Exit Polls: हारी हुई पार्टी की तरह महाराष्‍ट्र-हरियाणा में लड़ी कांग्रेस

सवाल यह उठता है कि कांग्रेस की इस स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्‍मेदार है? पार्टी के नेता और कार्यकर्ता या गांधी परिवार?

नई दिल्‍ली: महाराष्‍ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव 2019 के लिए सोमवार को मतदान संपन्‍न हो गया. ईवीएम में जनता का वोट कैद होने के साथ ही विभिन्‍न चैनलों पर सामने आए एग्जिट पोल्‍स एक बार फिर कांग्रेस के लिए बुरी खबर लाए हैं.

महाराष्‍ट्र और हरियाणा में बीजेपी को बहुमत से भी ज्‍यादा सीटें एग्जिट पोल्‍स में दिख रही हैं, जबकि महाराष्‍ट्र-हरियाणा में कांग्रेस अपने पिछले बुरे प्रदर्शन से भी नीचे खिसकती दिख रही है.

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लोकसभा चुनाव 2019 के बाद महाराष्‍ट्र और हरियाणा की इस पहली परीक्षा में कांग्रेस बुरी तरह हारती दिख रही है. महाराष्‍ट्र-हरियाणा में कांग्रेस को वैसी ही हार मिलती दिख रही है, जिस प्रकार से उसके नेताओं ने चुनाव प्रचार के दौरान भविष्‍यवाणियां की थीं.

महाराष्‍ट्र और हरियाणा में कांग्रेस के पास नेतृत्‍व को लेकर महीनों से संकट बना हुआ था. हरियाणा में तो कम से कम चुनाव से ऐन पहले भूपेंद्र सिंह हुड्डा को कमान तो सौंप दी गई, लेकन महाराष्‍ट्र में तो एक भी सर्वमान्‍य नेता ही कांग्रेस को नहीं मिल सका.

2014 से पहले लंबे समय तक कांग्रेस का गढ़ रहे हरियाणा और महाराष्‍ट्र में आज ये नौबत आ गई है कि पार्टी का करीब-करीब सूपड़ा ही साफ होता नजर आ रहा है.

हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अशोक तंवर को हटाकर चुनाव से ऐन पहले पूर्व केंद्रीय मंत्री कुमारी शैलजा को दी गई. पार्टी में कलह और गुटबाजी की खबरों के बीच पूर्व सीएम भूपिंदर सिंह हुड्डा को विधानसभा में पार्टी का नेता घोषित किया गया, लेकिन फैसला बहुत ही देरी से लिया गया.

महाराष्‍ट्र में संजय निरुपम ने खुलकर बगावत कर दी. यहां भी पार्टी के ही नेता अपनी ही हार की घोषणा करते दिखे. कुल मिलाकर कहा जाए तो कांग्रेस ने महाराष्‍ट्र और हरियाणा में एक हारी हुई पार्टी की तरह चुनाव लड़ा और आखिरकार एग्जिट पोल्‍स भी यही बता रहे हैं.

एग्जिट पोल्‍स के नतीजे देखकर स्‍पष्‍ट कहा जा सकता है कि कांग्रेस न केवल राष्‍ट्रीय बल्कि राज्‍य, जिला और यहां तक कि पंचायत स्‍तर तक नेतृत्‍व के अभाव में चल रही है. कांग्रेस में इस समय हर नेता, दूसरे नेता का विरोधी है, मतलब हाथ के पंजे की उंगलियां मुट्ठी नहीं बन पा रही हैं और मुट्ठी बनाए विरोधी पर कांग्रेस वार करे भी तो कैसे? अब सवाल यह उठता है कि कांग्रेस की इस स्थिति के लिए आखिर कौन जिम्‍मेदार है? पार्टी के नेता और कार्यकर्ता या गांधी परिवार?

यह सच है कि कांग्रेस पार्टी में गुटबाजी इस समय चरम है और यह गुटबाजी इसलिए उभरी है, क्‍योंकि शीर्ष नेतृत्‍व मतलब गांधी परिवार के ही गुटबाजी के लक्षण देखने को मिल रहे हैं. हम यह तो दावे के साथ नहीं कह सकते हैं कि गांधी परिवार के तीन महत्‍वपूर्ण सदस्‍यों- राहुल गांधी, प्रियंका गांधी और सोनिया गांधी के बीच कोई झगड़ा चल रहा है, लेकिन टिकट बंटवारे और प्रचार के वक्‍त राहुल गांधी का छुट्टी पर जाना यही बताता है कि गांधी परिवार में समन्‍वय तो कम से कम नहीं है.

इस समय सोनिया गांधी भले ही पार्टी की कमान संभाल रही हैं, लेकिन पार्टी में राहुल गांधी के समर्थक लोकसभा चुनाव के बाद जिस बदलाव की गुहार लगा रहे थे, वह बदलाव सोनिया गांधी के दरवाजे तक पहुंचते ही सिसकियां लेता दिखा. मतलब यह हुआ कि राहुल गांधी के अध्‍यक्ष बनने के बाद भी वह पार्टी में आमूलचूल परिवर्तन नहीं कर सके. ऐसा क्‍यों हुआ? क्‍या सोनिया गांधी के भरोसेमंद इस काम में रोड़ा बने? क्‍या राहुल गांधी बड़े स्‍तर पर बदलाव की हिम्‍मत नहीं जुटा सके? क्‍या सोनिया गांधी, राहुल गांधी या प्रियंका गांधी में से कोई भी अब कांग्रेस का नेतृत्‍व करने का इच्‍छुक नहीं है? क्‍या अब सही समय आ गया है जब गांधी परिवार से अलग जाकर कांग्रेस पार्टी को किसी युवा और तेज-तर्रार नेता पर भरोसा करना चाहिए? या पूरी कमान अब प्रियंका गांधी को सौंप देनी चाहिए? लेकिन क्‍या प्रियंका गांधी ये जिम्‍मेदारी उठाना चाहती हैं?

ये सभी सवाल हैं, जो कांग्रेस के भविष्‍य का फैसला करेंगे और ये ही वो सवाल हैं, जिनके चलते कांग्रेस 2014 के बाद से एक के बाद एक चुनाव हार रही है.

महाराष्‍ट्र और हरियाणा भी कांग्रेस इसलिए हारती दिख रही है, क्‍योंकि इन सवालों के जवाब समय से नहीं तलाशे गए. यूं तो कांग्रेस के लिए अब काफी देर हो चुकी हैं, लेकिन पुरानी कहावत है- जब जागो तभी सवेरा। कांग्रेस को इसी पर विचार करते हुए जल्‍द से जल्‍द उन सभी सवालों के जवाब खोजने चाहिए, जिनका हमने ऊपर जिक्र किया.