18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी झील है गौरी कुंड, बर्फ हटाकर करते हैं स्नान

डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लगा कि हाथ बढ़ा कैलास को छू लूं. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार.
mount kailash and lake mansarovar, 18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी झील है गौरी कुंड, बर्फ हटाकर करते हैं स्नान

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 8
अब कैलास पर बर्फ से बनी सीढि़यां साफ दिख रही थीं. इन्हीं सीढ़ियों से कभी देवाधिदेव उतरते होंगे. हम छड़ी लेकर चल रहे थे, पर पांव उठ नहीं रहे थे. हवा का दबाव इतना कि लगा, छाती फट जाएगी. रास्ते में नेवले की प्रजाति और खरगोश की चाल-ढाल वाला एक जानवर दिखा. किसी ने कहा, नेवला है; कोई कहता, गिलहरी है. पर गाइड बोला, यह एक तरह का चूहा है, जिसका तिब्बती नाम ‘चिपि’ है. इस दुर्गम ऊंचाई पर सैकड़ों की संख्या में चिपि थे. चलो, इतनी ऊंचाई पर जीव के नाम पर कुछ तो मिला. मन को संतोष हुआ.

सबका गला सूख रहा था. हमें थोड़ा-थोड़ा मतिभ्रम भी हो रहा था ऑक्सीजन की कमी की वजह से. गाइड शेरपा ने सलाह दी, थोड़ी-थोड़ी देर पर पानी पीते रहेंगे तो सिरदर्द नहीं होगा. सामान ढोनेवाले याक साथ-साथ चल रहे थे. कुछ ऐसे बुजुर्ग लोग भी थे, जो याक की पीठ पर बैठकर परिक्रमा कर रहे थे. बीमार लोगों को पीठ पर लादे कुछ नेपाली शेरपा भी परिक्रमा मार्ग में मिले. याक की पीठ पर बैठकर परिक्रमा करनेवाले भी परेशान थे, क्योंकि याक स्वच्छंद होकर चलता था; कभी दौड़ने लगता. छोटा पहाड़ी रास्ता. नीचे गहरी घाटी. याक कभी एकदम पहाड़ी के किनारे-किनारे खतरनाक ढंग से चलता. गहरी खाई देख याक पर बैठे आदमी के प्राण सूख जाते. फिर कभी वह बीच में ही रुक पानी पीने लगता. मनमौजी और मस्त व्यवहार रहता है उसका.

तिब्बती जीवन बिना याक के नहीं चलता. दुनिया की इस छत पर उसका खासा महत्व है. अगर कैलास की एक परिक्रमा से हमारा जीवन तरता है तो इस इलाके के कुछ याक तो सैकड़ों बार परिक्रमा कर चुके हैं. उनके पास तो मनुष्यों से ज्यादा पुण्य जमा होगा. मेरी इस सोच ने याकों के प्रति अपनी श्रद्धा और बढ़ा दी. वे अद्भुत जानवर हैं—धीर-गंभीर और मेहनतकश. हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, लेकिन कोई नाराजगी या गुस्सा उनके व्यवहार में नहीं मिलता. तिब्बती लोग उन्हें बहुत प्यार करते हैं. वे प्यार से हर याक का कोई-न-कोई नाम रखते हैं. पर किस्मत के मामले में याक गधे, खच्चर जैसे ही लगते हैं. चीनियों के अत्याचार से वे भी अछूते नहीं हैं. चीनी उन्हें मारकर खा जाते हैं.

याक पर ही अपनी रसोई तथा खाने का सामान परिक्रमा में साथ-साथ चल रहा था. रात का पड़ाव जहां होगा वहीं भोजन बनेगा. ब्रह्मपुत्र पार करने के लिए हमने याक का इस्तेमाल किया. अब काफिला डेरापुक की ओर चलता है. यह डगर कठिन है, बेहद थका देनेवाली; कहीं चढ़ाई तो कहीं ढलान. कुली और गाइड सब याक के मांस का सूखा टुकड़ा चबाते हुए चल रहे हैं. हम ठहरे काशी के पंडित. क्या उपाय करें कि ठंड का प्रकोप कम हो. मांस का कोई विकल्प नहीं है यहां. इसलिए सिवाय ठंड से कड़कड़ाने के कोई और उपाय बचा नहीं था. आगे परिक्रमा मार्ग में ल्हासू नदी मिली, जिसका अर्थ है देवनदी. नदी के किनारे से कैलास के दक्षिणी हिस्से का दर्शन होता है. ल्हासू ही आगे जाकर सिंधु नदी कहलाती है. इस नदी को बांस से बने पुल के जरिए पार करना पड़ता है.

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ऐसी कठिन यात्रा में पहली बार लगा कि हम कैलास जा रहे हैं या परलोक. मतिभ्रम, उल्टियां, सिरदर्द, ऑक्सीजन की कमी से इन सबका प्रकोप बढ़ने लगा था. लंबे समय तक बर्फ की चमक से अंधत्व भी आता है. अब आंखों पर भी कुछ-कुछ असर पड़ रहा था. हालांकि हमने काले चश्मे पहने थे, फिर भी दूर-दूर तक बर्फ-ही-बर्फ देख कवि आलोक याद आए—‘पहाड़ों के जिस्मों पे बर्फों की चादर’. कवि के पहाड़ का तो ओर-छोर है. पर यहां तो इस सफेद चादर का कोई सिरा नजर नहीं आ रहा था.

परिक्रमा मार्ग में डोल्मा दर्रा सबसे ऊंचाई पर है. 19,500 फीट की ऊंचाई. यह ऊंचाई एवरेस्ट के बेस कैंप से 1,200 फीट ज्यादा है. दिल दहला देनेवाली यह सबसे कठिन चढ़ाई थी. यहां आते-आते सांसें छूटने लगीं. डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लगा कि हाथ बढ़ा कैलास को छू लूं. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार. संतुलित पूरा पहाड़ जितना लंबा उतना चौड़ा. हम थके फेफड़ों के साथ उसके सामने थे, नतमस्तक.

कैलास के पश्चिमी छोर से उस पर बनी शेषनाग की लहरियां दिखती हैं. गाइड ने बताया कि ये समुद्र-मंथन के निशान हैं. कुदरत से बड़ा संगतराश कौन है. ग्रेनाइट पत्थर का यह पर्वत महाशिवलिंग का आभास देता था. वही निशान हमें शेरपा अपनी व्याख्या के साथ दिखा रहा था. रास्ता खतरनाक था. हमें बड़े-बड़े पत्थरों पर संतुलन बिठाकर चलना पड़ रहा था. लगता था, अगर पांव फिसला तो सीधे महादेव के चरणों में.

‘डोल्मा’ यानी ‘तारा देवी’. इस दर्रे के शिखर पर उनकी पूजा-अर्चना होती है. एक चट्टान पर पूजा हो रही थी—दीप, धूप, अक्षत. रास्ते के नाम पर सिर्फ एक रेखा जैसी पगडंडी है. सहयात्री यहां धर्म-ध्वज टांगते हैं. इस जगह सिर्फ 15 मिनट ठहरने के बाद हिम्मत छूटने लगती है. यहां ऑक्सीजन की जबरदस्त कमी थी. ठंडी हवा. मौसम हर पल बदल रहा था. डोल्मा में कुछ-न-कुछ छोड़कर आने की परंपरा है. जब भी यह परंपरा शुरू हुई होगी, तब वह शायद छल, कपट, अहंकार, दुर्व्यसन, राग-द्वेष छोड़ने के लिए ही रही होगी. पर आजकल लोग वहां जूते-चप्पल, कपड़े, रूमाल, गमछे वगैरह छोड़कर चले आते हैं. वहां ऐसे कूड़े का बड़ा अंबार लगा था. कुछ लोग जो यहां नहीं आ सकते, उनके कपड़े उनके परिजन, दोस्त, मित्र वहां लाकर छोड़ रहे थे. अपने प्रियों के वस्त्र. यह भी प्रतीकात्मक है. गीता में भगवान् श्रीकृष्ण ने तो कहा है, ‘शरीर भी एक वस्त्र है, जिसे आत्मा बदलती रहती है.’

mount kailash and lake mansarovar, 18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी झील है गौरी कुंड, बर्फ हटाकर करते हैं स्नान

मौसम से संघर्षरत हम ‘ॐ नम: शिवाय’ का पाठ कर रहे थे. भयंकर ठंड और दमघोंटू माहौल में मुंह से क्या निकल रहा था, यह हमें ही पता नहीं चल पा रहा था. सिर्फ ओठ हिलते थे. उन पर वश नहीं था. मुंह से क्या निकल रहा था, यह बगलवाला भी नहीं जान सकता था. विचार कौंधा इतनी दुर्गम जगह पर हमारे देव क्यों रहते हैं? लगता है, भक्तों से देवता भी ऊब गए, तभी तो उन्होंने हर उस जगह अपना ठिकाना बनाया, जहां भक्तों का आना-जाना आसान न हो. बावजूद इसके लोग वहां भी पहुंच रहे हैं. जरूर भगवान इससे परेशान होंगे. मुझे लगता है, कहीं इसके बाद वे और ऊपर दुर्गम जगह पर न चले जाएं.

डोल्मा से नीचे ल्हादू घाटी की ओर हमारा कारवां चलता है. अब सीधी ढलान है. यहां 18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी हरी आभा वाली एक ताजा झील मिलती है. अरे, यह तो गौरी कुंड है! इस झील की परिधि 7.5 कि.मी. और गहराई 80 फीट है. गौरी कुंड पूरे साल बर्फ से ढकी रहती है. इस जमी हुई झील के नीचे से पानी का कल-कल संगीत सुना जा सकता है. बर्फ हटाकर कुछ लोग स्नान भी कर रहे थे. मान्यता है कि यहीं पार्वती स्नान करती थीं. यहीं गणेश पैदा हुए थे. शिव के लिए पार्वती ने यहीं तपस्या भी की थी.

इस हवा, पत्थर, पानी, बर्फ, मिट्टी में कुछ तो है; क्योंकि ऐसी गहरी अनुभूति मुझे पहले कभी नहीं हुई. यहां के वातावरण में एक अलग किस्म का ‘वाइब्रेशन’ है. पूरा माहौल मन को दूसरी अवस्था में ले जाता है. चौरासी सिद्धों की यह तपोभूमि है. यहां एक पारलौकिक सत्ता की अनुभूति होती है. गौरी कुंड से नीचे जोगंछू नदी के किनारे चलते-चलते परिक्रमा आगे बढ़ती है. अब तारचेन यहां से सिर्फ 15 कि.मी. बचा रह गया है. वहीं परिक्रमा का समापन होना है. यह यात्रा अपेक्षाकृत कुछ सरल थी.

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तभी हमें एक अनोखी श्रद्धा दिखी, बल्कि श्रद्धा का शिखर. तिब्बती भी कैलास के प्रति अपार श्रद्धा रखते थे. ऐसे ही कुछ साहसी श्रद्धालु दंडवत् परिक्रमा कर रहे थे. हर बार लेटते थे, फिर उठते थे, फिर लेटते थे. यह होती है दंडवत् परिक्रमा. जब हमें पैरों से चलकर परिक्रमा करने में इतनी मुश्किल हो रही थी, तब वे लेटकर परिक्रमा कर रहे थे. उनकी इस अगाध श्रद्धा को हमने प्रणाम किया. परिक्रमा का रास्ता खासा ऊबड़-खाबड़ होता है, इसलिए वे हाथों में जूट का दस्ताना और घुटनों पर टायर के टुकड़े बांधे हुए थे. जैसे हम पूजा करने के लिए पंडित को दक्षिणा का संकल्प दे उसे पूजा करने का ठेका देते हैं, वैसे ही यहां भी कई पैसेवाले लोग अपना संकल्प इन कुलियों को दे उनसे परिक्रमा कराते हैं. पता नहीं पुण्य किसे मिलता है, पर श्रद्धा तो इन कुलियों की ही दिखती है.

परिक्रमा पूरी कर हम तारचेन लौट आए. सब एक-दूसरे को ‘ॐ नम: शिवाय’ कहकर धन्यवाद ज्ञापित कर रहे थे. वापस आने के बाद हम सब में धीरे-धीरे जान लौट रही थी. मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि अपनी इस यात्रा के लिए किसको धन्यवाद दूं. एक मौन, अव्यक्त, शांत और निरुत्तर अनुभूति थी मेरे मन में

जारी … तिब्बत के हाथों बुरी तरह हारने का 1951 में चीन ने लिया था खतरनाक बदला, जमीन ही नहीं सभ्यता को भी कुचला

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