सिर्फ शिव हैं जो मरते नहीं, आइए चलें कैलास जहां घोर नास्तिक भी जाकर होता है नतमस्तक

सृष्टि की शुरुआत से शिव अकेले ऐसे देवता हैं, जिनकी निरंतरता बनी हुई है. वे या तो कैलास पर रहते हैं या फिर श्मशान में, और काशी—यह तो महाश्मशान है. शिव उसके अधिपति हैं. इसी तार के जरिए काशी और कैलास का मेल बनता है. दोनों के मूल में शिव हैं.
Kashi and Mount Kailash lake mansarovar, सिर्फ शिव हैं जो मरते नहीं, आइए चलें कैलास जहां घोर नास्तिक भी जाकर होता है नतमस्तक

क्यों न अब आपको एक यात्रा पर ले चला जाए. ये यात्रा मैंने कुछ बरस पहले की थी. फिर आदतन उसे दस्तावेज में दर्ज किया. और इस तरह किताब बनी- द्वितीयोनास्ति. दरअसल मेरे मन में ये जिज्ञासा थी कि काशी और कैलास का क्या रिश्ता? देवताओं के देव महादेव को आखिर कैलास इतना क्यों पसंद है? लिहाज़ा ऋषि-मुनियों के इस नंदनकानन कैलास को देखने की इच्छा बचपन से थी. काशी में जन्म लेने के बाद जब से होश संभाला, यही सोचता था कि शिव अगर कैलास पर रहते हैं तो काशी में क्या करते हैं? इन्हीं सवालों के उत्तर ढूंढने की अपनी यात्रा में आपको भी आज से अपना सहयात्री बना रहा हूं.

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला – भाग 1

कैलास यानी साक्षात् स्वर्ग और काशी, जहां मात्र मरने से स्वर्ग जाते हैं. काशी और कैलास का यही शाश्वत रिश्ता है. कैलास जाने का मैंने जो संकल्प लिया, उसके मूल में यही रिश्ता था, यानी मुझे स्वर्ग जाना था. पर बिना मरे. सब नहीं जा सकते. वहां बुलावे पर ही जाना होता है. हमारे खानदान में कोई नहीं गया. रिश्ते-नातेदार भी नहीं गए. किसी की कल्पना भी नहीं थी कि वहां सशरीर जाया जा सकता है. इसलिए मेरे लिए यह सिर्फ यात्रा नहीं, अंतर्यात्रा थी. अतीत की यादों में जाने का एक आयोजन. पुरखों को तारने का यज्ञ. जीते-जी ‘स्वर्गीय’ होने का सुख. इसलिए हमें कैलास जाना था.

सृष्टि की शुरुआत से शिव अकेले ऐसे देवता हैं, जिनकी निरंतरता बनी हुई है. वे या तो कैलास पर रहते हैं या फिर श्मशान में, और काशी—यह तो महाश्मशान है. शिव उसके अधिपति हैं. इसी तार के जरिए काशी और कैलास का मेल बनता है. दोनों के मूल में शिव हैं. एक स्वर्ग है और दूसरा स्वर्ग जाने का रास्ता. यही सेतु लंबे समय से मैं ढूंढ़ रहा था.

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घुमक्कड़ी प्रवृत्ति देश और समाज को जानने की इच्छा वर्षों से मेरे कैलास जाने के आवेग को बढ़ा रही थी. कई जिज्ञासाएं थीं. शंकर वहां रहते हैं. सभी नदियों के स्रोत वहां हैं. धरती पर ताजे पानी का सबसे बड़ा भंडार वहीं है. राजहंस वहीं पाए जाते हैं. मेरी दादी बचपन में कैलास को स्वप्नलोक-सा बताती थीं. उनके मुताबिक, ‘गीता’ में भगवान् श्रीकृष्ण ने भी कहा ‘मेरूरू शिखरिणामहम्.’ यानी पर्वतों में कैलास मैं ही हूं.

वहां मानसरोवर भी एक अद्भुत रहस्य-लोक है. दिन में कई बार सूरज की स्थिति बदलने से मानसरोवर का रंग बदलता है. ऋषि-मुनि और देवगण यहां बड़े सवेरे ब्राह्म-मुहूर्त में नहाने आते हैं. रिनपोछेजी भी कैलास को उतनी ही श्रद्धा से याद करते थे जितनी श्रद्धा उन्हें भगवान् बुद्ध में थी. रिनपोछेजी तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री थे. बनारस में रहते हुए उनका हमारे घर अकसर आना-जाना हुआ करता था. वे कैलास के अलौकिक सौंदर्य का बखान करते नहीं थकते. बचपन में उन्हीं के जरिए मेरी बौद्ध धर्म की भी समझ बनी.

कहते हैं, ब्रह्मा ब्रह्मलोक में, विष्णु बैकुंठ में और शिव कैलास पर रहते हैं. जिंदा रहते हम न ब्रह्मलोक जा सकते हैं, न बैकुंठ. सिर्फ कैलास ही जाया जा सकता है. शिव आदि हैं, इसलिए कैलास जाना अपनी जड़ों को खोजना है. गंगा के मूल में जाना है. क्षीर सागर की गोद में बैठना है. शिव और गंगा से हमारा बनारसी नाता ही हमें कैलास की ओर खींच रहा था.

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मित्रों ने सचेत किया कि यात्रा कठिन है. जाने से पहले एक बार और सोचिए. लेकिन मेरा तो संकल्प था. मुझे जाना ही है. सोचा, अपनी वसीयत तो लिख ही दूं, ताकि कुछ गड़बड़ हुई तो लोगों को परेशानी न हो. फिर ख्याल आया, अगर उन्हें यही मंजूर है तो मैं यों लिखूं? बिना सोचे-समझे हम चल पड़े—दुनिया की सबसे सुंदर और दुर्गम यात्रा के लिए. शिवत्व की खोज में एक आदिम और अनंत स्मृति की ओर. इस मान्यता के साथ कि कैलास ही मेरु पर्वत है, जो ब्रह्मांड की धुरी है.

हमारी आस्था में कैलास, शिव और पार्वती का निवास है. बौद्ध धर्म में इसे बोधिसवों के पृथ्वी पर उतरने की जगह मानते हैं. जैन धर्म के पहले तीर्थंकर ऋषभदेव की निर्वाण-स्थली है कैलास. इसे ‘अष्टपद’ भी कहते हैं; क्योंकि जैन मानते हैं कि ऋषभदेव ने आठ पग में इसकी परिक्रमा की थी.

बौद्ध धर्म में बुद्ध का अलौकिक रूप ‘डैमचौक’ कैलास पर ही पाया जाता है. बुद्ध के इस रूप को ‘धर्मपाल’ कहते हैं. बौद्ध कैलास को ‘कांग रिनपोचे’ मानते हैं. ‘कांग रिनपोचे’ का मतलब है—आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति. तिब्बत में मान्यता है कि मानसरोवर के पास ही भगवान् बुद्ध महारानी माया के गर्भ में आए थे.

‘बोनपाओ’ बुद्ध से पहले तिब्बतियों का धर्म था. उसके अनुसार, कैलास एक नौ मंजिला स्वस्तिक शिखर था, जिसके जरिए उनके पंथ-प्रवर्तक धरती पर उतरे थे. इस पर्वत के चारों तरफ दिव्य शति और आध्यात्मिकता की तरंगें उठती हैं. उनकी मान्यता जो भी हो, पर कैलास की परिक्रमा में इसे सहज महसूस किया जा सकता है.

सबसे पहले ऋषि मांधाता इस पवित्र भूमि पर आए थे. आदि शंकराचार्य ने अपना शरीर कैलास पर ही छोड़ा था. गुरु नानक देवजी भी इस पर्वत पर ध्यान लगा चुके हैं. स्वामीनारायण संप्रदाय के स्वामीनारायण का यहीं ईश्वर से साक्षात्कार हुआ था. वे उत्तर प्रदेश के गोंडा के छपिया गांव से सीधे यहीं पहुंचे थे.

‘रामायण’ और ‘महाभारत’ में कैलास का वर्णन है. रावण ने इसी जगह शिव की आराधना की थी. वह कैलास पर्वत को उठाकर अपने साथ ले जाना चाहता था. शिव ने बहलाकर उसे ऐसा करने से रोका. अर्जुन ने भी इसी पर्वत पर तपस्या कर भगवान् शंकर से पाशुपत अस्त्र हासिल किया था. युधिष्ठिर यहीं से स्वर्ग गए थे. उस वक्त एक-एक कर उनके सभी साथी इसी रास्ते में छूट गए थे. सिर्फ उनका कुत्ता ही उनके साथ जा पाया था. भस्मासुर यहीं भस्म हुआ था. किसी को भी छूकर भस्म कर देने का वरदान उसे भगवान शिव ने इसी पर्वत पर दिया था. वरदान पाते ही वह शिव की ओर दौड़ पड़ा. शिव को अपनी जान बचाने के लिए भागना पड़ा. ब्रह्मा के मानस से रचा मानसरोवर यहीं है.

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पत्नी की मृत्यु से व्याकुल भगवान शंकर जब सती का शव लेकर घूम रहे थे तो सती का हाथ यहीं गिरा था, जिससे मानसरोवर झील बनी. शिव उस वक़्त क्रोध से विक्षिप्त हो घूम रहे थे. उनके क्रोध को देख देवताओं को लगा, अब महाविनाश होगा. ब्रह्मा ने विष्णु को उनके पीछे भेजा, ताकि सती का शव किसी तरह उनसे अलग किया जाए.

योजना बनी कि सती के अंग गलाए जाएं, क्योंकि शव के रहते शिव का क्रोध शांत नहीं हो पा रहा था. इसलिए यह जगह शक्तिपीठों में भी शुमार है. कैलास पर कभी पर्वतारोहण नहीं हुआ. लोग इस पर्वत पर चढ़ते नहीं, सिर्फ परिक्रमा होती है. यह पर्वत पूजनीय है. इस पर पांव कैसे रखें? शिव का डर है. वे विध्वंसक हैं. अगर न हों तो संसार में अराजकता होगी. बाकी देवता मरते रहते हैं, सिर्फ शिव हैं जो मरते नहीं. वे लोटा भर जल और दो बिल्व पत्र से प्रसन्न हो जाते हैं. घोर नास्तिक भी कैलास जाकर नतमस्तक होता है.

अब सभ्यता की काली छाया मानसरोवर पर भी पड़ने लगी है. यह सरोवर सिकुड़ रहा है. 410 वर्ग किलोमीटर का यह पवित्र सरोवर 10 किलोमीटर तक सिकुड़ गया है. इसे प्रकृति का क्रोध ही मानें. कालिदास होते तो देखते कि उनके हिमालय को क्या हो गया. क्या यह वही हिमालय है, जिसका वर्णन ‘रघुवंश’ और ‘कुमारसंभव’ में हुआ है. सभ्यता वहां पहुंच चुकी है, इसलिए हिमालय के दिव्य आकार में भयानक उत्पात हो रहा है.

जारी… भाग-2, मिथ नहीं है महादेव शिव की तीसरी आंख, पढ़ें- क्या कहते हैं पौराणिक शास्त्र और आधुनिक विज्ञान

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