बांका रसीला आम… जिस साल नहीं खाया, उस साल को ही उम्र से कम कर देना चाहिए

लॉकडाउन की मर्यादाओं का पालन करते हुए जितना भी हो सके आम का रस लीजिए. आम के इतिहास को समझिए. उसकी परंपरा से वाकिफ होइए. उसकी किस्मों को समझिए. जिंदगी में मिठास भरिए और जिंदगी में कितना भी खास होने के बावजूद 'आम' होने के जमीनी अहसास को बनाए रखिए.
Lockdown literature alfanso mango, बांका रसीला आम… जिस साल नहीं खाया, उस साल को ही उम्र से कम कर देना चाहिए

लॉकडाउन ने जीवन को तितर-बितर कर दिया है. सिर्फ इंसान ही नहीं फल-फूल-पेड़-खेत-खलिहान सब निर्जीव हो गए है. जीवन से रस नहीं रसीले आम भी ग़ायब हो गए हैं. बनारसी होने के कारण मैं विकट आम प्रेमी हूँ. लंगड़ा देख कर कुछ भी छोड़ सकता हूँ. आज दफ़्तर में हापुस यानी अल्फांसो आम पर बुरी खबर मिली. फिर मेरी बिटिया ने ललचाते हुए मुझे आम की कुछ तस्वीरें भेजी. ताकि आम तो नही मिल रहा है फिर तस्वीरों से ही संतोष करू.अभी लंगड़े का मौसम नहीं आया है. और हापुस यानी अल्फांसो यानी रत्नागिरी यह एक ही आम के तीन नाम है. उसके जाने का वक्त आ गया पर वह बाज़ार में नहीं आया. इस खबर ने लॉकडाऊन के अवसाद को और बढ़ा दिया.

दरअसल अल्फांसो भी लॉकडाउन की चपेट में आ गया. अल्फांसो यानी खास लोगों का आम. यदि आम को आप फलों का राजा माने तो मेरी नजर में लंगड़ा आम अगर आमों के गणतंत्र का चक्रवर्ती सम्राट है तो अल्फांसो मंत्री होगा. चूंकि अल्फांसो मार्च के शुरू में ही आ जाता था. इसलिए मैं अबतक टूट कर न जाने कितने दर्जन अल्फांसो को उदरस्थ करता. पर लॉकडाउन ने अल्फांसो की दुर्दशा करा दी है. अल्फांसो इस समय कोरोना की मार से जूझ रहा है. महाराष्ट्र के रत्नागिरी, सिंधुदुर्ग और आसपास के इलाकों में पैदा होने वाले इस नस्ल पर वक्त की गाज गिर गई है. लॉकडाउन से अल्फांसो बगीचे में पड़ा-पड़ा बेदम हो रहा है. यही सृष्टि का नियम है. जो दशा आज अल्फांसो की हो रही है, वही एक रोज जीवन की भी होगी. इसे भी कौड़ियों के भाव होकर अग्नि में समर्पित होना है. बस जो लिखा है, कहा है, रचा है, गढ़ा है, वही शेष रह जाएगा.

विषयांतर हो गया. बात अल्फांसो की. लॉकडाउन में देह की यात्राएं संभव नहीं हैं पर मन तो अनंत है, विराट है. उसकी यात्राओं को रोकने की सामर्थ्य तो स्वयं देवराज इंद्र के पास भी नहीं. मन अल्फांसो की ओर है. अल्फांसो अपने स्वाद, खुशबू, रंग और लज्जत के लिए विश्वविख्यात है. अल्फांसो की इन्हीं खूबियों के चलते उसे जीआई टैग यानी भौगोलिक संकेत भी दिया गया है.

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मैं जन्मा बनारस में और कर्म क्षेत्र लखनऊ रहा और अब जीवन यापन के लिए दिल्ली में हूँ. इसलिए बनारस का लंगड़ा, लखनऊ का दशहरी तो जीवन से नत्थी रहे. पर पसंद और जल्दी आने के कारण अल्फांसो मेरे आम प्रेम का त्रिकोण बनाता है. लखनऊ के करीब काकोरी के पास मलीहाबाद है. मलीहाबाद का सफेदा देश भर में मशहूर है. इस आम को काट कर नहीं चूस कर खाया जाता है. आम के खाने का भी एक कर्मकाण्ड है. कुछ आम चूस कर और कुछ काट कर खाए जाते. सफ़ेदा चूसने वाला आम है. इसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है. कहते हैं कि धर्मचक्र प्रवर्तन के दौरान स्वयं बुद्ध को आम का एक पौधा भेंट किया गया था ताकि वह उसकी छांव में आराम कर सकें. बुद्ध ने उस पौधे को लगाया और कालातंर में सफेद आम का पेड़ उग आया. इसलिए इस किस्म का नाम ‘सफेदा’ पड़ा. भरहुत के स्तूप की पट्टिका पर यह वृक्ष चित्रित है.

मलीहाबाद के नवाब आम के रसिया रहे हैं. 1919 के आस पास मलीहाबाद में आम की 1300 किस्में मौजूद थीं. दुनिया में एक जगह इतनी आम की किस्में कहीं नहीं पायी जातीं. काकोरी में ही प्रसिद्ध ‘दशहरी गांव’ है जहां ‘दशहरी’ आम पैदा हुआ. ऐसे ही हरदोई जिले के ‘चौसा गांव’ में पैदा किया गया ‘चौसा’ आम इस गांव को ही अमर बना गया. आम की एक और मशहूर किस्म लंगड़ा काशी में विकसित हुई है. एक लंगड़े पुजारी ने इसकी कलम बनारस में लगाई थी, सो नाम पड़ा लंगड़ा.

आम का इतिहास उतना ही ‘खास’ रहा है. आमों की प्रजाति को मेंगीफेरा कहा जाता है. क्यों कि आम का वैज्ञानिक नाम मेंगीफेरा इंडिका है. आम की लगभग 70 प्रजातियां हैं. आम की सबसे ज्यादा नस्लें इंडोनेशिया और मलेशिया में पाई जाती है. इन दोनों ही जगहों पर आम की लगभग 30-30 नस्लें पायी जाती हैं. इसे भारत, पाकिस्तान और फिलीपींस में राष्ट्रीय फल माना जाता है. बांग्लादेश में इसके पेड़ को राष्ट्रीय पेड़ का दर्जा मिला है.

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संस्कृत भाषा का आम्रः हिन्दी, मराठी, बंगाली, मैथिली आदि भाषाओं से होते हुए “आम” हो गया. मलयालम में इसका नाम मान्न है. साल 1490 के अंत में पुर्तगाली लोग केरल से मसालों के साथ आम और इसका नाम भी ले गए. पुर्तगाली इसे ‘मांगा’ बोलते थे. मांगा कोई मांगा हुआ शब्द नहीं है. यह मलयालम का शब्द है. तमिल में आम को ‘मंगा’ या ‘मानकाई’ कहा जाता है. सन् 1510 में जब एक पुर्तगाली वारथेमा ने दक्षिण भारत में यह फल चखा तो उसने इस दुर्लभ फल के लिए स्थानीय नाम उधार ले लिया और ‘मंगा’ यहीं से अंग्रेजी का ‘मैंगो’ बन बैठा. इसी से अंग्रेजी में ‘मैंगो’ का जन्म हुआ. पुर्तगालियों ने इस शब्द को सर माथे लिया. ईसा से एक हजार साल पहले शतपथ ब्राह्मण और बृहदारण्यक उपनिषद में भी आम का उल्लेख मिलता है. कालिदास ने इसकी प्रशंसा में गीत लिखे तो मिर्जा गालिब ने शायरी. हमारे यहां आम का पेड़ भी पवित्र और मांगलिक माना गया है. इसीलिए हमारे रीति, व्यवहार, हवन, यज्ञ, पूजा, कथा- त्योहार सभी मंगल कार्यों में आम की लकड़ी, पत्ते, फूल सब काम आते हैं. आम के वृक्ष को प्रजापति का अवतार भी बताया गया है.

आयुर्वेद में आम के अनेक गुण बताए गए हैं.

‘पक्वं तु मधुरं वृष्यं स्निग्धं बलसुख प्रदम् .
गुरू वात हरं हद्धं वण्य शीतमपित्तलम् ..

यानी पका हुआ आम मधुर, वीर्यवर्धक,स्निग्ध,बल तथा सुखदायक , वातनाशक ह्यदय को प्रिय वर्ण को उत्तम करने वाला और पित्त को न बढ़ाने वाला होता है.

गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर को आम बेहद पसंद थे. उन्होंने आम के बौर पर एक कविता लिखी है- ‘आमेर मंजरी’. इस कविता को पढ़ते हुए आम की मिठास आत्मा में उतर जाती है.

‘ओ मंजरी, ओ मंजरी, आमेर मंजरी
क्या तुम्हारा दिल उदास है
तुम्हारी खुशबू में मिल कर मेरे गीत सभी दिशाओं में फैलते हैं
और लौट आते हैं”

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गुरुदेव रवींद्र नाथ ठाकुर ही नहीं, शायरी के चचा मिर्जा गालिब भी आमों के मुरीद थे. आम के खिलाफ कोई भी टिप्पणी उनकी बर्दाश्त से बाहर थी. एक बार उनके एक अजीज दोस्त को बुरी तरह शर्मसार होकर ऐसी ही टिप्पणी का खामियाजा भुगतना पड़ा. मिर्ज़ा गालिब के वे दोस्त आम के प्रति गालिब के झुकाव के बारे में नहीं जानते थे. उन्होंने एक रोज देखा कि एक गधा आम के ढेर तक गया और सूंघ कर वापस लौट आया. इस पर गालिब के दोस्त ने उन्हें चिढ़ाते हुए कहा “देखा, गधे भी आम नहीं खाते.” इस पर ग़ालिब का जवाब था, “बिल्कुल, केवल गधे ही आम नहीं खाते.” गालिब के मित्र का मुंह लटक चुका था.

अमीर खुसरो सूफी कवि थे. उन्होंने अपने काव्य में आम की खूब तारीफ की. इसे “फक्रे-ए-गुलशन” नाम दिया. इतिहास के पन्ने बताते हैं कि 632 से 645 ईस्वी में भारत की यात्रा पर आए ह्वेनसांग पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने भारत के बाहर के लोगों से इसका परिचय कराया था. साहित्य, धर्म और दर्शन में दिलचस्पी रखने वाले लोगों ने आम्रपाली का नाम जरूर सुना होगा. आम्रपाली वैशाली की नगरवधू थी. वह एक अनाथ बच्ची थी जिसे एक माली ने आम के पेड़ के नीचे पाया था. इसीलिए उसका नाम आम्रपाली रखा. वैशाली की नगरवधू बनने के बाद वह बुद्ध के प्रभाव में आई. बुद्ध उसके आम के बगीचे में आकर रुके भी थे. उसने आगे चलकर अपने सारे बगीचे बुद्ध को ही सौंप दिए थे ताकि वह संघ यानी बौद्ध संघ बनाने में इसका प्रयोग कर सकें.

बुद्ध के जीवन का एक बड़ा हिस्सा आम के बगीचों में ही बीता. शायद यही कारण था कि आम बौद्ध धर्म के केंद्र में रहा. बुद्ध की जातक कथाओं में आम का जिक्र बार-बार आता है. गौतम बुद्ध ने अपने पांच शिष्यों को पहली शिक्षा सारनाथ की एक अमराई में ही दी थी. इसे धर्म चक्र प्रवर्तन कहा गया. बौद्ध धर्म के प्रचार में आम का उपयोग खूब हुआ है. बौद्ध भिक्षु आम को भेंट के रूप में देकर जाते थे. सम्राट अशोक ने अपने जो संदेश पत्थरों पर छोड़े हैं उनमें लिखा हुआ है कि सड़कों के किनारे छांव के लिए जिन पेड़ों का चलन था, उनमें आम मुख्य था.

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आम का अर्थ होता है जो सबके लिए हो. आम इसलिए भी भारत का राष्ट्रीय फल है. क्योंकि आम वही जो सरेआम सर्वसाधारण के लिए उपलब्ध हो. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी मेरे प्रिय लेखक रहे हैं. उन्होंने आम पर एक लेख लिखा है, ‘आम फिर बौरा गए हैं’. इस लेख को पढ़ने के साथ ही आम का रस दिलोदिमाग पर छाने लगता है. वे लिखते हैं- “वसंतपंचमी में अभी देर है, पर आम अभी से बौरा गए. हर साल ही मेरी आँखें इन्हें खोजती हैं. बचपन में सुना था कि वसंतपंचमी के पहले अगर आम्रमंजरी दिख जाय तो उसे हथेली पर रगड़ लेना चाहिए, क्योंकि ऐसी हथेली साल भर तक बिच्छूओं के जहर को आसानी से उतार देती है. बचपन में कई बार आम की मंजरी हथेली पर रगड़ी है. अब नहीं रगड़ता, पर बसंतपंचमी से पहले जब कभी आम्रमंजरी दिख जाती है तो बिच्छू की याद अवश्य आ जाती है. सोचता हूँ, आम और बिच्छू में क्या संबंध है? बिच्छू ऐसा प्राणी है जो आदिम सृष्टि के समय जैसा था, आज भी वैसा ही है. कम जंतु इतने अपरिवर्तनशील रहे होंगे. उधर आम में जितना परिवर्तन हुआ है, उतना बहुत कम वस्तुओ में हुआ होगा.

पंडित लोग कहते हैं कि ‘आम्र’ शब्द, ‘अम्र’ या ‘अम्लं’ शब्द’ का रूपांतर है. ‘अम्र’ अर्थात खट्टा. आम शुरू-शुरू में अपनी खटाई के लिए ही प्रसिद्ध था. वैदिक आर्य लोगों में इस फल की कोई विशेष कदर नहीं थी. वहाँ तो ‘स्वादद उदुंबरम्’ या जायकेदार गूलर ही बड़ा फल था. लेकिन ‘अमृत’ शब्द कुछ इसी ‘अम्र’ का ‘अम्रित’ से बना बिगड़ा होगा. बाद में ‘आम्र’ संसार का सबसे मीठा फल बन गया और ‘अम्रित’ अमृत बन गया. अपना-अपना भाग्य है.”

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आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी कहते हैं. जिस साल आम नहीं खाया उस साल को उम्र से कम कर देना चाहिए. एक बार कविवर रवींद्रनाथ चीन गए थे. उन्हें आम खाने को नहीं मिला. उन्होंने अपने एक साथी से विनोद में कहा, ‘देखिए, मैं जितने दिन तक जियूं उसका हिसाब कर लेने के बाद उसमें से एक साल कम कर दीजिएगा, क्योंकि जिस साल आम खाने को नहीं मिला उसको मैं व्यर्थ समझता हूं.’ अब न गुरुदेव है न आचार्य द्विवेदी. पर आम है.

सो लॉकडाउन की मर्यादाओं का पालन करते हुए जितना भी हो सके आम का रस लीजिए. आम के इतिहास को समझिए. उसकी परंपरा से वाकिफ होइए. उसकी किस्मों को समझिए. जिंदगी में मिठास भरिए और जिंदगी में कितना भी खास होने के बावजूद ‘आम’ होने के जमीनी अहसास को बनाए रखिए.

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