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मिथ नहीं है महादेव शिव की तीसरी आंख, पढ़ें- क्या कहते हैं पौराणिक शास्त्र और आधुनिक विज्ञान

यह तीसरी आंख सिर्फ ‘मिथ’ नहीं है. आधुनिक शरीर-शास्त्र भी मानता है कि हमारी आंखों की दोनों भृकुटियों के बीच एक ग्रंथि है और वह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा है. रहस्यपूर्ण भी. इसे पीनियल ग्रंथि कहते हैं. जो हमेशा सक्रिय नहीं रहती, पर इसमें संवेदना ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता है. इसे ही शिव का तीसरा नेत्र कहते हैं.

  • TV9 Hindi
  • Publish Date - 11:02 am, Wed, 3 June 20

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला – भाग 2

कैलास की यात्रा में एक प्रश्न बार-बार जहन में कौंधता रहा कि आखिर शिव में ऐसा क्या है, जो उत्तर में कैलास से लेकर दक्षिण में रामेश्वरम तक वे एक जैसे पूजे जाते हैं? उनके व्यक्तित्व में कौन सा चुंबक है, जिस कारण समाज के भद्रलोक से लेकर शोषित, वंचित, भिखारी तक उन्हें अपना मानते हैं? वे सर्वहारा के देवता हैं. उनका दायरा इतना व्यापक क्यों है?

राम का व्यक्तित्व मर्यादित है, कृष्ण का उन्मुक्त और शिव असीमित व्यक्तित्व के स्वामी. वे आदि हैं और अंत भी. शायद इसीलिए बाकी सब देव हैं, केवल शिव महादेव. वे उत्सवप्रिय हैं. शोक, अवसाद और अभाव में भी उत्सव मनाने की उनके पास कला है. वे उस समाज में भरोसा करते हैं, जो नाच-गा सकता हो. यही शैव परंपरा है. जर्मन दार्शनिक फ्रेडरिक नीत्शे कहते हैं—‘‘उदास परंपरा बीमार समाज बनाती है.’’ शिव का नृत्य श्मशान में भी होता है. श्मशान में उत्सव मनाने वाले वे अकेले देवता हैं. तभी तो पं. छन्नूलाल मिश्र भी गाते हैं—‘‘खेलै मसाने में होरी दिगंबर खेलै मसाने में होरी. भूत, पिशाच, बटोरी दिगंबर खेलै मसाने में होरी.’’ यह गायन लोक का है.

सिर्फ देश में ही नहीं, विदेश में भी शिव की गहरी व्याप्ति है. हिप्पी संस्कृति ’60 के दशक में अमेरिका से भारत आई. हिप्पी आंदोलन की नींव यूनानियों की प्रति संस्कृति आंदोलन में देखी जा सकती है. पर हिप्पियों के आदि देवता शिव तो हमारे यहां पहले से ही मौजूद थे या कहें, शिव आदिहिप्पी थे. अधनंगे, मतवाले, नाचते-गाते, नशा करते भगवान् शंकर. इन्हें भंगड़, भिक्षुक, भोला-भंडारी भी कहते हैं. आम आदमी के देवता, भूखे-नंगों के प्रतीक. वे हर वक्त सामाजिक बंदिशों से आजाद होने, खुद की राह बनाने और जीवन के नए अर्थ खोजने की चाह में रहते हैं.

यही मस्तमौला हिप्पीपन उनके विवाह में अड़चन था. देवी के पिता इस हिप्पी से बेटी ब्याहने को तैयार नहीं थे. कोई भी पिता किसी भूखे, नंगे, मतवाले से बेटी ब्याहने की इजाजत कैसे देगा. शिव की बारात में नंग-धड़ंग, चीखते-चिल्लाते, पागल, भूत-प्रेत, मतवाले सब थे. लोग बारात देख भागने लगे. शिव की बारात ही लोक में उनकी व्याप्ति की मिसाल है.

हमारी परंपरा में विपरीत ध्रुवों और विषम परिस्थितियों से अद्भुत सामंजस्य बिठानेवाला उनसे बड़ा कोई दूसरा भगवान् नहीं है. मसलन, वे अर्धनारीश्वर होकर भी काम पर विजेता हैं. गृहस्थ होकर भी परम विरक्त हैं. नीलकंठ होकर भी विष से अलिप्त हैं. उग्र होते हैं तो तांडव, नहीं तो सौम्यता से भरे भोला भंडारी हैं. परम क्रोधी पर दयासिंधु भी शिव ही हैं. विषधर नाग और शीतल चंद्रमा दोनों उनके आभूषण हैं. उनके पास चंद्रमा का अमृत है और सागर का विष भी. वे ऋद्धि-सिद्धि के स्वामी होकर भी उनसे अलग हैं. सांप, सिंह, मोर, बैल, सब आपस का वैर भाव भुला समभाव से उनके सामने हैं. वे समाजवादी व्यवस्था के पोषक. सिर्फ संहारक नहीं, वे कल्याणकारी, मंगलकर्ता भी हैं. यानी शिव विलक्षण समन्वयक हैं, महान कोऑर्डिनेटर.

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शिव गुटनिरपेक्ष हैं. सुर और असुर दोनों का उनमें विश्वास है. राम और रावण दोनों उनके उपासक हैं. दोनों गुटों पर उनकी समान कृपा है. आपस में युद्ध से पहले दोनों पक्ष उन्हीं को पूजते हैं, इसलिए वे दक्षिण में भी वैसे ही पूजे जाते हैं जैसे उत्तर में. लोक-कल्याण के लिए वे हलाहल पीते हैं, जो हर किसी को अप्रिय है. वह उन्हें प्रिय है. वे डमरू बजाएं तो प्रलय होता है. लेकिन प्रलयंकारी इसी डमरू से संस्कृत व्याकरण के चौदह सूत्र भी निकलते हैं. इन्हीं माहेश्वर सूत्रों से दुनिया की कई दूसरी भाषाओं का जन्म हुआ.

आज पर्यावरण बचाने की चिंता विश्वव्यापी है. शिव पहले पर्यावरण-प्रेमी हैं, पशुपति हैं, निरीह पशुओं के रक्षक हैं. आर्य जब जंगल काट बस्तियां बसा रहे थे, खेती के लिए जमीन तैयार कर रहे थे, गाय को तो दूध के लिए प्रयोग में ला रहे थे पर बछड़े का मांस खा रहे थे, तब शिव ने बूढ़े बैल नंदी को वाहन बनाया. सांड़ को अभयदान दिया. जंगल कटने से बेदखल सांपों को आश्रय दिया.

कोई उपेक्षितों को गले नहीं लगाता; महादेव ने उन्हें गले लगाया. श्मशान, मरघट में कोई नहीं रुकता; शिव ने वहां अपना ठिकाना बनाया. जिस कैलास पर ठहरना कठिन है, जहां कोई वनस्पति नहीं, प्राणवायु नहीं, वहां उन्होंने धूनी लगाई. दूसरे सारे भगवान अपने शरीर के जतन के लिए न जाने कौन-कौन सा द्रव्य लगाते हैं; शिव केवल भभूत का इस्तेमाल करते हैं. उनमें रत्ती भर लोक-दिखावा नहीं है. बाकी के देवता अपनी पोशाक पर बहुत खर्च करते हैं. पर भोलेनाथ का काम सिर्फ व्याघ्रचर्म से ही चलता है. शिव उसी रूप में विवाह के लिए जाते हैं, जिसमें वे हमेशा रहते हैं. वे साकार हैं, निराकार भी. इस सबसे अलग डॉक्टर लोहिया उन्हें गंगा की धारा के लिए रास्ता बनानेवाला अद्वितीय इंजीनियर मानते थे.

शिव न्यायप्रिय हैं. मर्यादा तोड़ने पर दंड देते हैं. काम बेकाबू हुआ तो उन्होंने उसे भस्म किया. अगर किसी ने अति की तो उसे ठीक करने के लिए उनके पास तीसरी आंख भी है. तिब्बती लोग तो कैलास पर्वत में ही बाकायदा तीसरी आंख बतलाते हैं. दरअसल, यह तीसरी आंख सिर्फ ‘मिथ’ नहीं है. आधुनिक शरीर-शास्त्र भी मानता है कि हमारी आंखों की दोनों भृकुटियों के बीच एक ग्रंथि है और वह शरीर का सबसे संवेदनशील हिस्सा है. रहस्यपूर्ण भी. इसे पीनियल ग्रंथि कहते हैं. जो हमेशा सक्रिय नहीं रहती, पर इसमें संवेदना ग्रहण करने की अद्भुत क्षमता है. इसे ही शिव का तीसरा नेत्र कहते हैं, जिसके खुलने पर प्रलय होगा ऐसी अनंत काल से मान्यता है. सृष्टि भी इसी इकबाल से चल रही है.

शिव का व्यक्तित्व विशाल है. वे काल से परे महाकाल हैं, सर्वव्यापी हैं, सर्वग्राही हैं. सिर्फ भक्तों के नहीं, देवताओं के भी संकटमोचक हैं, उनके ताकतवर ‘ट्रबल शूटर’ हैं. शिव का पक्ष सत्य का पक्ष है. उनके निर्णय लोक-मंगल के हित में होते हैं. जीवन के परम रहस्य को जानने के लिए शिव के इन रूपों को समझना जरूरी होगा; क्योंकि शिव उस आम आदमी की पहुंच में हैं, जिसके पास मात्र एक लोटा जल है. शायद इसीलिए उत्तर में कैलास से दक्षिण में रामेश्वरम तक उनकी व्याप्ति और श्रद्धा एक-सी है.

शिव के नटराज रूप की परिकल्पना भले दक्षिण भारत से आई हो, पर शिव का महानृत्य पहली बार कैलास पर्वत पर ही हुआ. मान्यता है कि शंकर का नृत्य ही सृष्टि का विधान है. जगत की रक्षा के लिए शिव हर संध्या को नृत्य किया करते थे. उस समय सभी देव, यक्ष, किन्नर आदि उनकी सेवा में उपस्थित रहते थे. एक शंकर की पूजा से सबकी पूजा हो जाती थी. ‘नटराज सहस्रनाम’ और ‘प्रदोषस्तोत्रम्’ में इसका वर्णन है. कैलास पर्वत पर ही शैलपुत्री को रत्नजड़ित सिंहासन पर बिठाकर शिव जब नृत्य की अभिलाषा करते, तब सभी देवगण उनकी सेवा में उपस्थित होते. वाग्देवी हाथ में वीणा और इंद्र वेणु के साथ आते. ब्रह्मा करतल से ताल जगाते. भगवती रमा का गायन होता. विष्णु स्निग्ध मृदंग-वादन में अपनी पटुता दिखाते और शिव डमरू बजाते हुए जो नृत्य शुरू करते तो आसमान से पुष्पवर्षा शुरू हो जाती.

जारी …भाग-3, 26 की जगह 5 दिनों में करने की ठानी कैलास मानसरोवर यात्रा, जाने से पहले करिए ये जरूरी तैयारियां