कश्मीर पर अमित शाह की ‘अटल’ पॉलिसी, इन दो रास्तों पर चल कर होगी नई सुबह

पिछले 32 साल में ऐसा पहली बार हुआ जब देश का गृह मंत्री कश्मीर गया हो और किसी अलगाववादी संगठन ने बंद का आह्वान नहीं किया हो. अमित शाह ने शहीद इरशाद खान के घर जाकर एक बड़ा संदेश दिया.

कश्मीरियत, इंसानियत और जम्हूरियत. अटल बिहारी वाजपेयी के ये तीन शब्द जम्मू-कश्मीर के लोगों के जेहन में मानो धंस गये हों. जब 2004 के लोकसभा चुनाव में वाजपेयी वापसी नहीं कर पाए तो घाटी के लोगों ने इसे कश्मीर के लिए बड़ा नुकसान करार दिया था.

ये दुर्भाग्य है कि 2004 से 2014 के बीच कांग्रेस की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) सरकार अटल के रास्ते को आगे नहीं बढ़ा पाई. एक तरफ वाजपेयी ने जनरल मुशर्रफ के साथ बातचीत की पहल की तो जरूरत पड़ने पर आयरन फिस्ट पॉलिसी भी अपनाई. वहीं दूसरी ओर उन्होंने हुर्रियत कॉन्फ्रेंस के नरम गुट को बातचीत के लिए बुलाया. एनएन वोहरा घाटी के लिए स्पेशल रिप्रेजेंटेटिव बनाए गए. 2002 में शानदार तरीके से विधानसभा चुनाव हुए और मुफ्ती मोहम्मद सईद सीएम बने.

मुफ्ती और अटल की जोड़ी ने हीलिंग टच की पॉलिसी पर ज़ोर दिया. आतंकवाद से प्रभावित लोगों के साथ सहानुभूति घाटी के लोगों को देश की मुख्य धारा से जोड़ने में मददगार साबित हुई. मुफ्ती ने इखवान पर बैन लगा दिया. ये सेना समर्थक मिलिशिया थी जो आतंकवादियों से लोहा लेती थी. इसकी काफी आलोचना हो रही थी. आम नागरिकों की सुविधा के लिए अटल सरकार के सहयोग से कई कदम उठाए गए. यहां तक कि हिज्बुल मुजाहिदीन में फूट पड़ गयी और माजिद डार गुट वार्ता टेबल पर आ गया.

मनमोहन सरकार ने सारे मौके गंवाए

लेकिन मनमोहन सरकार के दौरान ये सारे मौके गंवा दिए गए. अटल सरकार में उप विदेश मंत्री रहे उमर अब्दुल्ला खुद 2008 में जम्मू-कश्मीर के चीफ मिनिस्टर बने लेकिन इस युवा नेता ने भी कश्मीर पॉलिसी ( kashmir policy) के मामले में निराश ही किया.

2008 में हुर्रियत फिर से एक हो गया. मुंबई में 26/11 की घटना हुई. पाकिस्तान के साथ समग्र बातचीत स्थगित कर दी गई. उधर कश्मीर में भी अलगाववाद फिर जोड़ पकड़ने लगा. स्टोन पेल्टिंग युवाओं का शगल बना तो ये अब्दुल्ला सरकार के साथ मनमोहन सरकार की भी विफलता थी.

अमित शाह की स्मार्ट पॉलिसी

2014 में सरकार बनने के तुरंत बाद दोस्ती का हाथ बढ़ाते हुए नरेंद्र मोदी ने पाक पीएम को शपथ ग्रहण में आमंत्रित किया. लेकिन घाटी में आतंकवादियों को सीमा पार से लगातार भेजने और पठानकोट एयरबेस पर आतंकी हमले से माहौल बिगड़ गया. मोदी ने राष्ट्र धर्म निभाते हुए देश की सुरक्षा से कोई समझौता न करने का एलान किया. ये उरी आतंकी हमले के जवाब में हुए पहले सर्जिकल स्ट्राइक से साबित हो गया.

मुफ्ती मोहम्मद सईद की विरासत संभाल रही उनकी बेटी और पूर्व मुख्‍यमंत्री महबूबा मुफ्ती को मोदी सरकार ने पूरा सहयोग देना जारी रखा. हालांकि महबूबा राजनीति चमकाने के लिए आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई पर सवाल उठाती रहीं. बुरहान वानी की अगुआई में होम ग्रोन मिलिटेंट्स ने घाटी के युवाओं को गुमराह करने की कोशिश की.

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हालांकि मोदी सरकार ने राज्य में बीजेपी के सहयोग से चल रही सरकार की परवाह न करते हुए आतंकियों के सफाए की मुहिम चलाई और रिकॉर्ड संख्या में आतंकी मारे गए. महबूबा की नीतियों से असहमति जताते हुए बीजेपी ने पिछले साल समर्थन वापस ले लिया. पहले राज्यपाल शासन और अब राष्ट्रपति शासन के दौरान सेना को खुली छूट मिली और बुलेट का जवाब बुलेट से दिया गया. पुलवामा अटैक के बाद पाकिस्तान पर एरियल सर्जिकल स्ट्राइक ने दक्षिण एशिया की सामरिक जड़ता को समाप्त कर दिया.

पहले की सरकारों के उलट ये स्पष्ट हो चुका है कि मोदी की अगुआई वाली सरकार राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीमा पार जाकर दुश्मनों के ठिकानों पर हमला करने से नहीं हिचकेगी.

प्रचंड बहुमत से दोबारा सत्ता पर काबिज होने वाले नरेंद्र मोदी ने संगठन संभाल रहे अमित शाह (Amit Shah) को गृह मंत्रालय की अहम कमान सौंपी. सारी नज़रें अमित शाह की कश्मीर पॉलिसी पर है. 32 साल में वे पहले ऐसे गृह मंत्री हैं जिनके कश्मीर दौरे पर बंद नहीं बुलाया गया.

अमित शाह (Amit Shah) सबसे पहले आतंकियों से लोहा लेते शहीद हुए पुलिस अफसर इरशाद खान के परिवार से मिलने अनंतनाग पहुंचे. उनकी पत्नी को सरकारी नौकरी का पत्र सौंपा. शहीद खान के पांच साल के बेटे के साथ अमित शाह की तस्वीर बहुत कुछ कहती है. अमित शाह मानवीयता यानी इंसानियत के वाजपेयी फॉर्मूले पर बढ़ते हुए दिखाई दे रहे हैं.

जम्हूरियत और युवाओं पर फोकस

अमित शाह ने कश्मीर में कानून-व्यवस्था और विकास कार्यों की समीक्षा की. जो प्रेस नोट जारी किया गया है उससे संकेत मिलता है कि घाटी के युवाओं को मुख्य धारा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा करने के लिए निवेश पर बल दिया जाएगा. साथ ही प्रतिष्ठित शैक्षणिक और प्रोफेशनल संस्थानों को जम्मू-कश्मीर में आने के लिए उत्साहित किया जाएगा. साथ ही राज्य सरकार के खाली पदों को जल्दी भरने पर भी चर्चा की गई है.

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अमित शाह ने स्टेट पब्लिक सर्विस डिलिवरी एक्ट पर सख्ती से अमल करने को कहा है ताकि सभी सरकारी सुविधाएं राज्य के सभी लोगों तक आसानी से पहुंचाई जाए.

मोदी सरकार ने 80 हजार करोड़ रुपए का जो पैकेज जम्मू-कश्मीर को दिया था उसकी भी समीक्षा की गई है. इसका 82 फीसदी हिस्सा 82 प्रोजेक्ट के लिए जारी किया जा चुका है. इसके तहत दो आईआईएम, दो एम्स और कई सारे आईआईटी खोले जाएंगे.

अमित शाह ने संसद में एलान किया कि जम्मू-कश्मीर के चुने हुए पंचायत प्रतिनिधियों के खाते में सीधे पैसा ट्रांसफर किया जाएगा. इससे विकास को गति मिलेगी. राज्य में राष्ट्रपति शासन छह माह के लिए और बढ़ाया जाएगा लेकिन इसी बीच चुनाव कराने की तैयारी भी की जाएगी.

आतंकवाद पर जीरो टॉलरेंस

नरेंद्र मोदी बार-बार कह चुके हैं कि उनकी सरकार आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलेगी. अमित शाह ने भी संसद में इसे दोहराया. ये रणनीति कश्मीर की मौजूदा स्थिति में मुफीद है. एक तरफ घाटी में आंतरिक पहल से हिंसा खत्म करने और लोगों को देश की मुख्य धारा में लाने की कोशिश चलती रहे तो दूसरी ओर आतंकियों और उनके पनाहगारों को भी साफ संदेश पहुंचे कि उनके साथ कोई मुरव्वत नहीं होगी.

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पाकिस्तान बालाकोट के बाद बैकफुट पर है. लेकिन इमरान खान की कथनी और उनकी सेना की करनी में फर्क जारी है. सीमा पार आतंकियों के ट्रेनिंग कैंप और कश्मीर में आतंकियों की घुसपैठ जारी है. मोदी ने जी-20 शिखर सम्मेलन में भी साफ किया है कि आतंकवाद पर ग्लोबल कॉन्फ्रेंस जरूरी है.

मोदी की शानदार कूटनीति के बूते पाकिस्तान ग्लोबल मंचों पर अलग-थलग पड़ता जा रहा है. उसकी माली हालत बेहद खराब हो चुकी है. पाकिस्तान की सरजमीं पर मौजूद आंतकी संगठनों और आतंकियों पर अमरीका समेत अन्य वैश्विक संगठनों का शिकंजा कसता जा रहा है. मोदी साफ कर चुके हैं कि पाकिस्तान पहले आतंकवाद रोके तभी बातचीत का रास्ता खुल सकता है. आतंकवाद का फन कुचलते हुए कश्मीर में विकास, रोजगार और शांति की कोशिशें कारगर साबित हो सकती हैं.