26 की जगह 5 दिनों में करने की ठानी कैलास मानसरोवर यात्रा, जाने से पहले करिए ये जरूरी तैयारियां

कैलास मानसरोवर की सरकारी यात्रा 26 दिनों की होती है. नेपाल के रास्ते कुछ टूर ऑपरेटर पंद्रह रोज में ‘लैंडक्रूजर’ गाड़ियों से यात्रा कराते हैं. पर हमने महज पांच रोज में यात्रा करने की ठानी नेपाल की एक टूरिस्ट एजेंसी की मदद से. सात सीटोंवाले एक चार्टेड हेलीकॉप्टर के जरिए.
Kailas Mansarovar Travlogoue, 26 की जगह 5 दिनों में करने की ठानी कैलास मानसरोवर यात्रा, जाने से पहले करिए ये जरूरी तैयारियां

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आखिर तय हुआ, नटराज शिव के पास जाना है. फिर क्या ले जाना और क्या वापस लाना! मन तो कहता है, सब वहीं छोड़ आए. फिर भी, घर में तैयारियां युद्ध स्तर पर थीं. मेरे लिए शून्य से कम तापमान में पहनने वाले जैकेट और पैंट लाए गए. सिर पर बांधनेवाली टॉर्च. बिना बिजली के मोबाइल चार्ज करनेवाला यंत्र. बर्फबारी में पहनने वाली बरसाती. वाटरप्रूफ जूता, टोपी, मोजे, चश्मा और न जाने क्या-क्या!

ऊंचाई पर काम आने वाली दवाइयां. हाथ और पैर गरम करने वाले रासायनिक पाउच, जिन्हें सिर्फ जेब में रखकर गरमी महसूस की जा सकती है. पत्नी-बच्चों ने ये सब सामान बांध हमें दिल्ली से लखनऊ रवाना किया, मानो एडमंड हिलेरी और तेनजिंग नोर्गे के बाद मैं ही हिमालय पर जा रहा हूं. हाई अल्टीट्यूड में सिकनेस की दवाइयां. मसलन रक्त पतला करने वाली गोली ‘डायमॉस’ भी साथ रखी. डॉक्टर की राय थी कि अगर सुबह-शाम यह गोली ली गई तो परेशानी ज्यादा नहीं होगी.

लखनऊ से कुछ और मित्र यात्रा में शामिल हुए. हम बहराइच के रास्ते नेपालगंज पहुंच गए. नेपालगंज नेपाल का माओवादी असरवाला इलाका था. उस रोज वहां माओवादियों की नाकेबंदी थी. सारे रास्ते बंद. हमारे साथ एक रसूखदार मित्र थे. उनकी रक्षा में पुलिस थी. लोगों ने बताया कि पुलिस देख माओवादी और भड़कते हैं. संयोग से मेरे एक पुराने मित्र, जो पहले स्थानीय पत्रकार थे, अब माओवादियों के एरिया कमांडर हैं, वे मुझे मिल गए. बड़ी आवभगत की. वे अपने साथ हमें होटल तक सुरक्षित पहुंचा गए.

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मैं अतिवादी नहीं हूं, पर न जाने कैसे यह अति हो गई. कैलास मानसरोवर की सरकारी यात्रा 26 दिनों की होती है. नेपाल के रास्ते कुछ टूर ऑपरेटर पंद्रह रोज में ‘लैंडक्रूजर’ गाड़ियों से यात्रा कराते हैं. पर हमने महज पांच रोज में यात्रा करने की ठानी नेपाल की एक टूरिस्ट एजेंसी की मदद से. सात सीटोंवाले एक चार्टेड हेलीकॉप्टर के जरिए.

Kailas Mansarovar Travlogoue, 26 की जगह 5 दिनों में करने की ठानी कैलास मानसरोवर यात्रा, जाने से पहले करिए ये जरूरी तैयारियां

हेलीकॉप्टर को हमें तिब्बत के हिलसा तक ले जाना था और वहीं से लौटाकर नेपालगंज वापस छोड़ना था. हिलसा से आगे तीन घंटे की यात्रा ‘लैंडक्रूजर’ गाडि़यों से तय करनी थी. यात्रा के बाकी सामान, टेंट, खाने-पीने की वस्तुएं, खानसामा और गाइड हमें तकलाकोट में मिलने वाले थे. यह टीम अलग काठमांडू से हमारे ग्रुप के लिए ही चली थी.

दूसरे रोज अल सुबह हम नेपालगंज हवाई अड्डे पर थे. हमारे लिए सात सीटोंवाला एक ‘बेल हेलीकॉप्टर’ खड़ा था. मौसम खराब था, इसलिए नेपालगंज से सिमिकोट के लिए हेलीकॉप्टर देर से उड़ा. सिमिकोट नेपाल-तिब्बत सीमा पर दुर्गम इलाके में 10 हजार फीट की ऊंचाई पर छोटा सा गांव है.

हेलीकॉप्टर के पायलट कैप्टन प्रधान को उड़ान का खासा अनुभव था. वे आदमी भी अच्छे थे. लेकिन मेरी चिंता कुछ और थी. हेलीकॉप्टर में वे अकेले पायलट थे, क्योंकि सह-पायलट की सीट पर हमारे सातवें साथी सवार थे. इसलिए हेलीकॉप्टर सह-पायलट के बिना उड़ा. हरे-हरे पेड़ों से लदी पर्वत-शृंखलाओं को पार करते हम दो घंटे बाद सिमिकोट के ऊपर थे.

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दस हजार फीट की ऊंचाई पर सिमिकोट नाम के इस छोटे से गांव में एक कच्ची हवाई पट्टी थी. बारह सीटों वाले छोटे जहाज यहां आते हैं. यही जहाज इनके खाने-पीने का सामान लाने और बाहरी दुनिया से इस गांव के संपर्क का जरिया हैं. वरना सौ घरों की इस बस्ती में दोनों ओर (नेपाल और तिब्बत) सात रोज पैदल चलने के बाद ही बाजार मिलते हैं. राशन या तो नेपाल से जहाज में आता है या फिर तिब्बत से खच्चरों के जरिए. खच्चर तकलाकोट से दुर्गम पहाड़ियां पार कर सात रोज में यहां तक पहुंचते हैं.

सिमिकोट कहने को नेपाल में था. वहां नेपाल के बजाय चीन की सुविधाएं ज्यादा थीं. नेपाल में रहते हुए वह गांव नेपाली सभ्यता से कटा था. हमें हवाई अड्डे के कंट्रोल टावर के पास ही लकड़ी के बने एक अतिथिगृह में ठहराया गया. अब क्या करना है? मेरे इस सवाल पर कैप्टन प्रधान ने कहा कि हम कल सुबह चलेंगे.

फिलहाल आप लोग यहीं आराम करें.

“आखिर हम कल तक का वक्त क्यों बरबाद करें? आज ही क्यों न चलें?’’ हमने पूछा.

प्रधान बोले, ‘‘पहले इस ऊंचाई से आपके शरीर का तालमेल बैठ जाए, फिर आगे चलेंगे.’’

“पर हमें तो अभी कोई परेशानी नहीं है. हम वैसे ही हैं. आगे भी चल सकते हैं.’’

हंसते हुए प्रधान बोले, ‘‘परेशानी बढ़ सकती है.’’ यह कह वे आराम करने चले गए.

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तभी बारी-बारी से हम सभी के सिर भारी होने लगे. सांस लेने में ताकत लगने लगी और लगा कि सांस लेने से फेफड़ों की प्यास बुझ नहीं रही है. कैप्टन को बुलाया गया. उन्होंने हमें दवाई दी और सलाह दी कि लंबी-लंबी सांस लें. शाम तक फेफड़े अभ्यस्त हो जाएंगे. अब हम सब कैप्टन के प्रति अपनी कृतज्ञता ज्ञापित कर रहे थे. यहां रुकने का प्रयोजन पता चल चुका था. रात तक हम प्रकृतिस्थ हो गए थे.

जारी … मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है तकलाकोट, सख्त-बेरहम और बदजुबान थे चीनी पुलिसवाले

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