8 राज्‍यों में बेहद कम हैं हिंदू आबादी, फिर क्‍यों नहीं मिलते ‘अल्‍पसंख्‍यक’ वाले फायदे?

अगर कानून की परिभाषा में हिंदू अल्‍पसंख्‍यक है हीं नहीं तो जिन राज्‍यों में हिंदुओं की संख्‍या न के बराबर है, उन्‍हें राज्य सरकारें कैसे अल्‍पसंख्‍यक मान सकती हैं?

नई दिल्‍ली: प्रचंड बहुमत से सत्‍ता में पहुंची मोदी सरकार ने अपनी दूसरी पारी में अल्‍पसंख्‍यकों के हितों के लिए फैसले लेने शुरू कर दिए हैं लेकिन उसके फैसलों पर सवाल भी उठने लगे हैं. सवाल ये कि आखिर सिर्फ मुस्लिम, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध जैसे धर्म ही अल्‍पसंख्‍यकों के दायरे में क्‍यों हैं?

देश के कई हिस्‍से ऐसे हैं जहां हिंदुओं की संख्‍या नाम-मात्र की है तो उन्‍हें अल्‍पसंख्‍यकों को मिलने वाला फायदा आखिर क्‍यों नहीं दिया जा सकता? क्‍यों हिंदुओं की कम आबादी को सालों ने अनदेखा किया जा रहा है? अल्‍पसंख्‍यकों के लिए बुधवार को तमाम योजनाओं का ऐलान किया गया है, तब ये सवाल उठाए हैं वाराणसी के साधु-संतों ने.

‘सबका साथ सबका विकास और सबका विश्‍वास’ के साथ अपनी सरकार की दूसरी पारी शुरू करने से पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने साफ कर दिया था कि इस बार देश के अल्‍पसंख्‍यकों के लिए उनके पिटारे में बहुत कुछ है. मोदी ने साफ कर दिया था कि हमेशा की तरह अल्‍पसंख्‍यकों के साथ हो रहे छल में मोदी सरकार 2 की नीतियां छेद कर देंगी. इसकी शुरुआत हुई अल्‍पसंख्‍यक छात्र-छात्राओं को स्‍कॉलरशिप देने के ऐलान के साथ.

मोदी कैबिनेट के इस फैसले का स्‍वागत तो हुआ लेकिन साथ ही एक सबसे बड़ा सवाल भी खड़ा हो गया कि देश में अल्‍पसंख्‍यक आखिर है कौन? इस सवाल के सामने आने की वजह भी बताते हैं. अब तक भारत में बौद्ध, सिख, मुस्लिम, जैन जैसे धर्मों को अल्‍पसंख्‍यकों का दर्जा दिया जाता रहा है. आंकड़ों के मुताबिक, लक्षद्वीप में हिंदुओं की तादाद 2 प्रतिशत तो मुस्लिमों की संख्‍या 97% है. मिजोरम में हिंदू सिर्फ 3% हैं जबकि ईसाई 90% हैं. नगालैंड में भी 90% ईसाई हैं और 8% हिंदू.

बात कश्‍मीर की करें तो वहां हिंदू आबादी 28% है जबकि मुस्लिम आबादी 69%. मेघालय में हिंदू 11% हैं जबकि ईसाई 84%. ऐसे में इन राज्‍यों में हिंदुओं को अल्‍पसंख्‍यक का दर्जा क्‍यों नहीं दिया जा सकता? ईद के मद्देनजर 5 करोड़ अल्‍पसंख्‍यक छात्र-छात्राओं के लिए वजीफे के ऐलान का स्‍वागत करते हुए अखिल भारतीय संत समिति ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को धन्‍यवाद भेजा. समिति ने छात्रवृत्ति दिए जाने से पहले देश में राज्‍यवार अल्‍पसंख्‍यक की परिभाषा तय करने की मांग की है.

स्‍वामी जितेद्रानंद सरस्‍वती ने पत्र में कहा है कि 8 राज्‍यों में हिंदू भी अल्‍पसंख्‍यक हैं. उन राज्‍यों में हिंदू भी दीन-हीन, अपमानित और उपेक्षित महसूस करते हैं. सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक बेंच ने 2002 में कहा है कि अल्‍पसंख्‍यक की स्थिति राष्‍ट्रीय स्‍तर पर नहीं, बल्कि राज्‍य स्‍तर पर तय की जानी चाहिए, लेकिन ऐसा आज तक नहीं हुआ. सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार राज्‍यवार परिभाषा तय करने के बाद ही छात्रवृत्ति बांटी जाए.

अल्‍पसंख्‍यक मामलों के केंद्रीय मंत्री मुख्‍तार अब्‍बास नकवी ने कहा है कि केंद्र सरकार नीति बनाती है, लेकिन अल्‍पसंख्‍यक का दर्जा और दायरा तय नहीं करती. अल्‍पसंख्‍यक का दर्जा राज्‍य सरकारें तय करती हैं. लेकिन सवाल यही है कि अगर कानून की परिभाषा में हिंदू अल्‍पसंख्‍यक है हीं नहीं तो जिन राज्‍यों में हिंदुओं की संख्‍या न के बराबर है, उन्‍हें राज्य सरकारें कैसे अल्‍पसंख्‍यक मान सकती हैं?

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