मध्य प्रदेश कैबिनेट एक्सपेंशन- ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’…

शिवराज सरकार के नए कैबिनेट में सिंधिया खेमे का खासा दबदबा है. लिहाज़ा इसे सिंधिया कैबिनेट कहना भी गलत नहीं होगा क्योंकि इन 28 में सिंधिया खेमे के 9 और कांग्रेस के 3 अन्य बागी मिलाकर कुल 12 लोगों को जगह मिली है.
Madhya Pradesh cabinet expansion, मध्य प्रदेश कैबिनेट एक्सपेंशन- ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’…

गुरुवार को मध्य प्रदेश सरकार (Madhya Pradesh Government)  में कुल 28 मंत्रियों ने शपथ ली. जिसमें से 20 कैबिनेट औऱ 8 राज्य मंत्री सरकार का हिस्सा बन गए. सीएम के अलावा मध्य प्रदेश में मंत्रियों की संख्या अब कुल 33 हो गई है. यानि कोटा फुल हो चुका है. ज़ाहिर है आने वाले 24 उपचुनावों को देखते हुए ये कैबिनेट एक्सपेंशन काफी अहम माना जा रहा है.

इस कैबिनेट में सिंधिया खेमे का खासा दबदबा है. लिहाज़ा इसे सिंधिया कैबिनेट कहना भी गलत नहीं होगा क्योंकि इन 28 में सिंधिया खेमे के 9 और कांग्रेस के 3 अन्य बागी मिलाकर कुल 12 लोगों को जगह मिली है. सिंधिया खेमे में 5 को कैबिनेट और 4 को राज्यमंत्री बनाया गया है. पुराने 2 कैबिनेट मंत्रियों को मिला लिया जाए तो सिंधिया समर्थक मंत्रियों की कुल संख्या 11 हो जाती है.

Madhya Pradesh cabinet expansion, मध्य प्रदेश कैबिनेट एक्सपेंशन- ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’…

ऐसा पहली बार होगा जब किसी मंत्रीमंडल में 14 पूर्व विधायक हैं जो आने वाले दिनों में उपचुनाव लड़ेंगे और उसके बाद विधानसभा सदस्य निर्वाचित होंगे. जानकारी के मुताबिक कैबिनेट एक्सपेंशन में सबसे बड़ी अड़चन सिंधिया और उनके गुट के समर्थकों के साथ किए गए वादे के चलते आ रही थी.

‘सिंधिया कमज़ोर नहीं हुए बल्कि और ताकतवर होकर उभरे’

सूत्र बताते हैं कि ज़्योतिरादित्य सिंधिया ये दिखा देना चाहते थे कि भले ही वो कांग्रेस छोड़कर आए हों लेकिन उनका दबदबा पहले से और ज़्यादा बढ़ गया है. वो ये भी चाहते थे कि ऐसा मैसेज कैबिनेट एक्सपेंशन के ज़रिए सभी तक पहुंच जाए कि कांग्रेस से कटकर सिंधिया कमज़ोर नहीं हुए बल्कि और ताकतवर होकर उभरे हैं.

सिंधिया गुट के पूर्व विधायकों को मंत्री बनाना इस लिहाज़ से भी ज़रुरी था कि बार-बार कांग्रेस की ओर से किए जा रहे हमलों का जवाब इसी तरह से मुमकिन था. जवाब ये कि ज्योतिरादित्य सिंधिया को बीजेपी कांग्रेस से ज़्यादा महत्व देती है और आगे भी देती रहेगी.

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PS- Social Media

सिंधिया के इस बयान की चर्चा करनी भी ज़रुरी है जिसमें उन्होंने कहा कि – कमलनाथ जी और दिग्विजय सिंह जी सुन लीजिए, टाइगर अभी ज़िंदा है. गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान ने इस डायलॉग का इस्तेमाल चुनाव हारने के बाद शुरू किया था और हर मंच से लोगों को ये डायलॉग सुनाया करते थे. आज शिवराज सिंह चौहान के मंच से ज्योतिरादित्य सिंधिया ने यही डायलॉग सुना दिया. इसपर शिवराज सिंह भी मुस्कुराते नज़र आए.

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किसे फायदा – किसे नुकसान?

बीजेपी की इस कैबिनेट की बात करें तो कांग्रेस खेमे के जिन 14 लोगों को अभी तक मंत्री बनाया गया है. इस बात में कोई दोराय नहीं कि उनका चुनाव जीत पाना काफी टेढी खीर है क्योंकि बीजेपी के सूत्र बताते हैं कि इन सभी के क्षेत्रों से ज़मीनी रिपोर्ट अच्छी नहीं है. न तो बीजेपी के कार्यकर्ता इन्हें काम करने के लिए मिल रहे हैं और न हि कांग्रेस के कार्यकर्ता इन्हें अपना मान रहे हैं तो मुमकिन है कि इनके मंत्री बनने के बाद क्षेत्र में इनका दबदबा बढ़ जाए. ऐसी उम्मीद की जा रही है कि मंत्री बनने के बाद ये अपनी जीत सुनिश्चित करने की दिशा में काम कर सकेंगे.

जातिगत तौर पर हर वर्ग को साधने की कोशिश की तो गई है लेकिन समझौते के बंधन में बंधी बीजेपी इसमें पूरी तरह से सफल नहीं हो पाई है. आने वाले दिनों में इसके परिणाम क्या होंगे बीजेपी के सामने बड़ा सवाल खड़ा है. सबसे ज्यादा ओबीसी औऱ सामान्य वर्ग को तरजीह दी गई है. जबकि अनुसूचित जाति के हिस्से में 4 और अनुसूचित जनजाति के हिस्से में 5 मंत्री पद आए हैं.

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सीनियर विधायकों की अनदेखी पड़ सकती है भारी

ऐसे वक्त में जब उपचुनावों की सीटों में 9 सीटें अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित हैं सिर्फ 4 अनुसूचित जाति के लोगों को मंत्री बनाना समस्या बन सकता है. वहीं जहां 1 सीट पर अनुसूचित जनजाति का चुनाव होना है, इस वर्ग के पास 5 मंत्रीपद चले गए हैं. बीजेपी ने 8 राजपूतों को मंत्री बना दिया है, चंबल ग्वालियर क्षेत्र में ऐसे कई इलाके हैं जहां राजपूत औऱ अनुसूचित जाति के वोट पूरी तरह से विपरीत धुरी है. इसका परिणाम क्या होगा इसपर भी विचार ज़रुरी है.

सीनियर विधायकों की अनदेखी आने वाले विधानसभा सत्र पर भारी पड़ सकती है. इस मंत्रीमंडल में कई चेहरे ऐसे हैं जिसे लेकर कोई थ्योरी गले नहीं उतर रही. जैसे बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कुछ नेता मंत्री कैसे बन गए किसी को समझ नहीं आ रहा. जिसमें सबसे पहला नाम बृजेंद्र सिंह का है. बीजेपी के अंदरखाने की बात करें तो चर्चा हैं कि बृजेंद्र सिंह को मंत्री बनवाने में नरेंद्र सिंह तोमर का बड़ा हाथ है.

दूसरा नाम राम खेलावन पटेल का है. बीजेपी में चर्चा का विषय ये है कि विंध्य क्षेत्र से अगर आपको चुनना ही था तो केदार शुक्ला, गिरीश गौतम या राजेंद्र शुक्ला को चुनना था. रामखेलावन ही क्यों ? सूत्र बताते हैं कि रामखेलावन पटेल सांसद गणेश सिंह की सिफारिश से मंत्रीमंडल में रखे गए हैं.

मालवा क्षेत्र की बात करें तो मोहन यादव और ऊषा ठाकुर दोनों को मंत्रीमंडल में जगह मिली. जबकि कैलाश विजयवर्गीय के कट्टर समर्थक रमेश मेंदोला सीनियर होने के बाद भी मंत्रीमंडल में स्थान नहीं बना सके. कैलाश विजयवर्गीय भी इससे काफी आहत नजर आ रहे हैं.

भिंड ज़िले से ही ओपीएस भदौरिया और अरविंद भदौरिया दोनों को मंत्री बनाया गया. जबकि दोनों एक ही ज़िले से औऱ एक ही जाति के हैं. सूत्र बताते हैं कि ओपीएस भदौरिया अचानक से मंत्रीमंडल के लिए चुन लिए गए, जो विवाद का विषय बना.

ओपीएस का नाम आने के बाद मीटिंग के दौरान काफी गहमा गहमी हुई क्योंकि अरविंद भदौरिया बीजेपी कोटे के थे और ओपीएस सिंधिया कोटे के. आखिर में तय किया गया कि अरविंद भदौरिया और ओपीएस भदौरिया दोनों मंत्री बनेंगे. एक जिले से 2 मंत्री वो भी दोनों ठाकुर वर्ग के, बीजेपी ने यहां भी बड़ा समझौता किया है. इस तरह के समझौते पार्टी के लिए आने वाले दिनों में भारी पड़ सकते हैं.

वहीं गौरीशंकर बिसेन, राजेंद्र शुक्ला, संजय पाठक, रामपाल सिंह, सुरेंद्र पटवा, पारस जैन जैसे दिग्गजों का मंत्री नहीं बनाया जाना पार्टी के लिए मुश्किल हो सकता है. क्योंकि विधानसभा सत्र में क्या गणित बैठेगा और इस दौरान अपने विधायकों की बीजेपी को कितनी ज़रुरत पड़ेगी ये बताने की जरुरत नहीं है.

ये ऐसे तथ्य हैं जिसका जवाब बीजेपी आने वाले दिनों में जनता को देना होगा. खासतर जातिगत समीकरणों को साधने के लिए जरुरी होगा कि इसे जनता के बीच जाकर जस्टीफाई किया जाए.

क्या करेगी कांग्रेस?

इस कैबिनेट एक्सपेंशन का सिर्फ बीजेपी को नहीं बल्कि कांग्रेस को भी इंतज़ार था क्योंकि इस विस्तार के बाद कांग्रेस ने भी अपने चुनाव अभियान की शुरुआत करने का ऐलान कर दिया है. कांग्रेस शुक्रवार को बदनावर सीट से चुनाव अभियान शुरु करने जा रही है और मुख्यमंत्री कमलनाथ इसे हरी झंडी दिखाएंगे. इस अभियान का नाम लोकतंत्र बचाओ अभियान रखा गया है. आने वाले दिनों में कांग्रेस इन सभी मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाएगी.

सबसे बड़ा मुद्दा सिंधिया और उनके समर्थकों का विश्वासघात होगा, वहीं दूसरा बड़ा मुद्दा शिवराज सिंह चौहान के इस जंबो मंत्रिमंडल का सियासी समीकरण भी है जिसमें सवर्णों को दी गई तवज्जो चंबल ग्वालियर इलाके में बीजेपी पर भारी पड़ने वाली है.

Madhya Pradesh cabinet expansion, मध्य प्रदेश कैबिनेट एक्सपेंशन- ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा’…

फिलहाल इस मंत्रीमंडल को लेकर जो इंतज़ार लंबे वक्त से चल रहा था उसपर विराम लग गया है. हालांकि इस मंत्रीमंडल में शिवराज सिंह चौहान की झलक कम औऱ संगठन, हाईकमान, आरएसएस और सिंधिया की झलक ज्यादा नज़र आ रही है.

ज़ाहिर है आने वाले दिनों में शिवराज सरकार में दखलअंदाज़ी भी बढ़ने वाली है. कांग्रेस के पास मौकों की कमी नहीं रहने वाली. लिहाज़ा ज़रुरी है कि कांग्रेस मुद्दों को सही वक्त और सही तरह से उठाए जिससे उसे फायदा मिले, नुकसान नहीं.

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