हिन्दी सिर्फ़ भाषा नहीं, हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा, क्यों नहीं मिल सकता राष्ट्रभाषा का दर्जा?

14 सितंबर को हर साल हम ‘हिंदी दिवस’ मनाते है. आखिर यह हिंदी दिवस मनाने की जरूरत क्यों है? दिवस तो उसके होते हैं, जो साल में एक बार आता हो. पर हिंदी तो सतत प्रवाहिनी है. दिन-रात, सुबह-शाम हमारे होंठों पर होती है.
Hindi is not the only language, हिन्दी सिर्फ़ भाषा नहीं, हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा, क्यों नहीं मिल सकता राष्ट्रभाषा का दर्जा?

जब एक रोज़ में कश्मीर में धारा 370 ख़त्म हो सकती है. कुछ महीनों में पॉंच सौ साल के बाबरी विवाद का पटाक्षेप हो मंदिर निर्माण का काम शुरू हो सकता है. तो सिर्फ़ एक फ़ैसले से हिन्दी को राष्ट्रभाषा का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सकता, यह इच्छा शक्ति का मामला है. इस मामले में मुझे इस सरकार से उम्मीद है. सत्तर बरस से सरकारें हिन्दी के सवाल पर देश को बेवकूफ बनाती रही हैं. इस गणतंत्र के पास राष्ट्रीय ध्वज है, राष्ट्रीय चिन्ह है, राष्ट्रीय पशु है, राष्ट्रीय पक्षी है पर राष्ट्रभाषा नहीं है.

हिन्दी सिर्फ़ भाषा नही. हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा है. हमारी अस्मिता का सवाल है. जो पूरे देश को एकता के सूत्र में बाँधती है. 14 सितंबर को हर साल हम ‘हिंदी दिवस’ मनाते है.आखिर यह हिंदी दिवस मनाने की जरूरत क्यों है ? दिवस तो उसके होते हैं, जो साल में एक बार आता हो. पर हिंदी तो सतत प्रवाहिनी है. दिन-रात, सुबह-शाम हमारे होंठों पर होती है. जिनके होंठों पर नहीं होती, उनकी चेतना में होती है, उनके स्वप्न में होती है, छायाओं में होती है.

हिंदी, जो हमारी अस्मिता का बोध है, जो हमारी मातृभाषा है, जो हमारी सोच की रगों में लहू बनकर बहती है, जो हमारी आजीविका का साधन है, जो दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है. आखिर उसका दिवस मनाने का यह चोंचला क्यों? इस देश में हमें हिंदी ही मिली थी सरकारी औपचारिकताओं के हथौड़े से कूटने के लिए! हिंदी तो इस देश की आत्मा है, फिर उसे सरकारी फाइलों से क्यों जूझना पड़ रहा है?

आज मैं आपको एक मृत भाषा के रातोंरात राजभाषा बनने के संकल्प की कहानी सुनाता हूँ. देश ऐसे ही संकल्पों से चलते हैं. दक्षिण-पूर्व भूमध्य सागर के पूर्वी छोर पर एक देश है—इजराइल. इसके उत्तर में लेबनान, पूर्व में सीरिया और जॉर्डन तथा दक्षिण-पश्चिम में मिस्र है. 20 हजार वर्ग कि.मी. के क्षेत्रफलवाला यह देश दुनिया भर में हमेशा सुर्खियों में बना रहता है. इजराइल की स्थापना 14 मई, 1948 को हुई थी. इससे पहले इजराइल नाम के किसी देश का कोई अस्तित्व नहीं था. यहूदियों पर उस्मान साम्राज्य राज करता था. प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान 1917 में उस्मान साम्राज्य का पतन हो गया. अलग देश की माँग उठी और ब्रिटेन फिलिस्तीन पर राज करने लगा. अंग्रेजों ने बेलफोर्स घोषणा (ब्रिटिश विदेश मंत्री Balfour) करके यहूदियों के लिए अलग देश की माँग का समर्थन किया.

ब्रिटिश राज ने यू.एन. से यहूदी-फिलिस्तीन झगड़े का हल निकालने को कहा. नवंबर 1947 में यू.एन. ने फिलिस्तीन को तीन हिस्सों में बाँटने का फैसला लिया. पहला हिस्सा यहूदियों को, दूसरा अरब को और तीसरा येरुशलम को. 14 मई, 1948 में अंग्रेजी राज खत्म हो गया और इजराइल ने खुद को एक आजाद देश घोषित कर दिया. 12 मई, 1948 को इजराइल के स्वतंत्रता के घोषणा-पत्र पर हस्ताक्षर करनेवाले नेता थे—डेविड बेन-गुरियन, मोशे शॅरेड, पेरेज बर्नस्टीन, हेम-मोशे शपीरा, मॉर्डचाई बेंटोव, अहरोन जिसलिंग.

डेविड बेन-गुरियन इजराइल के संस्थापक और पहले प्रधानमंत्री थे. वे एक कट्टर यहूदी राष्ट्रवादी थे. यहूदी संस्कृति बहुत पुरानी थी. उनकी भाषा ‘हिब्रू’ लगभग 3,000 साल पुरानी थी, पर संस्कृत की तरह वह मृत भाषा हो गई थी. बोलचाल में भी नहीं थी, चलन की बात ही छोड़िए. हिब्रू भाषा के पुनरुद्धार की कहानी असाधारण है. यह इतिहास में अद्वितीय है. प्रधानमंत्री बनते ही गुरियन ने अपने सहयोगियों से पूछा, “अगर हिब्रू को राजभाषा बनाना हो तो कितना वक्त लगेगा?” अफसरों ने कहा, “वक्त लगेगा, क्योंकि हिब्रू तो चलन में नहीं है.” गुरियन ने कहा, “कल सुबह से हिब्रू इस देश की राजभाषा होगी.” दूसरे रोज सुबह हिब्रू को राजभाषा का दर्जा दे दिया गया. अरबी को विशेष भाषा के दर्जे के साथ.

आज हिब्रू इजराइल की सरकार, वाणिज्य, अदालत, स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इस्तेमाल की जानेवाली आधिकारिक भाषा है. यह इजराइल में रोजमर्रा की जिंदगी में सबसे अधिक इस्तेमाल की जानेवाली भाषा है. 90 लाख से अधिक लोग हिब्रू बोलते हैं, जिनमें से अधिकतर की यह मातृभाषा है. हिब्रू के इजराइल की राजभाषा बनने की कहानी प्रखर राष्ट्रवाद और दृढ़ इच्छाशक्ति की कहानी है.

हम भी लगभग उसी वक्त आजाद हुए थे. हमने खुद से हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने की मियाद पंद्रह साल की तय कर ली, लेकिन आज तक नहीं बना पाए. केवल हिंदी दिवस मनाकर संतोष कर रहे हैं. हिंदी का यह दर्द कवियों के कलेजे में उतरा. उनके हृदय का शूल बन गया. आधुनिक हिंदी साहित्य के आदिपुरुष भारतेंदु हरिश्चंद्र ने तो उन्नति की सभी शृंखलाओं को ही हिंदी की उन्नति से जोड़ दिया. उन्होंने लिखा—निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल. बिन निज भाषा ज्ञान के मिटत न हिय को शूल॥

Hindi is not the only language, हिन्दी सिर्फ़ भाषा नहीं, हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा, क्यों नहीं मिल सकता राष्ट्रभाषा का दर्जा?
राष्ट्रकवि मै‌थलीशरण गुप्त के भीतर हिंदी को लेकर उठी कसक व्यवस्था की जड़ता और नाकारापन के विरुद्ध विद्रोह की शक्ल में सामने आई—“जिसको न निज देश और निज भाषा का अभिमान है. वह नर नहीं नर पशु निरा और मृतक समान है.”

कबीरदास भी लोकभाषा की इस ताकत को पहचानते थे. इसीलिए वे आज से करीब पाँच सौ साल पहले लिख गए—“संस्कृत कबीरा कूप जल, भाषा बहता नीर.” रहीम ने भी अपने दोहे में बानी की जिस मिठास का जिक्र किया था, वही मिठास हिंदी का प्राणतत्त्व है—“ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय. औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय॥”

लोकभाषा में रचकर रामकथा को अमर बना देनेवाले तुलसी भी भाषा की इसी पहचान पर अपनी कलम का अमृत-चिह्न‍ अंकित कर गए—“सरल बरन भाषा सरल, सरल अर्थमय मानि. तुलसी सरले संतजन, ताहि परी पहिचानि॥” तुलसीदासजी कहते हैं कि जो सरल भाषा और सरल हृदय के संत जन हैं, उनको इसकी पहचान हो गई है. तुलसी ने जिस पहचान का जिक्र किया था, वही पहचान हिंदी के अस्तित्व के साथ घुलकर शाश्वत हो गई है.

केशवदास ने भी ऐसी ही गुणकारी भाषा में अपनी लेखनी का रस घोल दिया—“भाषा बोलि न जानहिं, जिनके कुल के दास. भाषा कवि भो मंदमति, तेहि कुल केशवदास॥” हिंदी कविता की महानता के शलाका पुरुष भवानी प्रसाद मिश्र ने लिखा—“जिस तरह हम बोलते हैं, उस तरह तू लिख और इसके बाद फिर, हमसे बड़ा तू दिख.”

भवानी दादा की कलम से निकले ये शब्द हिंदी के बड़प्पन का हिमालय हैं. इस हिमालय के आगे तमाम भाषायी पर्वत बौने साबित होते हैं. वास्तव में, भाषा अभिव्यक्ति का जरिया है, पर यह अभिव्यक्ति तब पूरी होती है, जब बोलनेवाला जो कहे, वही सुननेवाला समझे भी. भाषा वक्ता और श्रोता के बीच का सेतु है. इस सेतु में अगर कोई खोट आ गई तो अभिव्यक्ति दुर्घटनाग्रस्त होगी ही, यानी भाषा की पहली और अनिवार्य शर्त है, उसकी संप्रेषणीयता.

गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा है कि सुर नर मुनि की यही सब रीति, स्वार्थ लाग करहिं सब प्रीति. भाषा भी इससे अछूती नहीं है. अगर वह आपकी स्वार्थ सिद्धि का जरिया है, आपके विकास और पहचान का जरिया है, तो सब उसे आसानी से अपनाएँगे. हिंदी जिस रोज हमारे रोजगार, हमारे आत्मसम्मान, हमारे उत्थान का जरिया बन जाएगी, उसकी ताकत अलौकिक हो जाएगी.

आज हिंदी देश के एक बड़े हिस्से के संवाद की भाषा है. भौगोलिक विविधताओं के बावजूद हिंदी का संसार बेहद व्यापक है. हिंदी समझनेवाले आपको कश्मीर से लेकर उत्तर-पूर्व के पहाड़ी इलाकों और कन्याकुमारी के समुद्री तटों तक मिल जाएँगे. यह स्थिति तब है, जब कि इस देश पर सैकड़ों सालों तक विदेशी आक्रांताओं ने राज किया. इतिहास में अरबी-फारसी, तुर्की, पश्तो से लेकर उर्दू और अंग्रेजी तक भाषायी संस्कारों की एक नहीं, अनेक लहरें उठीं. पर हिंदी ने न तो किसी भाषा का विरोध किया, न किसी से टकराई, न ही बगावत की. सभी को अपने भीतर समाहित करती गई. दरअसल हिंदी की ताकत भी वही है, जो हिंदुस्तान की है. हिंदी महज भाषा नहीं, बल्कि इस मुल्क की सनातन परंपरा की शाश्वत अभिव्यक्ति है. ‘संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्’ हिंदी इसी मूलमंत्र का जाप करते हुए इतिहास की जमीन पर आगे बढ़ती गई.

Hindi is not the only language, हिन्दी सिर्फ़ भाषा नहीं, हमारे आत्मगौरव और आत्म सम्मान का मुद्दा, क्यों नहीं मिल सकता राष्ट्रभाषा का दर्जा?
हिंदी भाषा को व्यापक और जनता तक पहुँचाने का काम अखबारों ने ज्यादा किया. आधुनिक हिंदी के जन्मदाता भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर आज तक नए शब्दों के साथ हिंदी को विस्तार अखबारों ने ही दिया. पंडित बाबू राव विष्णु पराड़कर ने हिंदी के अनेक नए शब्द अखबार के जरिए ही दिए. पराड़करजी के बाद हिंदी शब्द-संपदा को बढ़ानेवाले संपादक थे प्रभाष जोशी. उन्होंने बोलियों से शब्द उठाकर नई भाषा गढ़ी. भाषा की जड़ता खत्म कर उसे लोक से जोड़ा. भाषा शब्दकोश से बाहर आई. उन्होंने हिंदी समाज को स्वाभिमान दिया.

मुगलकाल से पहले अदालत और दफ्तरों के काम ज्यादातर हिंदी में होते थे, लेकिन अकबर के समय में राजा टोडरमल ने दफ्तर के कामकाज को हिंदी से फारसी में कर लिया. इसके चलते कचहरी और दफ्तरों का काम फारसी में होने लगा. इससे भी प्रचुर अरबी-फारसी आदि के शब्दों का प्रचार जन-साधारण और हिंदी में हुआ. कानून एवं अदालत संबंधी सैकड़ों पारिभाषिक शब्द व्यवहार में आने लगे. हिंदी वास्तव में राजभाषा बन सकी है या नहीं, यह एक बहस का विषय है, मगर इस तथ्य में दो राय नहीं है कि हिंदी अब व्यावहारिक तौर पर इस देश की संपर्क भाषा या जनभाषा बन चुकी है.

एक बड़ा सच यह भी है कि हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने का बीड़ा हिंदीभाषी नेताओं ने नहीं, बल्कि महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ टैगोर, सी. राजगोपालाचारी और सुभाष चंद्र बोस सरीखे गैर-हिंदीभाषी नेताओं ने उठाया था. ये सभी हिंदीभाषी प्रदेशों से न होते हुए भी हिंदी की ताकत से वाकिफ थे. महात्मा गांधी देश भर में अपने भाषण हिंदी या हिंदुस्तानी में ही दिया करते थे. सुभाष चंद्र बोस ने ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना की तो अलग-अलग राज्यों के सैनिकों को जोड़ने का काम हिंदी के माध्यम से ही किया. गांधीजी ने आजादी से पहले ही अहिंदीभाषी राज्यों, विशेषकर दक्षिण भारत में हिंदी प्रचारिणी सभाएँ बनाईं.

संस्कृत अपने समय की कालजयी भाषा रही. विश्व की तमाम भाषाएँ संस्कृत से प्रेरित और प्रभावित होती रहीं. मध्यकालीन भारतीय आर्यभाषा का काल 500 ई.पू. से 1000 ई. के बीच है. इसमें पालि, प्राकृत, अपभ्रंश का भी हिस्सा है. भगवान् बुद्ध के सारे उपदेश पालि में ही हैं, जबकि भगवान् महावीर के सारे उपदेश प्राकृत में हैं. मगर हिंदी इन सभी के बीच का पुल बन चुकी है. हिंदी में संस्कृत भी घुली हुई है और पालि भी. प्राकृत, अपभ्रंश और यहाँ तक कि उर्दू और इंग्लिश भी. संपूर्ण विश्व में इतनी उदार भाषा कहीं नहीं मिलेगी, जो आनेवाले हर मेहमान का गले लगाकर स्वागत करती हो. जिसे किसी से कोई विभेद न हो. कोई द्वेष न हो. जो सबकी हो जाए और सबको अपना बना ले. ऐसी हिंदी को किसी दिवस विशेष की सीमा में बाँधा जा सकता है क्या?

हमें हिंदी को अपने गर्व की भाषा बनाना होगा. इसे राष्ट्र की भाषा बनाना होगा. हिंदी जिस भी रोज राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर सुशोभित हो हमारा गर्व बन जाएगी, हम वास्तविक अर्थों में स्वतंत्र हो जाएँगे. तुलसीदासजी कह गए हैं, ‘पराधीन सपनेहु सुख नाहीं.’ सत्य बस इतना ही है कि देह के पराधीनों को सपने में भी सुख नसीब नहीं हो सकता और भाषा के पराधीनों को जन्मों में भी नहीं. इस पराधीनता से मुक्ति दिलाईए अमित भाई.

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