करामाती और विशिष्ट गुणों वाले लड्डुओं के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र, पढ़िए डिटेल में

सोंठ, शतावर, गोरखमुंडी,गोंद मकरध्वज, कस्तूरी, अंबर गोठ, कामराज ,विजया को मिलाकर बनने वाले लड्डू करामाती होते हैं. आयुर्वेद और यूनानी में इन सारे तत्वों को बाजीकरण और पौरूष बढ़ाने वाली कारगर औषधियों के रूप में जाना जाता है.
Homemade laddu during Lockdown, करामाती और विशिष्ट गुणों वाले लड्डुओं के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र, पढ़िए डिटेल में

राहुल देव मेरे संपादक रहे हैं. अब वृहत्तर परिवार के सदस्य और अग्रज श्रेष्ठ हैं . ज्ञान के लिहाज़ से नहीं पर बालों के रंग के लिहाज़ से ज़रूर मैं उनकी बराबरी कर लेता हूँ. पर लॉकडाऊन में वे एक बड़ी गलती कर गए. मैं उनकी इस गलती से चिंतित हूं पर उनको क्या कहूं? एक लिहाज़ बीच में आ जाता है. हुआ यूं कि मुझे बेसन का लड्डू बनाता देख राहुल देव जी भी लड्डू बनाने में जुट गए. पर धोखा ये हो गया कि लड्डू बनाने की जो फार्मूला रेसिपी उन्होंने चुनी. वह प्रसव से पहले और प्रसव के बाद खाने वाले बल वीर्यवर्धक लड्डुओं की थी. गांव की भाषा में इन्हें सोंठौरा का लड्डू या फिर सोंठ वाला लड्डू भी कहते हैं. मुझे इसका पता तब चला जब उन्होंने मुझे कल लड्डू की तस्वीर भेजी. तब से मैं परेशान हूं. मेरी परेशानी की वजह इस लड्डू को खाने के बाद होने वाले परिणाम हैं. उम्र के इस उतार पर राहुल देव क्या करना चाहते हैं. इसीलिए मैं इन लड्डुओं के उन पर होने वाले संभावित असर को लेकर बेहद चिंतित हूं.

राहुल जी ने सोंठ, शतावर, गोरखमुंडी, गोंद मकरध्वज, कस्तूरी, अंबर गोठ, कामराज ,विजया को मिलाकर ये लड्डू तैयार किए हैं. उनका ये प्रयास देखकर मुझे विश्वकर्मा याद आए. विश्वकर्मा महर्षि अंगिरा के ज्येष्ठ पुत्र बृहस्पति की बहन भुवना के पुत्र थे. भुवना ब्रह्मविद्या की जानकार थीं. विश्वकर्मा ने ही सोने की लंका का निर्माण किया था. वे सृष्टि के पहले इंजीनियर थे. उन्हें निर्माण शिल्प का देवता माना जाता है . विश्वकर्मा ने जिस तन्यमता से लंका का निर्माण किया होगा, राहुल देव भी उसी तन्मयता से लड्डुओं के निर्माण में जुटे हुए थे. क्या पता आगे चलकर इतिहास उन्हें लड्डुओं के विश्वकर्मा का नाम दे दे!

खैर इस सवाल को इतिहास के हवाले छोड़ते हैं और एक बार फिर से वर्तमान पर लौटते हैं. तो राहुल देव जी ने जिन तत्वों के संयोग से इन ऐतिहासिक लड्डुओं का निर्माण किया वे सब के सब बेहद ही करामाती, बाज़ीगर और विशिष्ट गुणों वाले हैं. आयुर्वेद और यूनानी में इन सारे तत्वों को बाजीकरण और पौरूष बढ़ाने वाली कारगर औषधियों के रूप में जाना जाता है. उम्र की इस ढलान पर उन्होंने ये लड्डू क्यों बनाए और कितने खाए, ये तो मुझे पता नही पर मैं सुबह से चरक, सुश्रुत ,भावप्रकाश निघंटू, इंडियन मेंटरिया मेडिका और यूनानी किताबों का अध्ययन कर रहा हूं. ताकि राहुल जी पर इन लड्डुओं के संभावित असर को समझ सकूं और समय रहते उन्हें आगाह कर सकूं. लिहाज़ में उन्हें फोन कर पूछ भी नही सकता. पर चिंता का क्या करूं? वह तो सर पर चढ़कर नाच रही है. कि अगर इन लड्डुओं के असर से कुछ ऊंच-नीच हो गई तो क्या होगा? इस लॉक डाउन में तो मैं मदद के लिए उन तक पहुंच भी नही सकूंगा!

Homemade laddu during Lockdown, करामाती और विशिष्ट गुणों वाले लड्डुओं के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र, पढ़िए डिटेल में

आप शायद मेरे कहे की गंभीरता को समझ नही रहे हैं. सो अब मैं उन तत्वों के गुण बताता हूं जिनका राहुल जी ने लड्डुओं के निर्माण में इस्तेमाल किया है. इसे पढ़कर आप मेरी चिंताओं के कुछ करीब आ सकेंगे. शायद कोई समाधान भी सुझा सकें. राहुल जी के बनाए लड्डू सुन्दर सुडौल और स्वादिष्ट दिख रहे है. तो शुरुआत करते हैं सोंठ से. सोंठ के बारे में शास्त्रों में लिखा गया है-

“ शुंगों विश्वा च विश्वं च नागरं विश्वभेषजम् . ऊषणं कटु भद्रम च श्रृंगवेर महाओषधम्. “

अर्थात शूंठी विश्वा, विश्व, नागर, विश्वभेषज, ऊषण, कटूभद्र महाऔषधि यह सब सोंठ के पर्याय हैं. सोंठ वीर्यवर्धक स्वर को उत्तम बनाने वाली वातनाशक औषधि है. तो सोंठ के गुण पर गौर कीजिए. राहुल देव जी इन्हीं लड्डुओं के जरिए प्रचुर मात्रा में इस गुण को ग्रहण कर चुके हैं.

अब राहुल जी के लड्डू में इस्तेमाल दूसरा तत्व, विजया. आयुर्वेद में विजया, भॉंग यानी इण्डियन हेम्प को ही कहते हैं. यह भी अग्निवर्धक और पीड़ाहारी है. धन्वन्तरि और भाव प्रकाश में इसका गुण मिलता है. चरक इस पर चुप है. इसके बारे में भी शास्त्रों में लिखा हुआ है-

“भंगा गंजा मातुलानी विजया जया . भंगा कफहरी तिक्ता ग्राहिणी पाचनी लघु: तीक्ष्णोष्णा पित्तला,मोदमदवाग्यह्विवद्धिनी..”

तीसरा तत्व है कस्तूरी यानी मस्क. यह मृगों का नाभि में पैदा होती है. इसे प्राप्त करने के लिए मृगों की नाभि को काटते है और इस प्रक्रिया में उनकी मौत होती है. इसलिए कस्तूरी पर पाबंदी है. इसकी भी तासीर तीक्ष्ण,गर्म और वीर्यवर्धक तथा शोष को हरने वाली है. इसके लिए शास्त्रों में लिखा हुआ है-

“कस्तूरिका ,कटुस्तिक्ता,क्षारोष्णा,शुक्रला गुरू:.कफवात विषच्छदिर्शीतदौर्गन्ध्यशोषह्रत.. “

चौथा तत्व शीलाजीत है जिसे लिक्वड अम्बर कहते हैं. अब राहुलदेव ने इसका लड्डुओं में क्यों इस्तेमाल किया? आप जब इस सवाल पर विचार करेंगे तो संभवत: आपके जेहन में भी वही बल्ब जल उठेगा जो एक रोज़ आर्कमडीज के ज़ेहन में जला था और वो “यूरेका यूरेका” यानि “पा लिया” “पा लिया” चिल्लाते हुए दौड़ पड़े थे.

दरअसल शिलाजीत शिलारस या पहाड़ का गोंद होता है. यह चरपरा, स्निंग्ध, कॉंतिकारक, बल वीर्यवर्धक और जोड़ों का दर्द दूर करने वाला होता है.शिलाजीत वात शामक भी है. राहुल जी को वात की भी कोई समस्या नही है. फिर समस्या क्या है? शिलाजीत के बारे में शास्त्रों में लिखा गया है-

“सिंहलक्: कटुक:स्वादु:स्निग्धोष्ण: शुक्रकान्तिकाकृत:. वृष्य: कण्ठह्य:स्वेदकुष्ठज्वरदाहग्रहापह:”

अब आते हैं केसर यानी सैफ्रन यानी जाफ़रान पर. यह मुख्यतः कश्मीर, स्पेन, फ़ारस और फ्रांस में पैदा होता है. चरक कहते हैं कि यह रक्त शोधक है. सुश्रुत कहते हैं कि गर्म तासीर वाली यह वनस्पति दर्दनिवारक भी है. यह वात पित्त और कफ तीनो दोषों को दूर करता है. शास्त्रों में वर्णित है-

” कुंकुम कटुकं स्निग्धं शिरोरूग्व्रणजन्तुजित् . तिक्तं बहिमर वण्य व्यग्यदोषत्रयापहम्.. “

अब शतावर यानी एड केन्डर्स. यह तिक्त सुगंधित, दौर्बल्य, श्वास, अतिसार ध्वजांभंगादि रोग में दी जाती है. इसके लिए लिखा गया है-

“ महाशतावरी चान्या शातम् मूल्यवर्धकण्टिका. सहस्त्रवीर्या हेतुश्च रिष्यप्रोक्ता महोदरी..“

इसी तरह गोरखमुण्डी यानी ‘स्पेहरथुंस इण्डिका‘ ज़मीन पर फैलने वाली गुल्मजातीय वनौषधि है. इसे मुण्डी, गोरखमुण्डी, बडीमुण्डी महाश्रावणिका भी कहते है. यह मेधा के लिए हितकारी व पाण्डुरोग नाशक और बलकारी होती है.

“महामुण्डी च तत्तुल्या गुणैरूक्ता महर्षिभी: ..”

अब बचा अम्बर. अम्बर फ़ारसी से आया है. इसे संस्कृत में आग्निजार कहते है. यह पक्षाघात ,नंपुसकता, लीवर और फेफड़ों के लिए गुणकारी है. इण्डियन मिटेरिया मेडिका के अनुसार यह सर्वागिक निर्बलता के लिए उपयोगी है. यह स्पर्म व्हेल मछली से पाया जाता है.

सोंठ और गोंद के लड्डू के बारे में तो सभी जानते हैं.कि घर में प्रसव के बाद औषधि युक्त मिष्ठान के तौर पर इनका प्रयोग होता रहा है. राहुल जी ने इन लड्डुओं को सायास बनाया या अनायास, ये मुझे नही पता. पर वह लखनऊ से आते हैं. लखनऊ में उनका बचपन बीता है. यहीं से पत्रकारिता शुरू की. लखनऊ के खाने और बावर्चियों पर नवाबों का असर है.

Homemade laddu during Lockdown, करामाती और विशिष्ट गुणों वाले लड्डुओं के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र, पढ़िए डिटेल में

अवध के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह के खान-पान को आप पढ़ें तो आपको पता चलेगा कि वाजिद अली शाह जिन मुर्गों और बकरों को खाते थे, उन्हें भी केसर और कस्तूरी की गोलियां खिलाई जाती थीं. ताकि वे प्राणी बलवर्धक और वीर्यवर्धक भोजन का सामान बन सकें. अब्दुल हलीम शरर की किताब ‘गुजिश्ता लखनऊ’ में वाजिद अली शाह के ‘ऐफ्रोडीज़ीऐक’ यानि कामोत्तेजक खानपान का विस्तार से वर्णन है. वे उस दौर के बारे में लिखते हैं कि दौलतमंद और शौकीन अमीरों के लिए कस्तूरी और केसर की गोलियां खिला खिलाकर मुर्ग तैयार किए जाते थे. यहां तक कि उनके गोश्त में चीजों की खुशबू रच बस जाती थी और उनका हर रग और रेशा मोअत्तर हो जाता था. फिर उनकी यखनी निकाली जाती और उस यखनी में चावल दम कर दिए जाते थे.

अब्दुल हलीम शरर ने उस दौर के मोती पुलाव का भी जबरदस्त वर्णन किया है. वे लिखते हैं कि उस मोती पुलाव को देखकर ऐसा लगता था कि चावलों में आबदार मोती मिले हुए हैं. मोतियों को तैयार करने की अलग तरकीब थी. तोला भर चांदी के वर्क और माशा भर सोने के वर्क अंडे की जर्दी में मिला दिए जाते थे. फिर उसे मुर्गे के गले की नली में भरकर नली के हर जोड़ पर बारीक धागा कसकर बांध दिया जाता था. फिर उसे थोड़ा सा उबालकर चाकू से नली की खाल फाड़ दी जाती थी और सुडौल आमदार मोती निकल आते थे. इन्हें पुलाव में गोश्त के साथ दम कर दिया जाता था. इन्हें हैदराबाद दक्खिन में शायद लखनऊ के बावर्ची पीर अली ने तैयार किया था. सरकारी डिनरों की मेज परअंग्रेजों ने इनका जमकर आनंद लिया. इसका इजाद सबसे पहले नसीरुद्दीन हैदर के दस्तरख्वान पर हुआ.

मैं सोच रहा था कि अगर राहुल देव को कुछ नया आजमाना ही था तो वे अपने ही शहर के अब्दुल हलीम शरर को पढ़कर आजमा लेते. वाजिद अली शाह के जमाने की एक से बढकर एक लाजवाब डिशें उनका इंतजार कर रहीं थीं. मगर वे वहीं जाकर फंस गए, जहां वाजिद अली शाह फंसा हुआ था.

राहुल जी के लड्डुओं के बारे में सोचता हुआ मैं कल घर की लाइब्रेरी में दाखिल हो गया. ढूंढ ढांढकर अब्दुल हलीम शरर की किताब गुजिश्ता लखनऊ निकाली और उसे पढ़ने लगा. शरर के मुताबिक उस जमाने में मिठाइयां हिंदू और मुसलमान एकता की मिसाल हुआ करती थीं. लखनऊ में दो तरह के हलवाई थे. मुसलमान हलवाई और हिंदू हलवाई. मुसलमान हलवाइयों की शान यह थी कि अगर आम किस्म की मिठाई ली जाए तो उनकी दुकान की चीज़ें हिंदू हलवाई की दुकान से अच्छी नहीं होतीं थीं लेकिन अगर फरमाइश करके उनसे खास किस्म की मिठाई बनवाई जाए तो वह बहुत ज्यादा अच्छी और स्वाद वाली होती थी. लखनऊ में आमतौर पर जलेबियां, इमरतियां और बालूशाही बहुत अच्छी बनती थी. तर हलवा जो आमतौर पर हलवाइयों के यहां मिलता है और पूरियों के साथ खाया जाता है, यह खालिस हिंदू चीज है जिसे वे मोहनभोग भी कहते हैं. मगर हलवा सोहन की चार किस्में पपड़ी, जूजी, हब्शी और दूधिया, ये खासी मुसलमानों की मालूम होती हैं.

Homemade laddu during Lockdown, करामाती और विशिष्ट गुणों वाले लड्डुओं के बारे में क्या कहते हैं शास्त्र, पढ़िए डिटेल में

पर कुछ ही देर में मेरा दिमाग किताब से उचट गया. मैं फिर सोचना लगा कि आखिर संपादक जी को इन लड्डुओं की क्या जरूरत पड़ गई? चचा दाग़ देहलवी लिख गए हैं- ‘होश-ओ-हवास-ओ-ताब-ओ-तवाँ ‘दाग़’ जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया.’ तो आखिर सामान के विसर्जन की अवस्था में राहुल जी किस सर्जन में लगे हुए हैं? ये मेरी समझ से परे था. मेरे मित्र जेएनयू के पूर्व प्रोफेसर पुष्पेश पंत और खानपान विशेषज्ञ जिक्स कालरा ने अवध के खानपान पर एक किताब लिखी है,’ कामभोग’. इसमें अवध के ऐसे खानपान और उसमें इस्तेमाल होने वाले तत्वों का जिक्र है जो बल,पौरूष और काम को बढ़ाने वाले होते हैं. इसका सीधा मतलब है कि अवध में इसका चलन रहा है. राहुल देव चचा गालिब से प्रभावित लगते हैं. गालिब लिख गए हैं- ‘गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है, रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे.’ क्या पता राहुल जी आंखों के इसी दम को जीवित रखने के लिए लड्डुओं की शरण में गए हों!!

सोंठ और गोंद के लड्डू वास्तव में कलाकार होते हैं. भावप्रकाश निघंटू और इंडियन मेटेरिया मेडिका वनस्पतियों, मसालों, वृक्षों और उनकी पत्तियों की तासीर बताने वाली किताब है जो हमारे खान-पान में विशेष काम देती है. अवध के नवाबों के दौर में खाना बनाने वाले बावर्चियों को हकीम बावर्ची कहते थे. वे सिर्फ रसोइए नहीं होते थे. वे खानपान के अवयव में पौष्टिकता और उद्दीपन के तत्व समझकर फिर खाना बनाते थे. राहुल देव जी ने जो उद्दीपक लड्डू बनाए हैं, उनका तात्विक विश्लेषण जानकर या फिर उनकी मेडिसिनल वैल्यू समझकर आप उन लड्डूओं की करामात से वाकिफ हों सकेंगे. अब मैं आपको इनकी वैज्ञानिक तासीर और तस्वीर भी बताऊगॉं ताकि आप राहुल जी के प्रति मेरी उलझन को लेकर वास्तव में संवेदनशील हो सकें.

सोंठ का मतलब सूखी अदरक से होता है. यह अदरक का ही शोधित रूप है. अदरक की तासीर गर्म होती है, रक्तचाप बढ़ाती है. मकरध्वज शिलाजीत का दूसरा नाम है. इसे आइरन स्फेद कहते हैं. इसे आप पहाड़ का पसीना भी कह सकते हैं. कस्तूरी और अंबर दोनों ही आयुर्वेद की प्रतिबंधित औषधि हैं. कस्तूरी मृग की नाभि से प्राप्त होती है. अंबर व्हेल मछली के मुंह से निकली गाज है. शतावर बाजीकरण की वनस्पति है. विजया आयुर्वेद में भांग का दूसरा लड्डू है. गोरखमुंडी को वनस्पति विज्ञान में सेटेंस इंडिकास कहते हैं. यह एक जंगली फूल है जिसे डेजी भी कहते हैं. कायकाज फर्न परिवार की एक वनस्पति है. इसे हेलयिन्थोस्टलेज जिलोरिया कहते हैं. यह दक्षिण पूर्व एशिया से भारत आया. यूनानी ग्रंथों में इसे पुष्टिवर्धक कहते हैं. इन सभी मसालों को तिब्बत में भी टॉनिक की श्रेणी में रखते हैं.

अब आखिर में एक और खतरा मुझे दिखाई दे रहा है. मैं यह सोचकर भी परेशान हूं कि अगर राहुल जी के लड्डुओं का यह चित्र बाहर गया तो ढोल बजाने वाला समुदाय भी गलतफहमी का शिकार होकर उन तक पहुंच सकता है. हालांकि शायद ऐसा ना भी हो क्योंकि राहुल जी इस संप्रदाय के कई सेमिनार में भाषण भी दे चुके हैं. खैर अब इस पूरे प्रकरण को तुलसी बाबा की चौपाई- “होइहि सोइ जो राम रचि राखा. को करि तर्क बढ़ावै साखा॥” के हवाले करते हैं. बस आप सबसे इतनी गुजारिश है कि राहुल जी के लड्डुओं की इस तस्वीर को वायरल कतई न करें. उनकी निजता और लड्डुओं से मिली शक्ति दोनों का ध्यान रखें.

Related Posts