कश्मीर में जनमत संग्रह की बात कह कर ‘कमल’ ने चुभोए कांटे!

Share this on WhatsAppकमल हासन ताज़ा-ताज़ा राजनीति में उतरे हैं. कहना चाहिए कि अभी कायदे से उतरे भी नहीं हैं लेकिन विवादों की आग में हाथ जला बैठे हैं. पुलवामा हमले के बाद देश में गुस्से की जो ज्वाला भड़की है उसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर में जनमतसंग्रह कराने की बात कह कर घी डाल दिया है. कमल […]

कमल हासन ताज़ा-ताज़ा राजनीति में उतरे हैं. कहना चाहिए कि अभी कायदे से उतरे भी नहीं हैं लेकिन विवादों की आग में हाथ जला बैठे हैं. पुलवामा हमले के बाद देश में गुस्से की जो ज्वाला भड़की है उसमें उन्होंने जम्मू-कश्मीर में जनमतसंग्रह कराने की बात कह कर घी डाल दिया है.

कमल हासन ने भारत सरकार से पूछा है कि वो जनमतसंग्रह क्यों नहीं कराती. उनके इस सवाल में भोलापन है या फिर सरकार को घेरने की नीयत इसका कुछ ठिकाना नहीं मगर फिलहाल तो यही लग रहा है कि सियासत में उतरने की उनकी तैयारी अभी अधूरी है. कम से कम कश्मीर को लेकर उनकी बात उतनी ही बचकाना है जितनी मोहल्ले की बहस.

वो जम्मू कश्मीर में जनमत संग्रह ना कराने पर भारत सरकार को ऐसे घेर रहे हैं जैसे वो खुद पाकिस्तान का कोई नाबालिग बच्चा हों!
उन्हें कश्मीर में जनमत संग्रह कराना या ना कराना इतना व्हाइट-ब्लैक लग रहा है कि मुझे उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर अब पूरा संदेह होने लगा है. पहली बात तो ये है कि जनमतसंग्रह सिर्फ कश्मीर में ही नहीं होगा जैसा शायद कमल हासन समझ रहे हैं. इसे पूरे जम्मू और कश्मीर में कराना होगा जिसमें ना केवल भारत का जम्मू- कश्मीर शामिल है बल्कि पीओके, गिलगिट-बाल्टिस्तान और चीनी कब्जे में फंसा अक्साई चिन भी है। तीनों में एक साथ जनमतसंग्रह कराने के लिए कमल हासन को भारत सरकार से ही नहीं पाकिस्तान सरकार और चीन सरकार से भी मनुहार लगानी होगी।

फिलहाल , भारत जनमतसंग्रह नहीं करा रहा है और ना ही उसे कराना ही चाहिए। संयुक्त राष्ट्र की निगरानी में ऐसा कराने के लिए पहली शर्त है पाकिस्तानी सेना का पीओके को पूरी तरह खाली करना और गैर कश्मीरियों को इलाके से हटाना। इसके बाद भारतीय सुरक्षाबलों की संख्या घटाकर उतनी करना जितनी कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए काफी हो। पहली शर्त दशकों से पूरी नहीं हो रही है तो भारत उसके बाद पूरी की जानेवाली प्रक्रिया को कैसे पूरा करेगा!! ये समझना मुश्किल नहीं कि पाकिस्तान पहली ही शर्त पूरी नहीं करने जा रहा.

अब दूसरी बात, पीओके से गैर कश्मीरियों को हटाना और भारत के कश्मीर में कश्मीरी पंडितों को बसाना आदर्श जनमतसंग्रह के लिए आवश्यक है क्योंकि वोट देने का अधिकार उन्हीं को मिलेगा जो असल में कश्मीरी हैं। पाकिस्तान लंबे वक्त से अपने कब्ज़े वाले कश्मीर में बाकी पाकिस्तानियों को बसाए चला रहा जा रहा. इससे पीओके की आबादी के अनुपात में खासा परिवर्तन आया, दूसरी तरफ भारत ने धारा 370 लागू करके सुनिश्चित किया कि कश्मीर में बाकी देश से लोग बस कर आबादी का अनुपात ना बदलें. अब ज़रूरी है कि पाकिस्तान पीओके से उन सभी लोगों को बाहर निकाले जो वहां जा बसे हैं क्योंकि किसे नहीं मालूम कि अगर पीओके में जनमतसंग्रह हुआ तो गैर-कश्मीरी किस तरफ वोट देंगे?

कमल हासन बता दें कि क्या पाकिस्तान से वो सभी बातें पूरी करा लेंगे जो जनमतसंग्रह के लिए ज़रूरी हैं क्योंकि भारत ने तो हमेशा लोगों की राय जानने से पहले एक आदर्श माहौल की व्यवहारिक ज़रूरत पर ज़ोर दिया है जो एकदम तर्कसंगत है, लेकिन पाकिस्तान का रुख कमल अगर पूछकर बता दें तो जनमत संग्रह पर फैसला लेने में आसनी होगी.

अगर कमल हासन पाकिस्तान से ऐसा करा लें तो फिर आगे क्या होगा इसकी भी एक झलक ले लें. इतने सबके बाद हुए जनमतसंग्रह में अगर जम्मू और लद्दाख ने भारत को चुना, कश्मीर ने अलग रहना चुना, गिलगिट बाल्टिस्तान ने पाकिस्तान को चुना और शक्सगम घाटी ने चीन या पाकिस्तान या आजादी को चुन लिया तो पाकिस्तान मान जाएगा?? क्या सारे आतंकवाद संगठन मान जाएंगे? ISI या पाकिस्तानी नेता जिनके स्वार्थ कश्मीर से बेतरह जुड़े हैं वो मान जाएंगे?

तो बेहतर है कि जिस बात का सिर-पैर कमल हासन की पकड़ में आ ही नहीं रहा उससे वो दूर रहें। राजनीतिक रिक्तता में दिन बिताते तमिलनाडु का भला करें। बाद में ठीक तैयारी के साथ अगर वो जम्मू-कश्मीर पर समाधान जैसा कोई समाधान लाएंगे तो उनका स्वागत होगा. गलत वक्त पर गलत सवाल पूछकर वो सिर्फ अपने खिलाफ भारतीय जनता का मिजाज़ बिगाड़ रहे हैं.