरता मैं रेस्ट हाउस में लौट आया. लेकिन अपने नेताओं के लिए उनकी यह आस्था मुझे रास्ते भर झकझोरती रही.

मौजूदा दलाई लामा तेनजिन ग्यात्सो 14वें दलाई लामा हैं. लामा व्यवस्था में दलाई लामा ही तिब्बत के राष्ट्राध्यक्ष होते हैं और आध्यात्मिक गुरु भी. चीनी हमले से पहले तिब्बत में यही व्यवस्था लागू थी. दलाई लामा मंगोलियाई पदवी है, जिसका मतलब है ‘ज्ञान का सागर’. तिब्बत में दलाई लामा को बुद्ध का अवतार मानते हैं, इस लिहाज से वर्तमान दलाई लामा बुद्ध के 74वें अवतार हैं. वे तिब्बत के लोगों की वास्तविक आवाज हैं. दुनिया भर में तिब्बती उनकी पूजा करते हैं. लोगों की ऐसी श्रद्धा पूरी दुनिया में किसी और जीवित व्यक्ति के लिए नहीं दिखती. आज भी तिब्बत में उनका सम्मान सिर्फ सर्वोच्च धार्मिक नेता का नहीं है. लोग उन पर मर-मिटने को तैयार हैं.

बौद्ध धर्म की महायान शाखा को माननेवाला तिब्बती समाज मूलत: यायावर प्रकृति का रहा है. धीरे-धीरे इसका विकास एक ऐसे समाज के रूप में हुआ, जहां भूमि तो राज्य की थी, पर वह संपत्ति के रूप में सरकार, मठों और अभिजात वर्गों के पास थी.

मन ज्ञान के परे भाग रहा था. सीमाओं में बंटी भूमि हमसे छूटी जा रही थी. हम अपने ही यहां देव की धरा को अब अपना नहीं कह सकते. श्रद्धालु बनकर आए थे, परदेसी बनकर लौटने के लिए विवश थे. हम मानसरोवर से वापस लौट रहे थे. हमारा कैलास हमसे छूटा जा रहा था.

जारी … काश न आता वो बर्फानी तूफान तो Kailash इलाका Kashmir की हिंदू रियासत में होता, पढ़िए जोरावर कथा

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