Opinion : दीवारों से खून के छींटे तो मिट जाएंगे, JNU की साख पर चस्पा दाग कैसे धुलेंगे?

5 जनवरी की शाम और रात को जो कुछ जेएनयू कैंपस में हुआ, उसकी बुनियाद 1 जनवरी को ही रख दी गई थी.
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छात्रों से जुड़े मुद्दों पर और अपनी मांगों (हकों) के लिए आंदोलन और जरूरत पड़ने पर पुरजोर विरोध की आवाज. विचारधाराओं पर तीखे मगर तथ्यपरक वाद-विवाद. अपनी सोच और विचारों को मजबूती देने के लिए तर्कों का प्रभावपूर्ण इस्तेमाल. ऐसी ही कुछ पहचान देश के इस सबसे बड़े विश्वविद्यालय की रही है. जेएनयू कैंपस की इस पहचान पर पिछले कुछ वर्षों में ग्रहण लगना शुरू हुआ, तो 5 जनवरी रविवार की शाम को शिक्षा का ये सूर्य हिंसा में यकीन रखने वाले ‘राहुओं-केतुओं’ की आगोश में आ गया.

भुगतना पूरे जेएनयू को है

जेएनयू में छात्रों और शिक्षकों के शरीर से खून बहा. घायल पूरा कैंपस हुआ. आने वाले समय में जख्म का भुगतान कैंपस में हर किसी को करना होगा. शिक्षा में खलल से लेकर तमाम और शक्लों में. जो छात्र हिंसा के शिकार हुए हैं, वो सभी लेफ्ट के बताए जा रहे हैं. इन छात्रों के अलावा कई शिक्षकों को भी चोटें आई हैं. नकाबपोश हमलावरों में कुछ लड़कियां भी शामिल बताई जाती हैं. अगर ऐसा है, तो इससे एक शुरुआती अंदाजा इस बात का जरूर लगता है कि हमला करने वालों में कैंपस के छात्र भी शामिल रहे होंगे. लेकिन ये जांच की चीज है.

दूसरी थ्योरी में कहा जा रहा है कि बाहरी गुंडे आए. ये गुंडे विश्वविद्यालय की पिछली गेट से आए और छात्रों-शिक्षकों को पीटा. अगर ये थ्योरी सच है, तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि घटना बगैर कैंपस के कुछ छात्रों की शह पर घटी हो सकती है.

विद्यार्थी परिषद का दावा ठीक इससे उल्टा है. इनका कहना है कि उनके कई सदस्यों को पीटा गया है और कई गुम हैं, जिनका कुछ पता नहीं चल रहा. दोनों तरफ से ऐसे ही दावों का दौर चलेगा. जांच होगी. जांच के नतीजों पर सवाल होंगे.

लेकिन कई छात्रों के शरीर से बहता खून और शिक्षकों के शरीर पर आई गंभीर चोटें अकाट्य सच हैं, जिन्हें झुठलाया नहीं जा सकेगा. कैंपस की साख पर लगे ये वो दाग हैं, जिन्हें छुड़ाया नहीं जा सकेगा. और इसी वजह से इस दाग को जन्म देने वाले कभी माफ नहीं किए जा सकेंगे.

विभाजित जेएनयू के रक्तरंजित होने पर आश्चर्य कैसा?

जेएनयू हिस्सों में बंट चुका है. बंटवारा आगे बढ़ते वक्त के साथ और गहरा होता जा रहा है. साल 2020 की शुरुआत ने इस बंटवारे के अंजाम की पराकाष्ठा को देखा. बहुतेरे छात्र अब छात्र होने से पहले अलग-अलग छात्र संगठनों के सदस्य हैं, बाद में एक छात्र हैं. उन्हें जेएनयू का छात्र होना उतना गौरव की अनुभूति नहीं देता, जितना उन संगठनों का सदस्य या पदाधिकारी होने का अहसास मुग्ध करता है.

कैंपस कोई भी हो, छात्रों के बीच मारपीट और छोटी-मोटी हिंसा कोई नई बात नहीं है. लेकिन नया है इस तरह की घटनाओं के साथ जुड़ता जा रहा नफरत का स्थायी भाव. और एक-दूसरे को सुनने-समझने से मना कर देने का अंतिम फैसला. पहले ऐसी घटनाएं क्षणिक या किसी खास मुद्दे पर होती और अकसर खत्म भी हो जाती थीं, अब कैंपस के अंदर नफरत और हिंसा कहीं और से गाइडेड (कभी विचारों की शक्ल में तो कभी स्पष्ट निर्देशों को रूप में) दिखती हैं. इस वजह से इनके और भी विकृत रूप में सामने आने के गंभीर खतरे बने रहेंगे.

छात्र एकता जैसी चीज बची भी है क्या?

जेएनयू में जो कुछ हुआ उस पर पूरे देश ने बड़ी तेजी से प्रतिक्रिया दी. एएमयू और जाधवपुर यूनिवर्सिटी के छात्र जेएनयू के समर्थन में खड़े हो गए. गेटवे ऑफ इंडिया पर आधी रात को जेएनयू के छात्रों के समर्थन में प्रदर्शन किया गया. देश के तमाम दूसरे कैंपस से संभवत: ऐसी ही खबरें आएंगी. जेएनयू हिंसा पर समर्थन, विरोध और आरोप-प्रत्यारोप का अब एक लंबा सिलसिला चलना है. ये सब स्वाभाविक भी है. लेकिन इसी बीच क्या एक और सवाल गौर करने लायक नहीं है कि छात्र एकता का पुराना चरित्र क्या अब बाकी रह गया है?

छात्र हितों के लिए दिखने वाला पुराना समर्पण क्या अब शिफ्ट होकर अपने-अपने राजनीतिक आकाओं की ओर नहीं मुड़ गया है? कम या ज्यादा, तमाम बड़े कैंपस की छात्र राजनीति क्या एक तयशुदा पूर्वाग्रह में नहीं बंध चुकी है? अगर ऐसा है, तो फिर जेएनयू पर लगे खून के धब्बों पर चौंकने से ज्यादा हमें खुद को आने वाले समय में ऐसा वाकयों को सहने और पीड़ा झेलने के लिए तैयार करना होगा.

5 दिन तक मौन क्यों?

5 जनवरी की शाम और रात को जो कुछ जेएनयू कैंपस में हुआ उसकी बुनियाद 1 जनवरी को ही रख दी गई थी. विवाद छात्रों के रजिस्ट्रेशन को लेकर था. रजिस्ट्रेशन का विरोध कर रहा गुट हर रोज कोई-न-कोई नई हरकत कर रहा था. पिछले 4 दिनों में इंटरनेट खराब करने से लेकर बिजली काटने तक का काम हो चुका था. कुछ बिल्डिंग्स में ताले तक जड़े गए थे. लेकिन इन छात्रों को रोकने की जरूरत नहीं समझी गई. यहां तक कि रविवार शाम को 4 बजे के आसपास रजिस्ट्रेशन कराने वाले कुछ छात्रों की पीटा भी गया. फिर भी मौन नहीं टूटा.

इन सबके बाद रविवार देर शाम को वो सबकुछ हो गया, जिसने प्रतिष्ठित जेएनयू पर बड़ा दाग चस्पा कर दिया. अब कैंपस के कर्ताधर्ता हों या दिल्ली पुलिस, जिम्मेदारी से कोई नहीं बच सकता.

जेएनयू के खून के धब्बों पर ‘राजनीतिक भोज’

हमेशा की तरह राजनीतिक जल्दबाजी फिर से दिखी. रविवार की रात में ही कैंपस से लेकर एम्स तक सियासी दौड़ शुरू हो गई. जो स-शरीर नहीं निकले, उन्होंने सोशल मीडिया का सहारा लिया. उसी सोशल मीडिया का, जिसने कैंपस की हिंसा से पहले, हिंसा के दौरान और उसके बाद आग में घी डालने का काम किया. सोशल मीडिया पर आए तमाम बड़े राजनेताओं के बयानों पर गौर कीजिए. इनमें राजनीति की विभाजन रेखा बिल्कुल साफ है. कोई अपवाद नहीं है. जेएनयू की साख और छात्रों की चिंता गायब है.

ये टुकड़े-टुकड़े गैंग क्या है?

एक खास समूह को टारगेट करने के लिए पिछले कुछ समय से राजनीति में टुकड़े-टुकड़े गैंग का मुहावरा प्रचलन में है. टुकड़े-टुकड़े गैंग ! तीन शब्दों का ये जुमला इसी जेएनयू को लेकर आया. ये जुमला चीखने-चिल्लाने और सर्टिफिकेट बांटने वाले मीडिया की ही देन है. देखते-देखते ये तीन शब्द कई राजनेताओं के शब्दकोष के प्रिय शब्द बन गए.
सवाल है कि ये टुकड़े-टुकड़े गैंग है क्या? गैंग का सरगना कौन है? गैंग में कौन-कौन लोग हैं? देश के टुकड़े करने वाले कैंपस में हैं ही क्यों? उन्हें वहां होने ही क्यों दिया जाए? और अगर ऐसा नहीं है, तो सिर्फ राजनीतिक विरोध के लिए सामने वाले के लिए ये विशेषण क्यों? क्या नफरत बढ़ाने वाली ऐसी बातें मौखिक हिंसक वाद-विवाद से लेकर कुछ मौकापरस्त तत्वों को शरीर से खून बहाने तक का मौका नहीं देती?

याद रहे- आप जेएनयू के छात्र हैं!

पिछले दिनों फीस वृद्धि के खिलाफ जेएनयू के छात्र दिल्ली की सड़कों पर उतर आए थे. फीस बढ़ोतरी महंगाई के मौजूदा दौर के लिहाज से सही थी या अनुचित इस पर अलग से चर्चा हो सकती है. लेकिन तब छात्र-छात्राओं का इस बात को लेकर पुरजोर विरोध था कि उनके गरीब मां-बाप बढ़ी फी का बोझ उठाने में सक्षम नहीं हैं. इसके बाद कैंपस में आप इस गुट के हों या उस गैंग के, सोचना खुद होगा. क्या आपकी (छात्रों की) पहली जवाबदेही अपने उसी (गरीब) मां-बाप को लेकर नहीं है? खासकर ऐसे दौर में जब तमाम कथित विचारधाराएं प्रदूषित हो चुकी हैं और मान्यताओं में मिलावट की जा चुकी है. सावधान जेएनयू ! किसी के साथ या खिलाफ खड़े होने के पहले अपने विवेक से सोचें. भूलें नहीं कि आखिर आप जेएनयू के छात्र हैं. जेएनयू के छात्र.

नोट : लेख में व्‍यक्त किए विचार पूर्णतया निजी हैं.

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