पहले दहाड़े फिर ईरान के टॉप कमांडर्स को मरवाया, अब शांति का पाठ क्‍यों पढ़ा रहे डोनाल्‍ड ट्रंप? पढ़ें वजहें

ईरान के साथ तनाव को बढ़ाकर ट्रंप ने तीसरे विश्‍व युद्ध का खतरा पैदा कर दिया. जब ईरान ने जवाबी हमला किया तो ट्रंप ने शांति का राग अलापना शुरू कर दिया.

अमेरिकी राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की शख्सियत जुदा है. वह शब्‍दों से तो हैरान करते ही हैं, अपने एक्‍शन से दुनिया को चौंकाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ते. बड़बोलापन उनके नेचर का एक अहम पहलू है. इंटरनेशनल इश्‍यूज पर ट्रंप जितने हल्‍के शब्‍दों में अपनी बात रखते हैं, एनालिस्‍ट्स का एक धड़ा इसके लिए उनकी खासी आलोचना करता है. हाल ही में ईरान के साथ तनाव को बढ़ाकर ट्रंप ने तीसरे विश्‍व युद्ध का खतरा पैदा कर दिया.

ईरान के टॉप आर्मी कमांडर को मरवाने के बाद, ट्रंप ने शांति का राग अलापना शुरू कर दिया. ईरान ने जवाबी हमले में इराक स्थित अमेरिकी सेना के ठिकाने पर हमला किया तो ट्रंप ने राष्‍ट्र के नाम संबोधन किया. इसमें उन्‍होंने कहा कि ‘अमेरिका शांति स्‍थापित करने को तैयार है.’

ठीक पांच दिन पहले ही, ईरान की Quds फोर्स के कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी को मरवाने के बाद ट्रंप अपनी पीठ थपथपा रहे थे. उनका ट्विटर टाइमलाइन यह दिखाता है कि ट्रंप कैसे हिंसक कार्रवाई की बात करते हैं, सामने वाले को भड़काते हैं. आखिर ट्रंप को अब शांति का महत्‍व क्‍यों समझ आ रहा है? इसके पीछे कुछ वजहें हैं.

  1. दुनिया के अलग-अलग हिस्‍सों में करीब 60 हजार अमेरिकी सैन‍िक तैनात हैं. इनमें से 40-45 हजार तो संघर्ष वाले इलाकों में हैं. खाड़ी देशों में ही अमेरिका के 100 मिलिट्री बेस हैं. दुनिया के 130 देशों में अमेरिका के 750 बेसेज हैं. इनमें साढ़े तीन से ज्‍यादा सैनिक पोस्‍टेड हैं. ट्रंप नहीं चाहते कि अमेरिकी सैनिकों पर हमले हों. अगर अमेरिकी सैनिकों का किसी तरह का नुकसान होता है तो यह ट्रंप के चुनावी कार्यक्रम के लिए भी अच्‍छा नहीं होगा. वह दूसरी बार राष्‍ट्रपति बनने के लिए मैदान में हैं.
  2. ट्रंप इसलिए भी हाथ पीछे खींच रहे हैं क्‍योंकि ईरान के पास न्‍यूक्लियर वेपन होने के सबूत नहीं हैं. सुलेमानी की मौत के बाद, डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्‍योरिटी ने कहा कि अमेरिकी सीमा के भीतर ईरान से ‘कोई स्‍पष्‍ट खतरा’ नहीं है. न्‍यूयॉर्क टाइम्‍स की एक रिपोर्ट के अनुसार, सेना के अधिकारी भी ट्रंप के इस कदम से सहमत नहीं हैं.
  3. अमेरिकी नेता लंबे समय से आतंकवाद के बहाने युद्ध को सही ठहराते रहे हैं. ट्रंप ने भी सुलेमानी के खात्‍मे के लिए ‘आतंक’ को ही वजह बताया. हालांकि अमेरिका ने खुद इराक में जो किया, उसे कई विशेषज्ञ ‘अवैध कब्‍जे’ की तरह देखते हैं. इराक युद्ध के जरिए अमेरिका ने UN चार्टर का उल्‍लंघन किया. वहां अमेरिकी सैनिकों की मौत आतंकवाद की वजह से हुई, इस दावे का कोई आधार नहीं है.
  4. एक अहम वजह यह भी है कि मिडल ईस्‍ट में पहले से ही काफी अस्थिरता है. अब अगर जंग होती है तो खाड़ी के हालात शायद इतने खराब हो जाएं कि फिर सही ना हो सकें. अफगानिस्‍तान हो, इराक हो, सीरिया हो, जहां भी अमेरिका ने दखल दी, वो मुल्‍क तबाही की तरफ बढ़ गया. अमेरिका ने 20 साल पहले ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ शुरू किया था जो खत्‍म होने का नाम ही नहीं ले रहा है.

साफ है कि युद्ध की दशा में ट्रंप के पास जीतने से ज्‍यादा गंवाने को बहुत कुछ है. जॉर्ज बुश को अफगानिस्‍तान और बराक ओबामा को इराक के हालात के लिए जिम्‍मेदार ठहराया जाता रहा है. ट्रंप एक और खाड़ी देश की बर्बादी का क्रेडिट अपने सिर नहीं लेना चाहते. खासतौर से इस चुनावी माहौल में. ऐसे में उनके लिए शांति की बात करना ही सर्वोत्‍तम विकल्‍प है.

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