Lok sabha Election, रंगों ने चुनी सियासत या सियासतदारों ने चुने रंग…
Lok sabha Election, रंगों ने चुनी सियासत या सियासतदारों ने चुने रंग…

रंगों ने चुनी सियासत या सियासतदारों ने चुने रंग…

Lok sabha Election, रंगों ने चुनी सियासत या सियासतदारों ने चुने रंग…

नयी दिल्ली

बेटी- ‘अरे मां आज दुर्गा पूजा है और पूरा बाजार घूम के आई कहीं भी केसरिया रंग की चुनरी नहीं मिली. चुनरी तो छोड़ो मां कहीं भी केसरिया कपड़ा तक नहीं मिल रहा है, अब समझ नहीं आ रहा क्या करें?’ कुछ दिनों तक तो हर दुकान में सजे रहते थे, अचानक कहां गायब हो गए.

मां- ‘अरे बेटा आग लगे इन राजनेताओं में, दो दिन पहले हो हल्ला सुनाई दे रहा था. कोई रैली-वैली थी, वो ही सब कपड़ा खरीद लिए हैं. पूरे गांव में कहीं भी केसरिया कपड़ा तक नहीं छोड़ा. अब लगता हैं इस बार माई को वहीं चुनरी धोकर पहनानी पड़ेगी. बाबू जी भी घर नहीं आए हैं, उन्हीं से कह देते तो शहर से ले आते.’  अच्छा सुनों, अपने बाबू जी को जरा फुनिया तो दो, बोलना अम्मा बोलीं हैं कि माई की पूजा है तो केसरिया चुनरी ले आएं यहां तो मिल नहीं रही.

बेटी- हैलो बाबू जी, आप शाम में जब घर लौटिएगा तो केसरिया रंग की चुनरी ले आइयेगा, गांव की किसी भी दुकान में नहीं मिल रहा. अम्मा बोलीं हैं.

बेटी- बाबू जी आज इतनी देर क्यूं लगा दी. आज माई की पूजा भी थी. अम्मा अभी तक इंतजार करती रहीं. सुबह से उपवासी हैं. आज बोल देते मालिक से जल्दी छुट्टी ले लेते. अच्छा लाओं जल्दी से चुनरी दे दो. पूजा की तैयारी करनी है.

बाबू जी- ‘अरे बेटा, जब तुम मुझे फोन की ना तभी हम वहां से निकल लिए. पूरा बाजार घूमते रहे कहीं भी केसरिया कपड़ा नहीं मिला. और बेटा एक दुकान में मिला वो सोने के भाव दे रहा था. जितने में हम माई की चुनरी लेते, इतने में बिटवा हमार 10 दिन का खाना चल जई. इसलिए हम नहीं लिए, का बतावन तुमका, पता नहीं कौन रंगन में भी सियासत मिला दिया. रामनवनी आएगी तो केसरिया कपड़ा नहीं मिलेगा. बाबा साहेब अम्बेडकर जी का कौनो कार्यक्रम हुई तो नीला कपड़ा न मिली. लोहिया जी और समाजवादी पार्टी की रैली हुई तो लाल और हरा कपड़ा का अजरा पड़ जई. बहुत मुश्किल हो गई है.’

बेटी-  ‘अरे बाबू जी आप सही कहे. हम और अम्मा सुबह से लेकर शाम तक बाजार घूमें कहीं न मिला. तब अम्मा बोली कि बाबू जी से कह दो तो शहर से ले आएंगे. लेकिन बाबू जी क्या रंगों ने भी अपनी-अपनी पार्टियां बना ली हैं. ऐसा क्यूं हो रहा है. देखो ने इनकी वजह से आज हमारी माई पिछले साल वाली चुनरी ही ओढ़ेंगी और इन लोगन ने बाबूजी पूरा गांव केसरिया झंडों से भर दिया है. आज वो झंडे सड़कों में पड़े हुए हैं. कई गांव वाले तो बाबूजी चुरा ले गए. अपने खपरैल में बिछा लिए.’

बाबूजी-  हां, बेटा ठीक ही किए वो लोग जो ले गए चुरा के. कम से कम धूप, छाया और बरसात से तो बचाएगा. ये राजनेता तो बेकार ही बर्बाद कर रहे थे….

ये सच है कि हर धर्म ने एक रंग को चुन लिया है पर रंग का तो कोई धर्म नहीं होता, हां कभी-कभी इंसान का मन काला जरुर हो जाता है, जो उसे रंग में भी धर्म दिखाने लगता है, मां दुर्गा की मूर्ति को सजाते वक्त हरे रंग का चूड़ा, हरे रंग शालू और हरे रंग की चुनरी पहनाते हैं, दरगाहों पर बड़े-बड़े पीर-फ़कीर की मज़ारों पर केसरिया रंग की चादर चढ़ाते हैं, तब तो रंग का ख्याल नहीं आता. जी हां, ये लाइनें संजय लीला भंसाली निर्देशित फिल्म ‘बाजीराव मस्तानी’ से ली गईं हैं. वास्तव में आधुनिक राजनीति को देखकर ये लाइनें सटीक बैठती हैं.

आखिरकार कहां से हम लोगों ने रंगों में सियासत ढूंढ ली और हम उसके ठेकेदार बन गए. इन राजनेताओं की सियासत के कारण लोगों ने केसरिया रंग का गमछा, लाल रंग का गमछा, हरे रंग का गमछा पहनाना ही छोड़ दिया. मनरेगा में काम करने वाला एक मजदूर जिसको दूर-दूर तक सियासत से मतलब नहीं है. एक रोज जब वो केसरिया गमछा लपेट कर काम पर जाता है तो उसका मालिक आ कर बोलता है कि अच्छा तू भी बीजेपी का आदमी है. वहीं पर जब दूसरा मजदूर पहुंचता है, वो नीले रंग का गमछा लपेटे हुए है उसको भी सियासत से कोई मतलब नहीं है लेकिन रंगों में मजहब और राजनीति देखने वाले उसको मायावती का भक्त समझ बैठते हैं.

आखिरकार ऐसा क्यों? क्या केसरिया रंग का कोई कॉपीराइट बीजेपी ने खरीद रखा या फिर लाल,हरे और नीले रंग का ठेका समाजवादी पार्टी,कम्यूनिष्ठ पार्टी और बहुजन समाज पार्टी  और भी देश की तमाम पार्टियां ने ले रखा है.

सड़कों पर धर्म के नाम पर विभिन्न रंगों के गमछे लपेटकर गुंडई करने वालों को शायद ये नहीं पता होगा कि उनकी वजह से आम आदमी को क्या भुगतना पड़ता है. ऊपर लिखी कहानी तो एक सोच है, लेकिन शायद ऐसे ही लोगों की वजह से हम आम आदनी को बहुत ही तकलीफों का सामना करना पड़ता है.

रंगों के मायने, सियासतदार भी जानें

केसरिया रंग को राजसी एश्वर्य और वीरता का भी प्रतीक माना जाता है. इसलिए भारत के राष्ट्रिय ध्वज में भी इसका स्थान सबसे ऊपर आता है. इस रंग को खुशियों और उत्साह का प्रतीक भी माना जाता है.

लाल रंग को प्रेम, क्रोध और संघर्ष का प्रतीक माना जाता है. इसके अलावा हिन्दू धर्म में सुहाग का प्रतीक भी लाल रंग ही होता है. घर में किसी भी शुभ कार्य के लिए सबसे पहले लाल रंग का ही इस्तेमाल किया जाता है.

हरे रंग को प्रकृति और हरियाली से जोड़ा जाता है क्योंकि खेत खलिहानों से लेकर बड़े बड़े पहाड़ों तक सभी हरे रंग में समाहित होते है. वसंत ऋतू के आगमन पर पूरा धरातल हरा-भरा हो जाता है. इस महीने में खेतों में हरे-पीले फूलों को कालीन सी बिछने लगती है. चिकित्सा की दृष्टि से इसे गहरी सास का रंग माना जाता है. मेंटल स्ट्रेस और बॉडी रिलैक्सेशन के लिए भी हरे रंग को बहुत प्रभावशाली माना जाता है.

समुद्र और असमान दोनों का ही नीला रंग होता है. जो आँखों को खास शांति प्रदान करता है. इसके अलावा एकता, शांति, ठंडक, वफादारी और सतर्कता का प्रतीक भी इसी रंग को माना जाता है. यह मानसिक आराम देने का भी काम करता है.

सफ़ेद रंग को शांति का प्रतीक माना जाता है. इसके अलावा एकता, शुद्धता, सत्यता और उज्ज्वलता के प्रतीक भी सफ़ेद रंग ही होता है. सफ़ेद रंग के प्रयोग से व्यक्ति के मन की सभी बुरी भवनाएँ दूर हो जाती है. इसीलिए भारत के राष्ट्रिय ध्वज में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

अब तो भाई सियासतदार खुद ही फैसला कर लें, जो भी सियासतदार जिस भी रंग का ठेकेदार बना है उसकी वफादारी निभा दे, आधी समस्या का समाधान हो जाएगा और फिर न तो कोई मंदिर सूना रह जाएगा न मस्जिद और न ही किसी मजदूर को पार्टी का नुमाइंदा करार दिया जाएगा.

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