सरहद पर शहीद हो रहे सपूत जवान, यहां कैमरे को रिया का चैट पसंद है… और रसोड़े में कौन है

इस घटना के ठीक चौबीस घंटे बाद एक नहीं, दो नहीं बल्कि 20 'सुशांत' ने सुसाइड किया. सीने पर गोली खाई. हंसते-हंसते कुर्बान हो गए. किसके लिए. देश के लिए.
indian army soldiers being martyred on borders, सरहद पर शहीद हो रहे सपूत जवान, यहां कैमरे को रिया का चैट पसंद है… और रसोड़े में कौन है

28 साल की रिया (Rhea Chakraborty). 34 साल का सुशांत (Sushant Singh Rajput). महीनों साथ रहे. एक दिन सुशांत फंदे से लटकता मिला. दूसरे दिन से रिया सैकड़ों सवालों में घिरती मिली और इंसाफ सड़कों पर दौड़ता भागता कैमरे पर कैद होता रहा. रिया से जुड़े हर किरदार के तार सुशांत केस में उलझते गए. कैमरा दौड़ता गया . किरदार कैद होते गए. कैमरा भागता गया. किरदार फंसते चले गए.

धीरे-धीरे 85 दिन बीत गए. किरदार आज भी दौड़ रहे हैं. और कैमरा आज भी उन्हें कैद कर रहा है. और ये भाग दौड़ ऐसी मची कि लगभग आधा हिन्दुस्तान इस प्रेम कहानी के और इस जंजाल जवानी के हर किरदार को बखूबी पहचानने लगा. मगर इस घटना के ठीक चौबीस घंटे बाद एक नहीं, दो नहीं, बल्कि 20 ‘सुशांत’ ने ‘सुसाइड’ किया. बिल्कुल सही सुना आपने. 20 ‘सुशांत’ का सुसाइड.

गलवान के ‘सुशांत’

गलवान के ‘सुशांत’, जिन्होंने एक पल भी देर किए बिना हंसते-हंसते प्राण गंवा दिए. किसके लिए. देश के लिए. देश मतलब मैं. देश मतलब आप. देश मतलब हम सब. मगर मजाल जो कैमरा इंसाफ दिलाए और क्या मज़ाल जो देशवासी इन 20 ‘सुशांत’ के लिए मुहिम चलाए. नहीं, क्योंकि इनमें ग्लैमर नहीं है न. क्योंकि इनमें ड्रग्स एंगल नहीं है. क्योंकि इसमें जालिम जवानी नहीं है. और ना ही इसमें बंबई की मायानगरी है. तो भला क्यों दौड़ेगा किरदार? क्यों भागेंगे कैमरे? और क्यों देशवासी लगाएंगे इंसाफ की गुहार?

अब जरा चंद सेकेंड के लिए सांस को विराम दीजिए. दिमाग को शांत कीजिए और गौर से पढ़ना चालू कीजिए. किसी ने हमारे वजूद के बने रहने के लिए अपने प्राण त्याग दिए. क्या आप उनके लिए एक पल के लिए भी सोचे. नहीं, टीवी में खबर देखी. टीवी में अंतिम संस्कार देखा. दो फूल चढ़ाए. बस हो गया.

एहसास की चादर ओढ़े रखने में भी शर्मिंदा महसूस

अगर इस देश का शहीद, जो बिना सोचे अपने आप को देश के लिए मिटा देता है, हम उस एहसास की चादर को कुछ पल के लिए ओढ़े रखने में भी शर्मिंदा महसूस करते हैं. तो यकीं मानिए और दिमाग पर जोर डालकर सोचिए. अगर शहीद के मशाल को गिरने से पहले, उसे थाम कर कभी ना गिरने की कसम भी ना दे पा रहे हों, तो क्या हम अपने आने वाली पीढ़ियों के वजूद के लिए ख़तरे का न्योता नहीं दे रहे हैं.

आपको इंसाफ करना है. आपको मतलब देश को. एक बेटा जो अब इस दुनिया में नहीं है. उसने आत्महत्या की है या फिर हत्या हुई है? पहेली है. पर सुलझाने की कोशिश जारी है. हिन्दुस्तान की हर बड़ी संस्था साथ में खड़ी है. दूसरी तरफ सीमा पर चालीस हज़ार बेटे चट्टान की तरह खड़े हैं, डटे हैं, अड़े हैं. ताकि हम और आप सुरक्षित रहें. चैन की नींद सोए. अब आप तय कीजिए. आप किसके साथ हैं.

क्या रिया ने सुशांत को मारा है?

सरहद के सपूतों के साथ या फिर सुशांत केस से जुड़ें किरदारों के साथ. सुशांत देश का बेटा था. उसने जान दी हो या उसकी जान ली गई हो. इंसाफ तो बनता है. पर ये कैसा इंसाफ. जहां एक तरफ सुशांत केस से जुड़े हर किरदार को घर-घर जानता है. बच्चा-बच्चा जानता है. हर घर में इसी की चर्चा है, क्या रिया ने सुशांत को मारा है? लेकिन जो आपके हंसने मुस्कुराने, चैन की नींद सोने की वजह है. उनमें से एक नाम भी आपके जेहन में नहीं है. गलवान के एक बलवान को ना ही नाम से और ना ही शक्ल से आप पहचानते हैं.

ये शहीदों का अपमान है

धिक्कार है. ये राष्ट्रीय शर्म है. ये शहीदों का अपमान है. चाहे वो एक इंसान कर रहा हो. या एक सरकार. या फिर एक देश. अगर आपको 130 करोड़ की आबादी वाले हिन्दुस्तान में एक रिया का चैट पढ़ना अच्छा लगता है तो आप शौक से पढ़िए.

अगर आपको इस देश की कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका से भरोसा उठ गया है तो फिर आप शौक से रिया के पीछे भागते कैमरों और उन चैनलों को 24 घंटे देखिए. पर मैं पूरे भारतवर्ष से कहूंगा. सिर्फ इतना की जब आपको ये मलाल होता है न कि मैं अपने बच्चे के लिए चॉकलेट लेकर क्यूं नहीं गया घर. तो ठीक उसी वक़्त सरहद पर ना जाने कई महीनों से बदन पर वर्दी के साथ आंखें चौकन्नी रखता हुआ सीमा प्रहरी या यूं कहें एक पिता अपने बेटे का चेहरा तक करीब से नहीं देखा होता है.

पलक झपकाने की एक फौजी को इजाज़त नहीं

जब कभी-कभी आपको एसी वाले कमरे में 24 डिग्री तापमान में भी नींद नहीं आती तो ठीक उसी वक़्त 15 हज़ार फीट की ऊंचाई पर बर्फीले रेगिस्तान में एक पल के लिए भी पलक झपकाने की एक फौजी को इजाज़त नहीं है. आप जब वीकेंड पर सोशल डिस्टेंसिंग के साथ कहीं हिल स्टेशन का प्लान बना रहे होते हैं, तभी 22 साल का छोरा जवान अपनी नई नवेली दुल्हन को छोड़कर लद्दाख जाने के लिए बैग पैक कर रहा होता है. ये रियल हीरो हैं. ये देश की आन, बान और शान हैं.

रसोड़े में झांकना है तो शौक से झांकिए

बावजूद इसके अगर आपको रिया के चैट पसंद हैं . तो पसंद आपको मुबारक. बावजूद इसके अगर आपको किसी रसोड़े में झांकना है तो शौक से झांकिए. बावजूद इसके अगर आपको सुशांत केस के तमाम गपशप सुनने है, बिंदास सुनिए. पर याद रखिए अगर यहीं दिलचस्पी सीमा पर तैनात जवानों ने दिखा दी. तो चीन घुसेगा. फिर ना रिया की चैट दिखेगी. ना रसोड़े. ना ही गपशप.

यकीन नहीं, तो शिंजियांग, तिब्बत, मंगोलिया से पूछ लीजिए. फिर भी भरोसा ना हो तो बगल में पाकिस्तान नेपाल भूटान के भूखी नंगी हालत देख लीजिए. और फिर भी आपको रिया की कहानी देखनी है तो देखिए. हम तो अपने देश के वीर सपूतों की शौर्य गाथा गाएंगे सुनाएंगे बताएंगे समझाएंगे और शान से गुनगुनाएंगे. जय हिन्द जय भारत.

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