कोरोना संकट से जूझते देश को स्वदेशी ही बचाएगा, स्वदेशी ही बढ़ाएगा

कोरोना मानवता के लिए बहुत बड़ी आफत है मगर दार्शनिक नजरिए से देखें तो हर विध्वंस में सृजन के बीज छिपे होते हैं. इस लिहाज से इस आफत में भी भविष्य की सकारात्मकता के संकेत छिपे हैं.
Corona virus crisis, कोरोना संकट से जूझते देश को स्वदेशी ही बचाएगा, स्वदेशी ही बढ़ाएगा

कोरोना के गहराते संकट में अर्थव्यवस्था सबसे अधिक खतरे में है. सब कुछ रुका हुआ है. बढ़ेगा भी तो रफ्तार की कमी रह जाएगी. अर्थशास्त्र में जितना महत्व प्राकृतिक संसाधनों का होता है, उतना ही मानवीय संसाधनों का भी होता है. मगर यहां मानवीय संसाधन अस्त-व्यस्त हो चुके हैं. मुंबई, सूरत, अहमदाबाद जैसे औद्योगिक नगरों से वर्क फोर्स घरों की ओर वापिस लौट रही है. अपने अपने गांवों की ओर प्रस्थान कर चुके ये लोग जल्द वापस लौटेंगे, इसकी उम्मीद बेहद कम है. उधर चीन इस मौके का फायदा उठाकर दुनिया भर के बाजारों को अपने माल असबाब से पाटने की मुहिम में लगा हुआ है. भारत उसके सीधे निशाने पर है. इस सबके बीच प्रधानमंत्री मोदी ने एक जरूरी बात कही है. उन्होंने कहा कि लोकल पर वोकल हो जाइये और इसे ग्लोबल बनाइये. देश को आत्मनिर्भर बनाने का मंत्र देते हुए पीएम ने कहा कि लोगों को देसी वस्तुओं के उपयोग को बढ़ावा देना चाहिए और उसका प्रचार भी करना चाहिए.

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ये कहानी यहीं से शुरू होती है. कोरोना मानवता के लिए बहुत बड़ी आफत है मगर दार्शनिक नजरिए से देखें तो हर विध्वंस में सृजन के बीज छिपे होते हैं. इस लिहाज से इस आफत में भी भविष्य की सकारात्मकता के संकेत छिपे हैं. इस आफत के भीतर स्वदेशी का वरदान छिपा है. रास्ता सामने दिख रहा है. चलने में देरी हुई या जल्दी, ये इस बहस का वक्त नही है. चलना बेहद जरूरी है, बात इतनी ही बाकी है. भारत एक ग्रामीण अर्थव्यवस्था है. आज भी इस देश में कुटीर और लघु उद्योग धंधों का अगर सही तरीके से प्रसार और क्रियान्यवयन कर दिया जाए तो देश की अर्थव्यवस्था की नींव विराट हो उठेगी.

बड़ी बात यह है कि कोरोना की महामारी के बीच इसको लेकर आवाजें तेज हो गई हैं. इससे पहले संघ प्रमुख भी इस अभियान के लिए आग्रह कर चुके हैं. जानकारी के मुताबिक स्वदेशी जागरण मंच अब बड़े पैमाने पर अभियान की तैयारियां कर रहा है. ये अभियान स्वदेशी उत्पादों के प्रचार प्रसार और उन्हें जीवन का हिस्सा बनाने की रणनीति का होगा. इसमें उपभोक्‍ता, विक्रेता से लेकर उत्‍पादनकर्ता तक सभी शामिल होंगे.

कोरोना संकट के बीच यह विचारधारा संपूर्ण विश्व में फैल रही है. संकेत इसी बात के हैं कि सभी बड़े देश घरेलू उत्पादन को मज़बूत करने पर ध्यान देंगे और ग्लोबलाइज़ेशन की जगह अंदरूनी मार्केट को बढ़ावा देंगे. संरक्षणवाद भी शुरु होगा. इसके तहत बड़े देश अपनी कंपनियों को बाहर की कंपनियों के मुकाबले संरक्षण देंगे. भारत को इन स्थितियों के लिए अभी से सतर्क होने की आवश्यकता है. वैसे भी यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि स्वदेशी तकनीक और आत्मनिर्भरता का कोई विकल्प नहीं है. पीएम ने जिस आत्मनिर्भरता का लक्ष्य सामने रखा है, उससे देश की अर्थव्यवस्था की जड़ों तक पानी पहुंचेगा.  भारत को न सिर्फ स्वदेशी उत्पाद को प्राथमिकता देनी होगी, बल्कि स्वदेशी तकनीकि भी अपनानी होगी. देश को निर्माण की इकाई बनाना होगा. यह तभी होगा जब हम स्वदेशी प्रौद्योगिकी के सहारे आगे बढ़ेंगे.

आज की तारीख में चीन के सामानों से हमारे बाजार भरे पड़े हैं. हमें चीन पर निर्भरता बिल्कुल कम करनी है पर चीन के रास्ते से सीख लेने में कोई हर्ज नही है. चीन ने स्वदेशी के इसी प्रयोग को पूरी तरह से अपनाया है. स्वदेशी तकनीकि पर जोर दिया है. रिसर्च और डेवलपमेंट में निवेश किया है. इसीलिए वह आज उत्पादन की दृष्टि में बहुत आगे है. भारतीय बाजार चीनी सामानों से अटे पड़े है. कोरोना संकट के दौरान इसका भी तोड़ निकालना जरूरी है. हम अपने उत्पादों के लिए जितना बाजार देंगे, चीन के उत्पाद उतनी ही तेजी से बाहर होते जाएंगे. ये सुविधा सरकारी स्तर पर पूरी ईमानदारी से दी जानी चाहिए.

देश के तमाम हिस्सों से स्वदेशी के पक्ष में और चीनी सामानों के बहिष्कार के लिए आवाजें भी उठना शुरू हो गई हैं. कांफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स (कैट) ने सरकार के राजस्व बढ़ाने तथा खाली खजाने को भरने के लिए स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने की बात उठाई है. इतना ही नही, इस संस्था की ओर से चीन में उत्पादित सामग्री पर कोविड उपकर लगाए जाने की मांग भी की गई है. कैट की ओर कहा गया है कि इस उपकर से प्राप्त राजस्व का उपयोग पूरी तरह से भारतीय व्यापारियों के उत्थान और व्यापार विकास के लिए किया जाना चाहिए जो लॉक डाउन के कारण बेहद ही संकटग्रस्त स्थिति में हैं. यथार्थ यही है कि भविष्य के व्यापार को देखते हुए भारतीय खुदरा बाजार पर चीनी उत्पादों की निर्भरता को कम करना ही होगा. भारत की स्वदेशी अर्थव्यवस्था बेहद ही सक्षम है. बस जरूरत सरकारी संरक्षण और प्रोत्साहन की है. विभिन्न क्षेत्रों जैसे खिलौने, मोबाइल फोन, वस्त्र, फर्नीचर, घरेलू उपकरण, कृषि मशीनरी, उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं, त्योहार का सामान, बिल्डर हार्डवेयर, इलेक्ट्रिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स, घड़ियां, उपहार सामग्री, जूते, रेडीमेड वस्त्र, कपड़ा और कपड़े आदि उत्पादित करने में भारतीय बाजार पूरी तरह सक्षम हैं. पर यह स्वप्न जमीन पर उतर सके इसके लिए सरकार से उचित समर्थन एवं नीतियां मिलना अति आवश्यक है.

भारत सरकार ने इस सिलसिले में पहल शुरू कर दी है. आत्मनिर्भर भारत अभियान शुरू करने की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने एक बड़ा ऐलान किया. शाह ने कहा कि अब सेन्ट्रल आर्म्ड पुलिस फोर्सेज यानी CAPF की कैंटीनों में सिर्फ स्वदेशी सामानों की बिक्री होगी. नया नियम 1 जून से यानी अगले महीने से लागू होगा. उन्होंने देशवासियों से भी देश में बने उत्पादों को अधिक से अधिक इस्तेमाल करने की अपील की. गृह मंत्री अमित शाह के ट्वीट में भविष्य की योजनाओं का खांचा भी दिखा. उन्होंने लिखा, ‘मैं देश की जनता से भी अपील करता हूं कि आप देश में बने उत्पादों को अधिक से अधिक उपयोग में लाएं व अन्य लोगों को भी इसके प्रति प्रोत्साहित करें. हर भारतीय अगर भारत में बने उत्पादों (स्वदेशी) का उपयोग करने का संकल्प ले तो 5 वर्षों में देश का लोकतंत्र आत्मनिर्भर बन सकता है.’ पांच वर्षों में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की उनकी अपील को हम सरकार की इच्छाशक्ति से भी जोड़कर देख सकते हैं. अगर यही इच्छाशक्ति स्थायी तौर पर दिखाई दी, तो इस देश की अर्थवयवस्था को संजीवनी मिलने के दिन बेहद करीब हैं.

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