एक देश एक भाषा पर इतना बवाल क्यों?

हमें हिंदी को अपने गर्व की भाषा बनाना होगा. इसे राष्ट्र की भाषा बनाना होगा.

हिंदी दिवस बीत गया. इस मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की एक बात जेहन में घर कर गई. उन्होंने एक देश, एक भाषा की बात उठाई. यह भी कहा कि आज पूरे देश को एकता की डोर में बांधने का काम अगर कोई एक भाषा कर सकती है, तो वह सर्वाधिक बोली जाने वाली हिंदी भाषा ही है. उन्होंने एक देश, एक भाषा के स्वप्न के संदर्भ में महात्मा गांधी और सरदार पटेल का भी नाम लिया.

अमित शाह इतिहास का एक जीवंत सच बता रहे थे. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बीड़ा हिंदी भाषी नेताओं ने नहीं बल्कि महात्मा गांधी, रवीन्द्र नाथ टैगोर, सी. राजगोपालाचारी, सरदार पटेल और सुभाषचन्द्र बोस सरीखे गैर-हिंदी भाषी नेताओं ने उठाया था. ये सभी हिंदी भाषी प्रदेशों से न होते हुए भी हिंदी की ताकत से वाकिफ थे.

महात्मा गांधी देश भर में अपने भाषण हिंदी या हिंदुस्तानी में ही दिया करते थे. सुभाषचन्द्र बोस ने आजाद हिंद फौज की स्थापना की तो अलग अलग राज्यों के सैनिकों को जोड़ने का काम हिंदी के माध्यम से ही किया. गांधीजी ने आज़ादी से पहले ही अहिंदी भाषी राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में हिंदी प्रचारिणी सभाएं बनाईं.

वैसे मैं हिंदी को किसी एक दिन के दायरे में बांधने के पक्ष में कभी नही रहा. मेरे जेहन में ये सवाल हमेशा ही दस्तक देता आया है कि आखिर ये हिंदी दिवस मनाने की जरूरत क्यों आन पड़ी? दिवस तो उसके होते हैं जो साल में एक बार आता हो. पर हिंदी तो सतत प्रवाहिनी है. दिन-रात-सुबह-शाम, हमारे होठों पर होती है. जिनके होंठों पर नही होती, उनकी चेतना में होती है. उनके स्वप्न में होती है. छायाओं में होती है. हिन्दी जो हमारी अस्मिता का बोध है. जो हमारी मातृभाषा है. जो हमारी सोच की रगो में लहू बनकर बहती है. जो हमारी आजीविका का साधन है. जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है. आखिर उसका दिवस मनाने का ये चोचला क्यों?

इस देश में हमें हिंदी ही मिली थी सरकारी औपचारिकताओं के हथौड़े से कूचने के लिए! हिन्दी तो इस देश की आत्मा है फिर उसे सरकारी फ़ाइलों से क्यों जूझना पड़ रहा है? आखिर अमित शाह एक देश एक भाषा के जिस सपने के बारे में बात कर रहे हैं क्या वह कोई अपवाद है? क्या विश्व में कभी ऐसा हुआ है? क्या कभी किसी और देश ने ऐसा संकल्प लिया है? अगर लिया तो उसके नतीजे क्या हुए? इतिहास बहुत से सवालों का जवाब होता है. इस सवाल के जवाब के लिए भी मैं आपको इतिहास की गलियों में ले चलता हूं.

आज मैं आपको एक मृत भाषा को रातों-रात राजभाषा बनाने के संकल्प की कहानी सुनाता हूँ. देश ऐसे ही संकल्पों से चलते है. दक्षिणपूर्व भूमध्य सागर के पूर्वी छोर पर एक देश है इजरायल. इसके उत्तर में लेबनॉन, पूर्व में सीरिया और जॉर्डन तथा दक्षिण-पश्चिम में मिस्र है. 20 हजार वर्ग किमी के क्षेत्रफल वाला यह देश दुनिया भर में हमेशा सुर्खियों में बना रहता है. इजरायल की स्थापना 14 मई 1948 में हुई थी. इससे पहले इजरायल नाम के किसी देश का कोई अस्तित्व नहीं था. यहूदियों पर उस्मान साम्राज्य राज करता था.

प्रथम विश्व युद्ध के दौरान 1917 में उस्मान साम्राज्य का पतन हो गया. अलग देश की माँग उठी और ब्रिटेन फिलिस्तीन पर राज करने लगा. अंग्रेजों ने बेलफोर्स घोषणा (ब्रिटिश विदेश मंत्री Balfour) कर के यहूदियों के लिए अलग देश की मांग का समर्थन किया.

ब्रिटिश राज ने यूएन से यहूदी-फ़िलिस्तीन झगड़े का हल निकालने को कहा. नवंबर 1947 में यूएन ने फिलिस्तीन को तीन हिस्सों में बांटने का फैसला लिया. पहला हिस्सा यहूदियों को, दूसरा अरब को और तीसरा येरुशलम. 14 मई 1948 में अंग्रेजी राज खत्म हो गया और इजरायल ने खुद को एक आजाद देश घोषित कर दिया. 12 मई 1948 को इजराइल की स्वतंत्रता का घोषणापत्र पर हस्ताक्षर करने वाले नेता थे- डेविड बेन-गुरियन, मोशे शॅरेड, पेरेज बर्नस्टीन, हेम-मोशे शपीरा, मॉर्डचाई बेंटोव, अहरोन ज़िसलिंग.

डेविड बेन-गुरियन इजरायल के संस्थापक और पहले प्रधानमन्त्री थे. वे एक कट्टर यहूदी राष्ट्रवादी थे. यहूदी संस्कृति बहुत पुरानी थी. उनकी भाषा *हिब्रू* लगभग 3000 साल पुरानी थी. पर संस्कृत कि तरह वह मृत भाषा हो गयी थी. बोल चाल में भी नही थी. चलन की बात ही छोड़िए. हिब्रू भाषा के पुनरुद्धार की कहानी असाधारण है. यह इतिहास में अद्वितीय है.

प्रधानमंत्री बनते ही गुरियन ने अपने सहयोगियों से पूछा अगर हिब्रू को राजभाषा बनाना हो तो कितना वक़्त लगेगा? अफसरो ने कहा वक़्त लगेगा क्योंकि हिब्रू तो चलन में नही है. गुरियन ने कहा कल सुबह से हिब्रू इस देश की राजभाषा होगी. दूसरे रोज सुबह हिब्रू को राजभाषा का दर्जा दे दिया. अरबी को विशेष भाषा के दर्जे के साथ.

आज हिब्रू इजरायल की सरकार, वाणिज्य, अदालत, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इस्तेमाल की जाने वाली आधिकारिक भाषा है. यह इजरायल में रोजमर्रा की जिंदगी में सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली भाषा है. 90 लाख से अधिक लोग हिब्रू बोलते हैं, जिनमें से अधिकतर की यह मातृभाषा है. हिब्रू के इजरायल की राजभाषा बनने की कहानी प्रखर राष्ट्रवाद और दृढ़ इच्छा शक्ति की कहानी है. अब यहां से अपने देश की सीमा में प्रवेश करते हैं.

हम भी लगभग उसी वक़्त आज़ाद हुए थे. हमने खुद से हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की मियाद पन्द्रह साल के भीतर तय कर दी और आज तक नही कर पाए. केवल हिन्दी दिवस मनाकर संतोष कर रहे है. हिंदी का ये दर्द कवियों के कलेजे में उतरा. उनके ह्दय का शूल बन गया. आधुनिक हिंदी साहित्य के आदि पुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो उन्नति की सभी

ऋंखलाओं को ही हिंदी की उन्नति से जोड़ दिया. उन्होंने लिखा-

“निज माषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल.”

राष्ट्रकवि मैथलीशरण गुप्त के भीतर हिंदी को लेकर उठी कसक व्यवस्था की जड़ता और नाकारेपन के विरूद्ध विद्रोह की शक्ल ले सामने आई-

“जिसको न निज देश और निज भाषा का अभिमान है.
वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है.”

कबीर दास भी लोकभाषा की इस ताकत को पहचानते थे. इसीलिए वे आज से करीब पांच सौ साल पहले लिख गए थे-

‘संस्कृत कबीरा कूप जल, भाषा बहता नीर’

रहीम ने भी अपने दोहे में बानी की जिस मिठास का जिक्र किया था, वही मिठास हिंदी का प्राण तत्व है.

“बानी ऐसी बोलिये, मन का आपा खोय,
औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय”

लोकभाषा में रचकर रामकथा को अमर बना देने वाले तुलसी भी भाषा की इसी पहचान पर अपनी कलम का अमृत चिन्ह अंकित कर गए-

“सरल बरन भाषा सरल, सरल अर्थमय मानि,
तुलसी सरले संतजन, ताहि परी पहिचानि”

अर्थात्, तुलसीदास जी कहते हैं कि जो सरल भाषा और सरल हृदय के संत जन हैं, उनको इसकी पहचान हो गयी है. तुलसी ने जिस पहचान का जिक्र किया था, वही पहचान हिंदी के अस्तित्व के साथ घुलकर शाश्वत हो गई है. केशवदास ने भी ऐसी ही गुणकारी भाषा में अपनी लेखनी का जीवन रस घोल दिया.

“भाषा बोलि न जानहिं, जिनके कुल के दास,
भाषा कवि भो मंदमति, तेहि कुल केशवदास”

हिंदी कविता की महानता के शलाका पुरूष भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा है-

“जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख.
और इसके बाद भी, हमसे बड़ा तू दिख.”

भवानी दादा की कलम से निकले ये शब्द हिंदी के बड़प्पन का हिमालय हैं. इस हिमालय के आगे तमाम भाषायी पर्वत बौने साबित होते हैं. वास्तव में, भाषा अभिव्यक्ति का ज़रिया है पर ये अभिव्यक्ति तब पूरी होती है, जब बोलने वाला जो कहे, वही सुनने वाला समझे भी. भाषा वक्ता और श्रोता के बीच का सेतु है. इस सेतु में अगर कोई खोट आ गई तो अभिव्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त होगी ही. यानी भाषा की पहली और अनिवार्य शर्त है उसकी संप्रेषणीयता.

गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि सुर नर मुनि की यही सब रीति, स्वार्थ लाग करहिं सब प्रीति. भाषा भी इससे अछूती नहीं है. अगर वो आपकी स्वार्थ सिद्धि का जरिया है, आपके विकास और पहचान का जरिया है तो सब उसे आसानी से अपनाएंगे. हिंदी जिस रोज़ हमारे रोजगार, हमारे आत्मसम्मान, हमारे उत्थान का जरिया बन जाएगी, उसकी ताकत अलौकिक हो जाएगी.

अमित शाह हिंदी के इसी गौरव की बात कर रहे हैं. वे हिंदी की इसी ताकत को देश की ताकत बनाने के संकल्प का मुद्दा उठा रहे हैं. आप इस संकल्प का समर्थन कर सकते हैं. इसका विरोध कर सकते हैं पर इसे खारिज कदापि नही कर सकते. ये तो समय का सत्य है और समय के सत्य कभी खारिज नही किए जा सकते. आज हिंदी देश के एक बड़े हिस्से के संवाद की भाषा है.

भौगोलिक विविधताओं के बावजूद हिंदी का संसार बेहद व्यापक है. हिंदी समझने वाले आपको कश्मीर के कन्याकुमारी से लेकर नार्थ ईस्ट के पहाड़ी इलाकों और कन्याकुमारी के समुद्री तटों तक मिल जाएंगे. ये स्थिति तब है जबकि इस देश पर सैकड़ों सालों तक विदेशी आक्रांताओं ने राज किया. इतिहास में अरबी-फारसी, तुर्की, पश्तो से लेकर उर्दू और अंग्रेजी तक भाषाई संस्कारों की एक नही अनेक लहरें उठीं. पर हिंदी ने न तो किसी भाषा का विरोध किया, न किसी से टकराई, न ही बगावत की. सभी को अपने भीतर समाहित करती गई.

दरअसल हिंदी की ताकत ही वही है जो हिंदुस्तान की है. हिंदी महज भाषा नही, बल्कि इस मुल्क की सनातन परंपरा की शाश्वत अभिव्यक्ति है. “संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्”, हिंदी इसी मूलमंत्र का जाप करते हुए इतिहास की जमीन पर आगे बढ़ती गई.

मैं समझता हूं कि हिंदी भाषा को व्यापक और जनता तक पहुंचाने का काम अखबारों ने ज्यादा किया. आधुनिक हिंदी के जन्मदाता भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर आज तक नए शब्दों के साथ हिंदी को विस्तार अखबारों ने ही दिया. पंडित बाबू राव विष्णु पराड़कर ने हिंदी के अनेक शब्द अखबार के जरिए ही दिए. पराड़कर जी के बाद हिंदी शब्द संपदा को बढ़ाने वाले संपादक थे प्रभाष जोशी. उन्होंने बोलियों से शब्द उठाकर नई भाषा गढी. भाषा की जड़ता खत्म कर उसे लोक से जोड़ा. भाषा शब्दकोष से बाहर आई. हिंदी समाज को स्वाभिमान दिया.

मुग़लकाल से पहले अदालत और दफ्तरों के काम ज्यादातर हिन्दी में होते थे, लेकिन अकबर के समय में राजा टोडरमल ने दफ्तर के कामकाज को हिन्दी से फारसी में कर लिया. इसके चलते कचहरी एवं दफ्तरों का काम फारसी में होने लगा. इससे भी प्रचुर अरबी फारसी आदि के शब्दों का प्रचार जन-साधारण और हिन्दी में हुआ. कानून एवं अदालत सम्बन्धी सैकडों पारिभाषिक शब्द व्यवहार में आने लगे.

हिंदी वास्तव में राजभाषा बन सकी है या नही, ये एक बहस का विषय है, मगर इस तथ्य में दो राय नही है कि हिंदी अब व्यवहारिक तौर पर इस देश की संपर्क भाषा या जन भाषा बन चुकी है. अब तो भारत के साथ संपर्क रखने के लिए हिंदी की अनिवार्यता विदेशी सरकारें भी महसूस कर रही हैं. इसीलिए अमरीका, चीन, यूरोप तथा अन्य प्रमुख देशों में हिंदी के अध्ययन की व्यवस्था की जाने लगी है.

भाषा का भविष्य इस्तेमाल करने वालों के चरित्र और पुरुषार्थ से भी जुड़ा होता है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दुनिया में हिंदी की प्रसिद्धि का तात्कालिक कारण हैं. संस्कृत अपने समय की कालजयी भाषा रही. विश्व की तमाम भाषाएं संस्कृत से प्रेरित और प्रभावित होती रहीं. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा का काल 500 ई. पू. से 1000 ई. के बीच है. इसमें पालि, प्राकृत, अपभ्रंश का भी हिस्सा है.

भगवान बुद्ध के सारे उपदेश पालि में ही हैं जबकि भगवान महावीर के सारे उपदेश प्राकृत में हैं. मगर हिंदी इन सभी के बीच का पुल बन चुकी है. हिंदी में संस्कृत भी घुली हुई है. पालि भी. प्राकृत, अपभ्रंश और यहां तक उर्दू और इंग्लिश भी. संपूर्ण विश्व में इतनी उदार भाषा कहीं नही मिलेगी जो आने वाले हर मेहमान का गले लगाकर स्वागत करती हो. जिसे किसी से कोई विभेद न हो. कोई द्वेष न हो. जो सबकी हो जाए और सबको अपना बना ले. ऐसी हिंदी को किसी दिवस विशेष की सीमा में बांधा जा सकता है क्या?

हमें हिंदी को अपने गर्व की भाषा बनाना होगा. इसे राष्ट्र की भाषा बनाना होगा. हिंदी जिस भी रोज, राष्ट्र भाषा के सिंहासन पर सुशोभित हो हमारा गर्व बन जाएगी, हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र हो जाएंगे. अंग्रेजी के रौले के आगे झुकी हुई गदर्नें हिंदी का अभिशाप हैं. हमें इस अभिशाप को वरदान में बदलना होगा. हमारी, बोली, भाषा, विचार, चेतना सब पर हिंदी का कर्ज है. इस कर्ज को उतारे बगैर हम कभी मुक्त नही हो सकते. कभी सुखी नही हो सकते. तुलसीदास जी कह गए हैं, “पराधीन सपनेहु सुख नाहि.” सत्य बस इतना ही है कि देह के पराधीनों को सपने में भी सुख नसीब नही हो सकता है और भाषा के पराधीनों को जन्मों में भी नही.