सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

कई मित्र सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हो जाते हैं. कई ऐसे भी हैं जो अंग्रेजी को सोम और देशी को सुरा कहकर संबोधित करते हैं. अगर इसके पीछे उनका आशय शराब के वर्ग विभाजन से है तो वे कुछ हद तक सही भी हैं. पर मदिरा की परंपरा और इतिहास की रोचक जानकारी को कृपया शराबी मित्र अपने पीने की आदतों के हक में इस्तेमाल न करें.
Lockdown Literature Liqour Alcohol, सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

शराब पर लिखते हुए मुझे सरदार अहमद याद आ रहे हैं. वे लखनऊ में हमारे अनन्य मित्र के फर्नीचर कारख़ाने में पॉलिश का काम करते थे. हाथ की कारीगरी ऐसी थी कि उनकी कला के मुरीद दूर दूर तक थे. उनकी एक खासियत यह भी थी कि वे शायर थे. लखनऊ को तहज़ीब और अदब का शहर कहा जाता है. यहॉं बढई, नाई.और दर्ज़ी भी अदब और तहज़ीब वाले होते हैं. मजाज ,कृष्ण विहारी नूर के इस शहर में कई ऐसे शायर हुए जिन्होंने शान से अपने नाम के आगे लखनवी लगाकर इस शहर को अपने साथ जोड़े रखा. पर कुछ ऐसे भी हुए जिन्हें मौक़ा नहीं मिला और ग़ुरबत ने उन्हें गुमनामी के अंधेरे में ढकेल दिया. सरदार अहमद ऐसी ही मक़बूल शख़्सियत थे. पेशा फर्नीचर पर पॉलिश. पढ़े लिखे नही. पर उर्दू घुट्टी में मिली. निहायत ज़हीन. उनके हाथ से गुजर कोई भी लकड़ी संगमरमरी आभा बिखेरती थी.

पॉंच वक्त के नमाज़ी सरदार अहमद शराब नहीं पीते थे. पर शराब की महत्ता पर लिखते थे. वे अक्सर शराब पर कोई शेर लिख देते. मैं जब भी सिकन्दर बाग़ के उस फर्नीचर कारख़ाने पर जाता तो उनके साथ खासा वक्त बिताता था. वे मुझे शराब पर लिखे हुए अपने शेर सुनाते. मेरा उनसे एक वादा था कि मैं एक रोज़ उनका दीवान छपवाउंगा. मुझे ग्लानि है कि मैं यह नहीं कर पाया और वे चले गए. कोई पाण्डुलिपि भी नहीं थी. पुर्ज़ों पर लिखे शेर उनके साथ चले गए. जब मैं लखनऊ से दिल्ली आया तो सरदार साहब दिल्ली आए. मेरे फर्नीचरों को तरतीब से लगवाने और पॉलिश के लिए. उनसे किया वादा अधूरा रह गया. मुझे उनकी पांडुलिपि तो नही मिली मगर उनके कुछ शेर मुझे जरूर याद रह गए.

“शराब पैर की हालत बहाल रखती है,
दवा मरीज़ को बरसों संभाल रखती है।“

सरदार अहमद शराब पर लिखते थे, मगर पीते नही थे. मशहूर कवि हरिवंश राय बच्चन ऐसी ही स्थितियों के लिए लिख गए हैं-”स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,

स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।”

हालांकि बच्चन जी इस सबके बावजूद सोमरस के शौकीन थे. मगर सरदार अहमद का मिजाज एकदम अलग था. सरदार अहमद ने एक रोज शराब की बोतल पर गजब का शेर लिखा.

”क़द कितना ख़ुशनुमां है बदन किस कदर है गोल
जौहरशनास है तो इन्हें मोतियों में तौल ।।”

मैंने बोतल में बंद शराब की महिमा पर अनेक कलाम सुन रखे थे मगर कोई शराब की बोतल का भी इस कदर खूबसूरत वर्णन कर सकता है, हैरान था. सरदार साहब ने बोतल को देह रूप में सोचते हुए उसका अद्भुत वर्णन किया था. बोतल की लंबाई और शरीर को श्रृंगार के सांचे में ढालते हुए उन्होंने इसका मोल समझ सकने की खातिर किसी जौहरशनास यानि जौहरी की जरूरत पर जोर दिया. सरदार अहमद की यादों का लंबा सिलसिला है. उस पर फिर किसी दिन.

Lockdown Literature Liqour Alcohol, सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

बात शुरू हुई थी लॉक डाउन के दौरान दिखी लंबी लंबी शराब की लाइनों पर. अगर गालिब आज होते तो लॉकडाउन में लगी शराबियों की इस भीड़ को देखकर बेहद खुश होते. उनकी कलम से कुछ बेहतरीन मिसरे निकलते. गालिब न रोज़ा रखते थे और न नमाज़ पढ़ते थे. शराब पीने की वजह से वे खुद को आधा मुसलमान कहते थे. आधा मुसलमान यानि कि जो शराब तो पीता है, पर सूअर नही खाता है. शराब के प्रति गालिब के जज्बे का आलम यह था कि वे नास्तिक होने के बावजूद शराब की चाहत में खुदा के दरबार भी पहुंच गए. एक रोज हुआ यूं कि गालिब के पास पैसा नही था. तब वे गली कासिमजान, बल्लीमारान वाले अपने मकान में रहते थे. घर में खाने को दाना नहीं था. वे उन दिनों अपना फारसी दीवान लिख रहे थे. शराब का घूंट भीतर जाने से नए शेरों की आमद में आसानी होती थी. सो गालिब को नए शेरों की खातिर शराब की सख्त जरूरत थी. उनकी बेगम उमराव ने भी उनकी आदतों से तंग आकर उन्हें पैसे देने से इंकार कर दिया था. ताना अलग मारा कि जाकर खुदा के दरबार में दुआ करो तो तुम्हारी मुराद पूरी होगी. लिहाजा शराब की तलब में घिरे हुए गालिब जामा मस्जिद की ओर निकल पड़े. मुहल्ले वाले गालिब को वहां देखकर हैरान हुए.

जामा मस्जिद पहुंच कर गालिब ने वजू किया और सुन्नतें पढ़ने बैठ गए. सुन्नत नमाज का हिस्सा होती हैं. नमाज़ के तीन हिस्से होते हैं, सुन्नत,फर्ज और नफ्ल. गालिब सुन्नत पढ़ चुके थे. अब फर्ज की बारी थी. वह घुटनों पर सिर झुकाए इस बात का इंतजार कर रहे थे कि कब खुदा मेहरबान हो और उनके हाथों में शराब आ जाए. इस बीच उन्हें ढूंढता हुआ एक शागिर्द वहां आ पहुंचा. उसे गालिब से अपनी शायरी ठीक करानी थी. गालिब को भेंट देने के लिए उसके पास शराब की एक बोतल भी थी. उसे कोट के भीतर छिपा कर वह मस्जिद गया और गालिब को आवाज दी. वह बार बार कोट की अंदर की जेब की ओर इशारा कर रहा था. गालिब ने यह देखा तो उठ खड़े हुए. अभी नमाज पूरी भी नही हुई थी, पर गालिब बाहर जाने लगे तो लोगों ने टोका. गालिब बोले कि, ‘भाई, मेरा काम तो सुन्नतों से ही हो गया. अब चलता हूं.’

शराब गालिब के दिल के बेहद करीब थी. वे कभी कभी इसे छोड़ने की कसम भी खाते मगर आखिर में कसम को ही छोड़ जाते. गालिब ने शराब छोड़ने के बाबत कुछ यूं लिखा.

“गालिब छुटी शराब पर अब भी कभी
पीता हूँ रोज-ए-अब्र ओ शबे-माहताब में”

यानी शराब हालांकि छूट चुकी है मगर जिस रात चांद अपने सुरूर पर होता है और आसमान में बदली छाई होती है, उस रात कभी कभी पी भी लेता हूं.

Lockdown Literature Liqour Alcohol, सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

लखनऊ की परंपरा में शराब और शायरी का बड़ा ही गहरा रिश्ता है. मजाज़ लखनवी बेहद अज़ीम शायर थे. ऐसे भी लोग हैं जो उन्हें अपने ज़माने का ग़ालिब कहते हैं. पर उन्हें शराब की जबरदस्त लत थी. उनका और जोश मलीहाबादी का एक किस्सा बेहद मशहूर है. एक बार जोश मलीहाबादी ने उन्हें घड़ी को सामने रखकर पीने की सलाह दी. इस पर मजाज का जवाब था कि आप घड़ी रख के पीते हैं, मैं घड़ा रख के पीता हूं. शराब का ऐसा ही एक जिक्र उनकी और मशहूर लेखिका इस्मत चुगताई का है. एक बार इस्मत चुगताई ने उनसे पूछा कि तुम्हारी ज़िंदगी को ज्यादा बर्बाद किसने किया? लड़की ने या शराब ने? इस पर मजाज़ का जवाब था कि मैंने दोनों को बराबर का हक दिया है. इसी शराब ने एक रोज़ मजाज की जान ले ली. ये साल 1955 का दिसंबर महीना था. मजाज के कुछ दोस्त उन्हें लखनऊ के एक शराबखाने की छत पर छोड़कर चले गए. मजाज ने काफी पी रखी थी. उन्हें होश भी नही था. सुबह जब तक उनकी खैर ओ खबर मिलती वे जा चुके थे.

पर मदिरा की परंपरा और इतिहास की रोचक जानकारी को कृपया शराबी मित्र अपने पीने की आदतों के हक में इस्तेमाल न करें. बौद्ध जातकों में भी मधुशाला का वर्णन है. महावग्ग में मज्जा का उल्लेख है. यह एक प्रकार की सुरा थी जिसका प्रयोग औषधि के रूप में होता था. जातकों से पता चलता है कि लोग उत्सव के दिन जी भरकर खाते पीते और आनन्द मनाते थे जिसमें मद्यपान का प्रमुख स्थान रहता था. इनमें एक उत्सव का नाम ही सुरानक्षत्र पड़ गया. विनयपिटक के अनुसार श्रमण तथा भिक्षु के लिए सुरापान वर्जित था.

मेरे कई मित्र सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हो जाते हैं. कई ऐसे भी हैं जो अंग्रेजी को सोम और देशी को सुरा कहकर संबोधित करते हैं. अगर इसके पीछे उनका आशय शराब के वर्ग विभाजन से है तो वे कुछ हद तक सही भी हैं. सोम और सुरा प्राचीन काल में वर्ग विभाजन का प्रतीक थे. सोम का प्रयोग केवल देवगण एवं पुरोहित लोग कर सकते थे, किन्तु सुरा का प्रयोग अन्य कोई भी कर सकता था, और वह बहुधा देवगणों को समर्पित नहीं होती थी. ऋग्वेद और अथर्ववेद से लेकर ब्राहमणों व उपनिषदों तक में इसका उल्लेख है. ऋग्वेद (7.86.6) में वशिष्ठ ऋषि ने वरिण से प्रार्थना भरे शब्दों में कहा, “मनुष्य स्वयं अपनी वृत्ति या शक्ति से पाप नहीं करता, प्रत्युत भाग्य, सुरा, क्रोध जुआ एंव असावधानी के कारण वह ऐसा करता है.” ऋग्वेद (10.131.4) में सोम-मिश्रित सुरा को सुराम कहते हैं और इसका प्रयोग इन्द्र ने असुर नमुचि के युद्ध में किया था. अथर्ववेद (4.34.6) में ऐसा आया है कि यज्ञ करने वाले को स्वर्ग में घृत एवं मधु की झीलें एवं जल की भांति बहती हुई सुरा मिलती है. शतपथ ब्राह्मण (5.5.4.28) में सोम को ‘सत्य, समृद्धि एंव प्रकाश’ तथा सुरा को ‘असत्य, क्लेश एंव अंधकार’ कहा है. तैत्तिरीय ब्राह्मण (1.8.6) व ऐतरेय ब्राह्मण (37.4) में अभिषेक के समय पुरोहित द्वारा राजा के हाथ में सुरापात्र का रखा जाना वर्णित है. छान्दोग्योपनिषद् (5.10.9) में सुरापान करने वाले को पांच पापियों में माना गया है.

लॉकडाउन में ठेके के आगे लगी हुई शराबियों की लाइन पर गौर करें तो कुछ बातें समझ पड़तीं हैं. पहली कि इसमें अमीर-गरीब-ब्राहमण-दलित, हिंदू-मुसलमान जैसे कोई भेद नही थे. सब एक संप्रदाय में थे. मानो एक साथ मिलकर राष्ट्रीय एकता की तस्वीर पेश कर रहे थे. महिलाएं भी पीछे नही रहीं. उन्होंने भी इसे स्त्री-पुरुष समानता के एक अवसर के तौर पर लिया और फिजिकल डिस्टेंसिंग के साथ इस तलब में बराबरी की हिस्सेदार दिखीं. प्राचीन ग्रंथों में भी इस बाबत व्यवस्थाएं दी हुई हैं. मनु (11.15) ने ब्राह्मणों के लिए सुरापान वर्जित माना है, किन्तु कुल्लूक का कहना है यह प्रतिबन्ध नारियों पर लागू नहीं होता था.

Lockdown Literature Liqour Alcohol, सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

गौतम (2.25), आपस्तम्बधर्मसूत्र (1.5.17.21), मनु (11.14) ने एक स्वर से ब्राह्मणों के लिए सभी अवस्थाओं में सभी प्रकार की नशीली वस्तुओं को वर्जित जाना है. सुरा या मद्यपान को महापातक कहा गया है. महाभारत (उद्योगपर्व 55.5) में वासुदेव एवं अर्जुन मदिरा (सुरा) पीकर मत्त हुए कह गए. यह मदिरा मधु से बनी थी. तन्त्रवार्तिक (पृ. 209-210) ने लिखा है कि क्षत्रियों को यह वर्जित नहीं थी अत: वासुदेव एवं अर्जुन क्षत्रिय होने के नाते पापी नहीं हुए. महाभारत (आदिपर्व 76.77) में शुक्र, उनकी पुत्री देवयानी और शिष्य कच की कहानी कही गई है. इसके मुताबिक शुक्र ने सबसे पहले ब्राह्मणों के लिए सुरापान वर्जित माना. इसके अनुसार सुरापान करने वाला ब्राह्मण ब्रह्महत्या का अपराधी माना जायेगा. मौशलपर्व (1.29-30) में आया है कि बलराम ने उस दिन से जबकि यादवों के सर्वनाश के लिए मूसल उत्पन्न किया गया, सुरापान वर्जित कर दिया. इसे न मानने वालों को सूली पर चढ़ाने का आदेश दिया.

शराबियों का अक्सर एक तर्क यह भी होता है कि शराब औषधि है. वे इसे औषधि समझकर पीते हैं. हालांकि इस तरह के तर्क तभी सामने आते हैं जब शराबी 6-7 पैग के ऊपर निकल जाते हैं. पर इस तर्क में दम है. वैसे भी बोलचाल में दवा और दारू दोनों का प्रयोग एक साथ किया जाता है. शराब के चिकित्सीय प्रयोग का विस्तार से वर्णन चरक संहिता, सुश्रुत संहिता, मेल संहिता, कश्यपसंहिता, अष्टाडूगं, माधवकार आदि में मिलता है.

शराब की एक खासियत यह भी है कि वह जितनी पुरानी होती है, उतनी ही दुर्लभ, मूल्यवान और कीमती भी. दो बरस पहले मैं स्काटलैंड के इनवरनेस शहर गया था. वहां ग्लेन पर्वत ऋंखला के नीचे ही सारे, ग्लेन और शीवास की आसवनिया हैं. स्काच के यथार्थ को जानने के लिए मैं ग्लेनलेविट की डिसलिरी में गया. उन्होंने 51 साल पुरानी स्काच दिखाई. उन्होंने उस प्राचीन आसव के चखने को दिया. मैंने कहा कि मैं गंगाजल संस्कृति का आदमी हूं. वे बोले कि आचमन कर लें ताकि चित्रगुप्त से बताने को रहे कि 51 साल पुरानी चखी है.

आइए अब आपको दुनिया की सबसे पुरानी शराब का इतिहास बताते हैं. दुनिया की सबसे पुरानी शराब चीन में एक मकबरे में मिली. बाओजी शहर के शिगूशान पर्वतों में स्थित इस मकबरे को पश्चिमी झाओ राजवंश (1046 से 771 ईसा पूर्व) के समय का माना जा रहा है. बाओजी पुरातत्व विश्वविद्यालय के निदेशक लियू जुन के मुताबिक इस कांसे के बर्तन में मौजूद द्रव्य चीन के इतिहास की सबसे पुरानी शराब है. चीन के पुरातत्ववेत्ताओं के मुताबिक़ ये शराब करीब तीन हजार वर्ष पुरानी होगी.

Lockdown Literature Liqour Alcohol, सोम और सुरा के बीच कंफ्यूज हैं? मदिरा की परंपरा और इतिहास की पूरी Interesting Story

इसी तरह जॉर्जिया में खुदाई के दौरान छह हजार ईसा पूर्व मिट्टी का एक वाइन पॉट मिला. मिट्टी के इस बर्तन में वाइन बनाई जाती थी. वैज्ञानिकों का कहना है कि ये बर्तन 6000 ईसा पूर्व का है. इससे पता चलता है कि अंगूर से शराब बनाने का तरीका हजारों सालों से चला आ रहा है. शोधकर्ताओं के अनुसार यह जार लगभग एक मीटर लंबा और एक मीटर चौड़ा है और इसकी क्षमता 300 लीटर से भी अधिक की है. इससे पहले साल 1968 में उत्तरी ईरान के ज़ग्रोस पर्वत में सबसे पुराना जार मिला था, जिसमें 7,000 साल पहले शराब रखी गई थी. ग्रीस के समुद्री तलछट में 2000 साल पुराने जहाज के मलबे में (जीसस काल के) दो हैंडल वाले 6000 जग मिले, इनका इस्तेमाल खाना और शराब को सुरक्षित रखने के लिए होता था. ग्रीक शोधकर्ताओं के मुताबिक ये सभी जग एक ईसा पूर्व से लेकर एक ईस्वी के बीच के हो सकते हैं.

शराब के प्रेमी देवता सिर्फ हमारे यहां ही नही हुए हैं. ऐसे देवता चौतरफा हैं. इसे यूं भी समझ सकते हैं कि ये दुनिया प्राचीन काल से ही शराबियों का अड्डा रही है. सिर्फ मनुष्यों ने ही नही, बल्कि देवताओं ने भी जमकर छानी है. ग्रीक सभ्यता में डायोनिसस को शराब का देवता मानते थे. माया सभ्यता में अकन को यह श्रेय हासिल था. चीन के पियक्कड़ों के लिए डू कंग शराब का अधिष्ठाता था. मिश्र के पीने वालों ने नेप्थिस को अपना देवता माना. मेसोपोटामिया की सभ्यता में सिदूरी को यह महात्म्य हासिल हुआ. यह शराब की देवी थीं. मेसोपोटामिया सभ्यता में एक बीयर की देवी भी हुई हैं.. उनका नाम सिरिस था.

लॉकडाउन में जो दिख रहा है, उस पर हैरान न हों. यह हमारी परंपरा और विरासत का सतत विकास है. हमारी से आशय किसी धर्म विशेष या क्षेत्र विशेष से नही बल्कि मानवता से है. देवताओं ने भी इस इतिहास के कई शुरुआती पन्नों पर कसकर कब्जा किया हुआ है. सो शराबियों को हेय दृष्टि से न देखें. उनके प्रति उदासीन भाव न रखें. मर्यादा और आचरण का इतना ध्यान रखें कि शराब आपके सुख का निमित्त हो. इसे किसी के दुख का कारण न बने.

पढ़ें: बैर कराते मंदिर मस्जिद, मेल कराती मधुशाला… जानें- Lockdown में क्यों दारू नहीं दवा है सुरा? 

Related Posts