बैर कराते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला… जानें- Lockdown में क्यों दारू नहीं दवा है सुरा?

शराब (Liqour) पर कोई राय कायम करने से पहले उसके इतिहास और परंपरा (History and tredition) को जानना चाहिए. सुरा और सोम का शास्त्रों में विशद वर्णन है. देवासुर संग्राम में सागर मंथन से निकले चौदह रत्नों मे एक वारुणी सुरा भी है. इसका प्रचलित नाम मदिरा है.
Lockdown Literature Liqour Shop, बैर कराते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला… जानें- Lockdown में क्यों दारू नहीं दवा है सुरा?

मित्रों, शराबी को हिकारत की नजर से न देखें. शराबी कोई गिरा हुआ, हेय या अपमानजनक प्राणी नहीं है. लॉकडाउन ने सिद्ध किया है कि देश की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान कम नहीं है. आप भले लड़खड़ाते हुए शराबी को न संभाल पाएं. पर शराबी देश की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को संभाल लेता है. इस लॉक डाउन के सबसे पीड़ित शराबी ही रहे हैं. शराबी यानी सुराप्रेमी. शराबी कोई अपमानजनक अवस्था नहीं है. एक तरफ अंतहीन अनिश्चिततता और भयावह तन्हाई वाला लॉक डाउन और दूसरी तरफ सुरा की अनुपलब्धता.

शास्त्र बताते हैं कि पीने से तन्हाई दूर होती है. मनहूसियत जाती है. आशंकाएं पास नही फटकतीं. शरीर में स्फूर्ति आती है. सो लॉक डाउन में सुरा दारू नही दवा है. लॉकडाऊन में दुकान खुलते ही जब शराबी किलोमीटर लंबी लाइन लगाए थे तो मैंने सोचा कि उनका ताली बजाकर स्वागत करना चाहिए. देश की अर्थव्यवस्था की खातिर इनके भीतर कितनी तड़प है! 70 फीसदी महंगी शराब खरीदने के लिए भी लाइनों में खड़े हैं! इनसे अधिक देश के बारे में किसने सोचा होगा? फिर सुरा में कोई बुराई है क्या? इसे देवता पीते थे. ऋग्वेद के मुताबिक देवराज इंद्र सुराप्रेमी थे. इंद्र अपना पराक्रम सोमरम पीकर ही दिखाते थे. ऋग्वेद के कोई तीन सौ सूक्तों मे इंद्र का उल्लेख है. इसमें लगभग 30 सूक्तों में सुरा का उल्लेख है.

इंद्र सार्वभौमिक सम्राट था. सोमपान का आदती था. वह नैतिक शासक नहीं था. पौराणिक परिकल्पना में वह और ज्यादा अनैतिक हो गया. फिर भी वह देवताओं का राजा है. फिर हमारे दोस्त Suresh Bahadur Singh या Shivendra Kumar Singh पियक्कड़ कैसे हुए? वे भी इंद्र के अनुयायी हैं.

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डॉ. लोहिया कहते थे जो परिवार से कटेगा, वह समाज से सटेगा. समाज से कटा तो परिवार से सटेगा. इस लिहाज से शराबी सामाजिक प्राणी होता है. वह समाज से सटा रहता है क्योंकि मद्यपान सामाजिक कर्म है. वह समाज से कटकर नहीं हो सकता. सही मायनों में शराब पीने के बाद ही मनुष्य सादा जीवन और उच्च विचार के रास्ते पर चलता है. सत्य यही है कि जिसे आप शराब समझते हैं, वह समुद्र मंथन में निकले चौदह रत्नों में एक है. शराब वैदिक ऋचाओं का अभिन्न हिस्सा है. वहां वह सोम के रूप में यहां छाई हुई है.

चार्वाक लिख गए हैं-
पीत्वा पीत्वा पुनः पीत्वा, यावत् पतति भूतले.
समुउत्थाय च पुनः पीत्वा, पुनर्जन्म न विद्यते.

यानि पीजिए, पीजिए, फिर पीजिए. जब तक जमीन पर गिर न जाइए. उठिए और फिर पीजिए क्योंकि यह जन्म दोबारा नहीं मिलेगा. शायद शराब की यही खासियत मनुष्य को पागल कर देती है. सब कुछ लुटाकर पीने के लिए. यही एक ऐसी चीज है जो जीवन के हर पथ में आपका साथ देती है. मनुष्य उल्लास में पीता है. संताप में पीता है. विलास में पीता है. शोक में पीता है. वियोग में पीता है और संयोग में भी पीता है. शायद इसीलिए चर्वाक लिखते हैं, ‘उठिए और फिर पीजिए.’ मैं पीता नहीं, लेकिन हमारी मित्रता शराबियों से ज्यादा ही बेतकल्लुफ और घनिष्ठ होती है. सही भी है. हम प्याला, हम निवाला इसीलिए तो कहा गया है.

मेरे गुरुदेव नामवर सिंह शराब को शराब कहने से नाराज़ होते थे. एक दफा मैं उनके लिए विदेश से ”ब्लू लेवल” ले आया. गुरुदेव ने कहा, हेमंत इसे शराब नहीं सुधा कहो. यह सुधा है. इसे देवता पीते थे. तब से मैं इसे सुधा सोम कहने लगा. उन्हें ग्रहण करने वालों के प्रति मन में आदर का भाव पैदा हुआ. मैं पीता कभी नहीं था फिर भी मित्रों को पिलाने का इंतजाम करने लगा… पढ़ते वक्त मैंने सबसे पहले अपने धोबी पाखंडी ( नाम ) और मोहल्ले के हीरू सरदार को शराब पिलाई. साढ़े तीन फुट के हीरू शराब पीते ही दारा सिंह को चुनौती देने की मुद्रा मे आ जाते थे और बड़े बड़े की मादर फादर करते. वे मुहल्ले के लड़कों के मनोरंजन का साधन थे.

जिंदगी में कभी सोचा नहीं था कि लॉकडाउन होगा तो मित्रों की रासायनिक सेवा करनी पड़ेगी. लॉकडाउन में कई मित्र रासायनिक दृष्टि से लाचार थे. सभी की नजरें मेरी ओर थीं. इनकी लाचारी मुझसे देखी नहीं जाती थी. हर रोज किसी न किसी का आर्तनाद सुनना और उसका निस्तारण करना लॉक डाउन के दौरान मेरा स्थायी भाव बन गया. मेरे पास थोड़ा स्कॉच तो था पर स्टॉक की भी एक सीमा होती है. फिर दूसरे सहाय मित्रों से कहकर इस असहाय जमात की नियमित आपूर्ति का इंतजाम कराया. जिनके पास स्टॉक बचा था, उन्होंने दूसरों की मदद की. यह एक नशा था. जिन मित्रों के शरीर में अल्कोहल की कमी होती, वे मेरे घर का रास्ता पकड़ते. अब तक स्कूल में दाखिला, अस्पताल में भर्ती करवाना, नौकरी के लिए सिफारिश तो करता रहा पर जीवन में यह भी काम करना होगा, कभी सोचा न था.

यह भी नही सोचा था कि रहीम ने अपना प्रसिद्ध दोहा- ” रहिमन वे नर मर चुके, जे ‘कछु’ मागन जाही. उनसे पहले वे मुए जिन मुख निकसत नाही.“ रहीम ने इसे लॉकडाउन को ध्यान में रखकर लिखा होगा. यह ‘कछु’ क्या है. यह भी लॉकडाउन में पता चला. अगर इस ‘कछु’ का मतलब खाना, पानी या पैसा होता तो रहीम साफ साफ लिखते. फिर इस कछु यानि ‘कुछ’ का क्या मतलब है? ‘कुछ’ का मतलब यही है ‘कुछ हौऊ? मन व्याकुल है. 20 दिन हो गए. कहीं से ’कुछ’ नहीं मिला. कछु हौअ त इंतजाम करा दा!’ मित्रों के चेहरे पर यह सार्वभौमिक कातर तकलीफ नजर आई.

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मित्रों का ये आर्तनाद सुन रहीम के दोहे की दूसरी लाइन याद आई जिसमें लिखा है, “उससे पहले वे मुएं जिन मुख निकसत नाही.” तो मुंह से ‘नही’ तो नहीं निकलेगा. चाहे कहीं से भी इंतजाम करना पड़े.  400 साल बाद रहीम के लिखे का भार मेरे कंधे पर आ पड़ा. लॉक डाउन में मदिरापान की उत्कंठ इच्छा वाले इतने शौकीन मित्र मैंने जीवन मे पहली बार कमाए. इस पराक्रम में भी मैंने यही माना कि हम जिसके लिए कुछ करते हैं, वह प्रभु का वरदान है. हम तो निमित्त है. गीता में कृष्ण ने अर्जुन से यही तो कहा था. ’ निमित्त मात्रं भव सव्यसाची ‘

पत्रकारों में उत्सवधर्मिता का मतलब किसी जमाने में मद्यपान ही होता था. दो पैग लीजिए और सीना तानकर दुनिया से मुकाबला कीजिए. इस मामले में लखनऊ का कोई जवाब नहीं. लखनऊ में इन शौकीनों का अड्डा था प्रेस क्लब. बाबू सुरेश बहादुर सिंह सबके होस्ट होते थे. रोज नए किस्से. रोज़ नवीन तत्व दर्शन. जीव और जगत की नई व्याख्या. सुल्तानपुर के जिन पांच महान राजपूतों को मैं भली भांति जानता हूं, उनमें सुरेश यारबाज़ थे. दूसरे थे शीतल, तीसरे राजकेश्वर, चौथे संजय सिंह (अमेठी वाले) और शेष नारायण सिंह. इसमें शेष जी को छोड़ बाकी सब एक ही पथ के अनुगामी हैं. पर पांचों मेरे निजी मित्र रहे. शेष जी भले आदमी हैं.

पत्रकारिता के शुरुआती दिनों में Sheetal P Singh ,अनिल शुक्ल ( रविवार)और Rajkeshwar Singh उत्साही लोग थे. भारतीय परंपरा में जीवन ठीक से चले, इसलिए दुष्ट ग्रहों को हम पहले पूजते हैं. इस लिहाज से लखनऊ में हम पूजे जाते थे. एक कलाकार पत्रकार रोज़ संध्यावंदन (नामवर जी का दिया शब्द) के लिए इन तीनों को बुलाने लगे. अपना दरबार लगाने के लिए. फिर तीनो पीने के बाद उन्हीं होस्ट महोदय की पिटाई करते. नाम किसी और का लेते.. साले..फलाने. और फिर होस्ट पर ही शुरू हो जाते. वह हाथ जोड़कर विनती करता कि वह मैं नही हूं जिसे आप समझ रहे हैं. मेरा नाम फलाने है. पर दोनों पर कोई फर्क नहीं पड़ता और वह पिट जाता. दूसरे दिन फिर वही सब होता.

एक रोज़ परेशान हाल वे नामी पत्रकार मुझे मिले. कहने लगे कि मेरे साथ यह सब क्यों हो रहा है, ये बहुत गलत है. मैने कहा कि आप उन्हें खुद बुलाते है? फिर शिकायत क्यों? ये भी हो सकता है कि वे नशे में गलत पहचान का शिकार होकर आपकी पिटाई करते होंगे. वे कहने लगे, ‘ पर बार बार ऐसा क्यों होता है कि वे रोज़ मुझे ही गलत पहचानते हैं. किसी और के साथ यह हादसा क्यों नही होता. दो रोज तो आप भी साथ थे. आप भी पिट सकते थे. आखिर मैं ही बार-बार गलत पहचान का शिकार क्यों होता हूं.’ मेरे पास उनके इस मासूम सवाल का कोई जवाब नहीं था. उन्हें कौन बताए कि यह पिटाई नियोजित होती थी, उनकी अकड़ निकालने के लिए. शराब की आड़ में.

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शराब पर कोई राय कायम करने से पहले उसके इतिहास और परंपरा को जानना चाहिए. सुरा और सोम का शास्त्रों में विशद वर्णन है. देवासुर संग्राम में सागर मंथन से निकले चौदह रत्नों मे एक वारुणी सुरा भी है. इसका प्रचलित नाम मदिरा है. मदिरापान की परम्परा देवताओं और असुरों दोनों में पाई गयी है. सोम यज्ञो में सोम एवं सोत्रामणी में सुरापान किया जाता था. वैदिक आर्य अपने इष्ट देवता इन्द्र को सोम व सुरा अर्पित करने के बाद ही पीते थे.

ऋग्वेद में सुरा जन-साधारण द्वारा उपयोग किया जाने वाला पेय पदार्थ था. ‘ऋग्वेद’ में मद्य का एक नाम ‘मत्सर भी है. इसका प्रसिद्ध अर्थ लोभ है. ऋग्वेद में सोम और सुरा में फर्क भी बताा गया है. तैत्तिरीय ब्राह्मण’ (1-3-3-3) का कहना है: एतद् वै देवानां परममन्नं यत्सोम:, एतन्मनुष्याणां यत्सुरा.

‘शतपथब्राह्मण’ (12-7-3-94) कहता है- यशो हि सुरा. अर्थात सुरा से यश फैलता/मिलता है.

देवताओं के लिए ‘सुर’ शब्द उन के सुरापान करने के कारण ही अस्तित्व में आया. आप्टे ने अपने कोश में ‘सुर’ शब्द का अर्थ बताते हुए ‘रामचरितम्’ का उद्धरण दिया है. सुराप्रतिग्रहाद् देवा: सुरा इत्यभिविश्रुता:.. यानी सुरा ग्रहण करते रहने के कारण देवता ‘सुर’ नाम से प्रसिद्ध हुए. यजुर्वेद के एक मन्त्र में सुराकार अर्थात सुरा बनाने वाले की ओर संकेत किया गया है – कीलालाय सुराकारम्. इस मन्त्र के मुताबिक़ सुरा बनाने वाला सुराकार है. यजुर्वेद के दूसरे मंत्रो में सुरा बनाने की प्रक्रिया का भी वर्णन किया गया है.

बौधायन ग्रन्थ में सुरा के अलावा मदिरा के रूप में वारूणी और शीघ्र का भी वर्णन है. कौटिल्य ने बेदक, प्रसन्ना, आसव, अरिष्ठ, मरैय व मधु के अलावा कापिशायन और हारहूरक जैसी शराब का उल्लेख किया है. रामायण में भी मैरेय, सुरा और वारूणी का जिक्र है. चरक ने सुरा, मदिरा, अरिष्ट, शार्कर, गौड़, मद्य, मधु आदि को मद्यपेय माना है. सुश्रुत सूत्र में सामान्य सुरा, श्वेतसुरा यवसुरा, शीधु, नरैया और आसव का वर्णन है. वाणभट्ट ने सुरा वारूणी, अरिष्ट, मार्दीक, खार्जूर, शर्करा, शीधु, आसव, मध्वासव आदि मद्य के प्रकार बताए हैं. कालिदास ने नारिकेलासव, शीधु, पुष्पासव, मधु, द्राक्षासव, वारूणी व हाला का शराब के तौर पर उल्लेख किया है.

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लॉक डाउन ने अजब तस्वीर सामने रख दी. मंदिर बंद हैं. मस्जिद बंद हैं. पर मधुशालाएं खुल गईं. बच्चन जी ने समाज के डीएनए में घुसे लॉक डाउन के इस साइड इफेक्ट का हमें बहुत पहले ही आभास करा दिया था. तभी वे लिख गए, “बैर कराते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला.” गालिब के शराब के किस्से दूर दूर तक मशहूर हुए. उनकी शराब की दीवानगी इस कदर थी कि किसी ने शराब पर सवाल उठाया तो गालिब बदले में जमीन से लेकर आसमान तक पर सवाल खड़े कर देते थे. गालिब का घर तुर्कमान गेट के पीछे हकीमों वाली मस्जिद के नीचे था. इसलिए लोग अक्सर ही उन्हें टोका करते थे कि मस्जिद के ठीक नीचे बैठकर वे शराब न पिएं. गालिब को यह बात गंवारा न हुई. वे इस पर शेर पढ़ गए-

“ ज़ाहिद शराब पीने दे मस्जिद में बैठकर या वो जगह बता जहां खुदा न हो!

जारी…. पढ़ें, सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

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