तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

चीनी हमले से पहले राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा. भारत से उसका नाता बौद्ध धर्म के तिब्बत में प्रवेश के साथ शुरू हुआ. सन् 1249 से 1368 तक यहां मंगोलों का शासन था. 1649 से 1910 तक तिब्बत मंचू आधिपत्य में रहा. उसके बाद सन् 1949 तक वह स्वतंत्र देश था. 1947 में नई दिल्ली के एफ्रो-एशियाई सम्मेलन में भी तिब्बत एक स्वतंत्र देश के रूप में शामिल हुआ.
Tibet China struggle, तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग- 9 

प्रभु के दर्शन की परम संतुष्टि चित्त वृत्ति को पुलकित कर रही थी. वैसे चित्त प्रसन्न ही होता है, पुलकित तो चित्तधारी तन होता है. तन-मन एकाकार हो गया, इसलिए ‘चित्त’ लिखा. हम मानसरोवर से वापस लौटने लगे. गाड़ी में बार-बार गरदन पीछे मुड़ जाती. अरे, कैलास तो छूटा जा रहा है! लगा, जो इकट्ठा किया था, वह छूट रहा है. अब इस जन्म में दुबारा कभी आ पाऊंगा क्या? प्रभु हमें फिर आना है; पर कब? इसे तो आपको ही तय करना है. हम तो आपके गण हैं. जो स्वामी का आदेश.

रह-रहकर एक बात कचोट रही थी. हमारे प्रभु का निवास विदेश में! यह क्यों? हम कैसे काहिल और निकम्मे लोग हैं! ऐसी गलती क्यों और कैसे हुई कि हमारे प्रभु का घर विदेश में चला गया? मैंने हिमालय नीति पर डॉ. राम मनोहर लोहिया को पढ़ा था. उनका दिमाग साफ था. उन्होंने इस सवाल पर नेहरू से पूछा था, ‘‘कौन कौम है, जो अपने बड़े देवी-देवताओं को परदेश में बसाया करती है. छोटे-मोटे को बसा भी दे, लेकिन शिव-पार्वती को विदेश में बसा दें. यह कभी हुआ नहीं, हो भी नहीं सकता.’’

Tibet China struggle, तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

डॉक्टर साहब चीन द्वारा तिब्बत को हड़पे जाने से व्याकुल थे. इस मुद्दे पर वे प्रधानमंत्री नेहरू के कटु आलोचक थे. उनका कहना था, ‘‘मैकमोहन रेखा—(भारत-चीन की मौजूदा सरहद) तो हिंदुस्तान और चीन की सीमा है ही नहीं, न हो सकती है. होनी भी नहीं चाहिए. अगर तिब्बत आजाद रहता तो हम अपने कैलास मानसरोवर के इलाके को, जो कभी हिंदुस्तान का राजकीय हिस्सा था, तिब्बत की रखवाली में रख भी सकते थे. क्योंकि तिब्बत हमारा भाई है नेपाल की तरह. लेकिन अगर तिब्बत आजाद नहीं रहता तो हिंदुस्तान और चीन की सीमा मैकमोहन न होकर 70-80 मील और उत्तर में कैलास मानसरोवर के उस पार होनी चाहिए थी. जो इसे नहीं मानते, उनके लिए मेरा छोटा सा जवाब होगा- हिंदुस्तान की गद्दी पर हमेशा नपुंसक लोग नहीं बैठेंगे.’’

डॉ. लोहिया का गुस्सा और परतंत्रता की यह पीड़ा तिब्बती लोगों की आंखों में भी साफ झलकती है. कैलास यात्रा में उनसे जो मूक संवाद बना, उसमें तिब्बती समाज का गुस्सा, बेचैनी और लाचारी साफ दिखती है. चीनी दमन के चलते वे ज्यादा खुलते नहीं, क्योंकि उनका बर्बर उत्पीड़न आज भी जारी है. तिब्बती स्वतंत्रता के हिमायती 25,000 से ज्यादा लोग अब भी चीन की जेलों में बंद हैं. बावजूद इसके उनके भीतर एक आग दबी है. उसे हवा चाहिए. आज नहीं तो कल आजादी मिलेगी, इसी उम्मीद में वे जिंदा हैं. एक नए तिब्बत का सपना लिये. पर कौन दिलाएगा यह आजादी? उनका सबसे बड़ा दोस्त, मददगार और मार्गदर्शक भारत भी तो तिब्बत को चीन का आंतरिक मामला मानता है. इस बात की हताशा है वहां.

सन् 1950 में चीनियों के आने से पहले तक पूरे तिब्बत में 6,000 मठ और मंदिर थे, जहां 6 लाख से ज्यादा बौद्ध भिक्षु रहते थे. चीनी हमले और दमन ने धर्म व राज्य दोनों को कुचला. सन् 1979 में हुए एक सर्वे के अनुसार उस समय तक तिब्बत में सिर्फ 60 मठ बचे थे, वे भी जर्जर और नष्ट होने के कगार पर थे. इन मठों में रहनेवाले भिक्षु अधिकांश मार दिए गए या लापता थे. मठों को डायनामाइट से उड़ाया गया था, ताकि धर्म के साथ ही धार्मिक चिह्न और अवशेष भी समाप्त हों. तिब्बत को दुनिया की छत कहा जाता था. वह अपनी जड़ी-बूटियां और हर्बल वनक्षेत्र के लिए प्रख्यात था. ऐसे बेशकीमती और परंपरागत जंगल के 70 फीसदी हिस्से को सुरक्षा के नाम पर चीनियों ने काट डाला.

Tibet China struggle, तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

तिब्बत की मठ परंपरा भारतीय मठ परंपरा की अनुकृति थी. ये मठ भारत-तिब्बत के आत्मीय संबंधों के साक्षी थे. एक और खास बात, हमें चाय पीना भी तिब्बत ने सिखाया. तिब्बत में 1,500 साल से चाय पी जा रही है. चीन में चाय 4,000 साल से पी जा रही है. चीन से आयात कर वे चाय का उत्पादन भी करने लगे थे. फिर चाय तिब्बत से भारत पहुंची. चाय घोड़ा व्यापार मार्ग के रास्ते.

चीनी हमले से पहले राजनीतिक दृष्टि से तिब्बत कभी चीन का अंग नहीं रहा. भारत से उसका नाता बौद्ध धर्म के तिब्बत में प्रवेश के साथ शुरू हुआ. सन् 1249 से 1368 तक यहां मंगोलों का शासन था. 1649 से 1910 तक तिब्बत मंचू आधिपत्य में रहा. उसके बाद सन् 1949 तक वह स्वतंत्र देश था. 1947 में नई दिल्ली के एफ्रो-एशियाई सम्मेलन में भी तिब्बत एक स्वतंत्र देश के रूप में शामिल हुआ. तब तक वहां भारतीय मुद्रा और भारतीय डाक-व्यवस्था भी चलती थी.

चीन और तिब्बत का संबंध 9वीं शताब्दी में एक युद्ध के जरिए मिलता है. सन् 821 में चीन और तिब्बत में युद्ध हुआ. चीन को युद्ध में भारी पराजय का मुंह देखना पड़ा. इस हार का बदला चीन ने 1951 में चुकाया. चीन ने तिब्बत पर कब्जा कर लिया. इस हमले में 80,000 तिब्बती मारे गए. 25,000 से ज्यादा लोगों को चीनी जेलों में डाला गया. उन्हें अमानवीय यातनाएं दी गईं. तिब्बती संस्कृति को नष्ट करने के लिए 50 लाख चीनियों को तिब्बत में बसाने की योजना बनी. तिब्बत की 27 फीसदी आबादी का चीन ने सफाया कर दिया. चीन की माओवादी सरकार ने भिक्षुओं को भीतरघाती, आवारा और लाल रंग का चोर कहा. सन् 1959 में लुकते-छिपते दलाई लामा भागकर भारत आए. अरुणाचल प्रदेश के तवांग के रास्ते. याक पर सवार हो उन्हें भारत आने में बीस दिन लगे. भारत सरकार ने उन्हें और उनके साथियों को राजनीतिक शरण दी.

Tibet China struggle, तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

इस हमले में चीन ने तिब्बत की सिर्फ जमीन ही नहीं हड़पी, उनके उदात्त बौद्ध धर्म को भी नष्ट किया. उनकी सभ्यता को कुचला. संस्कृति के प्रतीक मठों को उड़ा दिया. धर्म को पूरी तरह नष्ट करने के लिए उनके सारे पुस्तकालय और पांडुलिपियों को जला दिया. संस्कृति की जड़ें नष्ट करने के लिए उनके सारे ग्रंथों को जलाना, यह साम्यवादी तरीका था. उनकी वनज औषधियों के वनों को काट डाला गया. नस्ल खत्म करने के लिए चीन की ‘हान’ जाति के लोगों को तिब्बत में भर दिया गया. ‘हान’ लोग नास्तिक थे. वे बौद्धों के कट्टर शत्रु थे. वे सिर्फ लामाओं का ही सफाया नहीं करते थे, उनके प्रिय याक भी उनके निशाने पर थे. वे याक को मारकर खा जाते.

हानों द्वारा मूल तिब्बतियों का दमन और उत्पीड़न का सिलसिला आज भी जारी है. वे उन्हें यातना देते हैं. उन्हें यह अहसास कराते हैं कि अब तिब्बत के असली मालिक वही हैं. दोरजी की कातर आंखें इन यातनाओं की गवाह थीं. देखकर लगता था, उनपर बड़ा जुल्म हुआ है. शायद इसीलिए डॉ. लोहिया ने तिब्बत पर चीनी हमले को ‘शिशु हत्या’ कहा था.

जारी… तिब्बत पर भारत का ‘हिमालयन ब्लंडर’ और China का धोखा, क्या जो बोया है हम उसे ही काट रहे हैं?

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