काश न आता वो बर्फानी तूफान तो Kailash इलाका Kashmir की हिंदू रियासत में होता, पढ़िए जोरावर कथा

पहले विदेश मंत्रालय (MEA) विज्ञापन छपवाकर आवेदन मंगाता है, फिर लॉटरी से नाम निकाले जाते हैं; क्योंकि सरकार वहां हर साल केवल 500 लोगों को ही भेजती है. हर यात्री को यात्रा के लिए कुछ वित्तीय मदद (Financial Help) भी सरकार देती है.
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द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 11

एक पहाड़ के पार दूसरा पहाड़, उसके पार तीसरा. पहाड़ों को लगातार पार करते हम लौट रहे थे. ऊपर नीला आकाश, नीचे सफेद अनंत विस्तार. टेढ़ी-मेढ़ी लेकिन साफ, चौड़ी और चिकनी सड़क. स्मृति के तौर पर मानसरोवर (Manasarovar) का एक कैन जल और कैलास (Kailash) से लाए कुछ गोल चिकने पत्थर साथ थे. भौतिक शरीर वापस जा रहा था, पर मन वहीं छूट रहा था.

हम तो असाधारण उद्योग कर किसी तरह अपने सामर्थ्य से यहां आ गए, प्रभु. पर भोलेनाथ, जो तुम्हारे असली गण हैं, सुविधाओं से दूर, भौतिक दृष्टि से निर्धन, सर्वहारा, दलित, शोषित वे यहां तक कैसे आ पाएंगे? उनके पास तो सिर्फ एक लोटा जल ही है. उनके लिए इस यात्रा को सहन और आसान बनाओ न.

सरकारी दल में जो आना चाहते हैं, उन्हें भी कम पापड़ नहीं बेलने पड़ते. पहले विदेश मंत्रालय (MEA) विज्ञापन छपवाकर आवेदन मंगाता है, फिर लॉटरी से नाम निकाले जाते हैं; क्योंकि सरकार वहां हर साल केवल 500 लोगों को ही भेजती है. हर यात्री को यात्रा के लिए कुछ वित्तीय मदद (Financial Help) भी सरकार देती है. फिर जानेवाले व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने हलफनामा देना होता है कि अगर रास्ते में वह शरीर छोड़ ईश्वर के पास चला गया तो परिवार कोई दावा नहीं करेगा और अंत में 19,000 फीट की ऊंचाई तक जाने के लिए आपकी सेहत साथ देगी या नहीं. यह जानने के लिए एक कठिन मेडिकल टेस्ट (Medical Test) गुजरना होता है. उसके बाद भी यात्रा की निर्भरता मौसम पर.

यानी आपकी यात्रा का फैसला पहले लॉटरी, फिर सेहत और उसके बाद मौसम तय करता है. आप कुछ नहीं कर सकते, सिवाय भोलेनाथ के. आप चाहे उत्तरांचल के रास्ते पैदल जाएं, हेलीकॉप्टर से जाएं या फिर नेपाल के रास्ते गाडि़यों से. तारचेन के बाद तो सबको पैदल ही होना है. न हाथी है, न घोड़ा है, वहां पैदल ही जाना है.

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लौटते वक्त तकलाकोट से पहले पठार की रेगिस्तानी गुफाओं में सैकड़ों साल पुराने बौद्ध मठ दिखे. इक्का-दुक्का लोग वहां आते-जाते हैं. इन्हें मठ नहीं, मठों के भग्नावशेष कहना चाहिए. इन गुफाओं में दो बौद्ध गुरुओं के चित्र दिखते हैं. एक है पद्मसंभव, जो साधना की मुद्रा में हैं. तिब्बत में बौद्ध धर्म फैलाने का श्रेय इन्हीं को है. यह तांत्रिक गुरु आठवीं सदी में भारत से गए थे. दूसरे हैं—मिलारेपा, जो एकतारे के साथ गाते हुए दिखते हैं. मिलारेपा तिब्बत के सबसे बड़े संत कवि हैं. वे ग्यारहवीं शतादी में हुए. वे जादूगर भी थे. तिब्बती आज भी उनके गीत गाते हैं.

हम तकलाकोट पहुंचने ही वाले थे कि ड्राइवर ने बताया कि यहीं पास में जनरल जोरावर सिंह की समाधि है, तिब्बत में जोरावर सिंह. बड़ा अटपटा लगेगा. जोरावर सिंह के बारे में मैं भी नहीं जानता था. तब तक ड्राइवर महोदय हमारे लिए काकभुशुंडी बन चुके थे. उन्होंने जोरावर कथा सुनाई. जोरावर सिंह कश्मीर के महाराज गुलाब सिंह के सेनापति थे. वह लद्दाख, गिलगित, बाल्टिस्तान जीत कर कैलास इलाके को भी कश्मीर की हिंदू रियासत में शामिल करना चाहते थे. इसके लिए उन्होंने तिब्बत पर हमला किया. वह लगभग कामयाब हो चुके थे. तभी भीषण बर्फानी तूफान में फंस उनकी सेना ने हथियार डाल दिए. जोरावर मारे गए. तकलाकोट से 5 कि.मी. दूर तोया गांव में उनकी समाधि है. समाधि या मिट्टी का ढूहा है. चीनी प्रशासन वहां आमतौर पर तीर्थयात्रियों को नहीं जाने देता. हमें दोरजी ने समाधि के नाम पर एक मिट्टी के ढेर की फोटो भी दिखाई. यह भी बताया कि गांववाले समाधि की पूजा करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि समाधि में भूत-प्रेत दूर करने की क्षमता है. देर हो रही थी, इसलिए हमने समाधि देखने की जिद नहीं की, वरना उसकी इच्छा थी हमें वहां ले जाने की.

जैसे-जैसे ऊंचाई कम हो रही थी, हमारे शरीर में जान बढ़ रही थी. हम तकलाकोट में सिर्फ इसलिए रुके कि हमारे साथ चल रहे रसोई वाहन ने यहीं डेरा डाल भोजन बनाया था. फिर गाइड को बर्फ से मुकाबला करनेवाले उसके जैकेट और दूसरे सामान भी लौटाने थे. इतनी दिव्य यात्रा, भोजन, मशविरों और देशी दवाइयों के लिए उसका आभार भी जताना था. उन्हें इस ट्रक के साथ आए अपने तीन साथियों के साथ तुरंत ही काठमांडू लौटना था. उनका रास्ता दो दिन का था. हमने जल्दी-जल्दी खिचड़ी खाई. उनके भारी वस्त्र उतार उन्हें लौटाए और अपने साथ ले गए गरम कपड़े पहने. फिर उनसे विदा ली. शेरपा और उसकी टीम के साथ अपना घरोपा सिर्फ दो रोज का ही था. पर बिछोह की पीड़ा हो रही थी. वह गाइड था, रसोइया था और चिकित्सक भी—ऑक्सीजन और दवाइयों से लैस. मैंने उसके पांव छुए.

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हम हिलसा की ओर चले. दोरजी दुखी थे. उन्हें लगा, अब वे भी कुछ मिनटों में अलग हो जाएंगे. दोरजी के साथ तो लग रहा था कि जैसे जन्मों का साथ हो. सीमा चौकी पर गाड़ी रुकी. फिर चीनी पुलिस और आव्रजन के लोग कैमरे व सामान चेक कर रहे थे. सीमांत के संवेदनशील इलाके की कोई फोटो तो नहीं है. जांच पड़ताल के बाद हम सीमा चौकी से मुक्त हुए तो दोरजी गाड़ी से उतर गए. कहा, पुल तक पैदल साथ चलूंगा आपका सामान लेकर। क्योंकि लक्ष्मण झूले जैसे इस पुल को पैदल ही पार करना था. मैंने उनसे निवेदन किया, नहीं, आप जाएं. उनका स्नेह हमें छोड़ नहीं रहा था.

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मैं इस शर्त पर राजी हुआ कि वे सिर्फ पुल के उस छोर तक ही चलेंगे, जो तिब्बत की सीमा में है. मैंने पीछे मुड़कर देखा तो तिब्बत छोड़ने में एक अजीब सीमांत सम्मोहन लगा; जैसे मैं बनारस का अपना मुहल्ला छोड़ रहा हूं. वैसा ही सम्मोहन, जो अपना गांव या मुहल्ला छोड़ने का होता है. पुल पर आते ही मैंने अपना लंबा जैकेट, जो मानसरोवर यात्रा के लिए ही दिल्ली से खरीदा था, दोरजी को स्मृति-स्वरूप भेंट किया. दोरजी बच्चों की तरह खुश थे. हम पुल के इस पार आ रहे थे. दोरजी वहीं से जोर-जोर से आवाज लगा रहे थे, ‘बम भोले, ॐ नम: शिवाय.’ जब तक वे आंखों से ओझल नहीं हो गए, उनकी आवाज सुनाई देती रही. वह आवाज कभी-कभी अब भी मेरे कानों में गूंजती है.

जारी… फोर्स और हैप्पी लैंडिंग के बीच अटकी रही सांसें, कैलास मानसरोवर से लौटकर नहीं मानता बावरा मन

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