आखिर कैसे पहुंचें कैलास मानसरोवर? पढ़िए- यात्रा से पहले उठने वाले हर एक जरूरी सवाल का जवाब

कैलास तक जाने के लिए तीन रास्ते हैं. एक रास्ता भारत के उत्तराखंड से होकर गुजरता है. इस रास्ते में मुश्किलें ज्यादा हैं, क्योंकि यह रास्ता अधिकतर पैदल और ट्रैकिंग का है. भारत सरकार इसी रास्ते लोगों को भेजती है. दूसरा रास्ता थोड़ा आसान है. इसमें नेपाल की राजधानी काठमांडू से सीधे कैलास सड़क मार्ग से जाना होता है. यह रास्ता भक्तों के लिए नेपाल सरकार सिर्फ जून से सितंबर तक खोलती है. एक तीसरा रास्ता भी है, जो बहुत आसान लेकिन सबसे महंगा है. यह हवाई यात्रा है.
Mount Kailash Lake Mansarovar Travelogue, आखिर कैसे पहुंचें कैलास मानसरोवर? पढ़िए- यात्रा से पहले उठने वाले हर एक जरूरी सवाल का जवाब

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 13

यह दुनिया की सबसे दुर्गम और सुंदर यात्रा है. सदियों पुरानी इस यात्रा का स्वरूप, जाने के तरीके और रास्ते अद्भुत हैं. दिल्ली से कैलास मानसरोवर की दूरी कोई 900 किलोमीटर है. यह यात्रा 15 हजार फीट की ऊंचाई से लेकर 19 हजार फीट की ऊंचाई तक जाती है. आप चाहे जिस रास्ते से जाएं. यात्रा के लिए कोई बीमा सुविधा नहीं है. कैलास यात्री को शरीर से जितना मजबूत होने की जरूरत है, उतना ही मजबूत मन से होना होगा.

कैलास तक जाने के लिए तीन रास्ते हैं. एक रास्ता भारत के उत्तराखंड से होकर गुजरता है. इस रास्ते में मुश्किलें ज्यादा हैं, क्योंकि यह रास्ता अधिकतर पैदल और ट्रैकिंग का है. भारत सरकार इसी रास्ते लोगों को भेजती है. दूसरा रास्ता थोड़ा आसान है. इसमें नेपाल की राजधानी काठमांडू से सीधे कैलास सड़क मार्ग से जाना होता है. यह रास्ता भक्तों के लिए नेपाल सरकार सिर्फ जून से सितंबर तक खोलती है. एक तीसरा रास्ता भी है, जो बहुत आसान लेकिन सबसे महंगा है. यह हवाई यात्रा है, जिसमें हेलीकॉप्टर के जरिए नेपाल के नेपालगंज से सिमिकोट और हिलसा होकर तकलाकोट तक जाते हैं. उसके आगे की यात्रा मोटर से होती है.

विदेश मंत्रालय हर साल कैलास मानसरोवर यात्रा का आयोजन करता है. सरकार 60 यात्रियों का समूह 16 बैचों में ‪29 मई से 26 सितंबर‬ के बीच भेजती है. हर बैच की यात्रा अवधि 28 दिन की होती है. एक यात्री को 25 किलो तक सामान ले जाने की इजाजत है, जिसमें 5 किलो खाने की चीजें हो सकती हैं. कैलास मानसरोवर की यात्रा के पात्र भारतीय नागरिकों की उम्र 18 वर्ष से 70 वर्ष के बीच होनी चाहिए. यात्रा की मुश्किलों को देखते हुए शारीरिक रूप से फिट और स्वस्थ लोगों को ही जाने की इजाजत मिलती है. उन्हें ही अपनी मर्जी, मूल्य, जोखिम और परिणाम का जिम्मा लेना होता है.

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यात्रा का विकल्प- एक
भारत से कैलास मानसरोवर यात्रा मार्ग

हलद्वानी-कौसानी-बागेश्वर-धारचूला-तवाघाट-पांगू-सिरखा-गाला-माल्पा-बुधि-गुंजी-श्कालापानी-लिपू लेख दर्रा-तकलाकोट-जैदी-बरखा मैदान-तारचेन- डेराफुक-श्री कैलास

आना-जाना
• भारत सीमा में यात्रा—14 दिन (127 किमी पैदल, 1,306 किमी बस से, कुल 1,433 किमी)
• चीन सीमा में यात्रा—13 दिन (53 किमी पैदल, 411 किमी बस से, कुल 464 किमी)
• पूरी यात्रा—27 दिन (180 किमी पैदल, 1,717 किमी बस से, कुल 1,897 किमी)

उत्तराखंड अल्मोड़ा से अस्ककोट, खेल, गर्विअंग, लिपूलेह, खिंड, तकलाकोट होकर जानेवाला यह रास्ता अपेक्षाकृत मुश्किल है. यह भाग 338 मील लंबा है और इसमें अनेक चढ़ाव-उतार हैं. जाते समय सरलकोट तक 44 मील की चढ़ाई है, उसके आगे 46 मील उतराई है. रास्ते में अनेक धर्मशालाएं और आश्रम हैं. गर्विअंग में आगे की यात्रा में याक, खच्चर और कुली मिलते हैं. इस रास्ते तकलाकोट तिब्बत में पहला पड़ाव है. दिल्ली से जाने के लिए पहले उत्तराखंड के काठगोदाम तक ट्रेन से, काठगोदाम से धारचूला तक सड़क मार्ग से पहुंचने के बाद पांग्ला से यह यात्रा पैदल शुरू होती है. धारचूला और नाभीढांग होते हुए कुल 75 किलोमीटर पहाड़ों को पैदल पार करके यात्री दल लिपुलेख पास से तिब्बत में प्रवेश करते हैं. गुंजी के बाद 16,500 फीट की ऊंचाई पर लिपुलेख पास से भारत सरकार इस यात्रा को चीन सरकार को सौंपती है. हजारों साल से इसी रास्ते से कैलास यात्रा होती रही है. इसमें रुकावट सन् 1962 में तब आई, जब भारत पर चीनी हमले के बाद चीन ने यह रास्ता बंद कर दिया. सन् 1981 से अटल बिहारी वाजपेयी और सुब्रह्मण्यम स्वामी की कोशिशों के बाद इस रास्ते यात्रा फिर शुरू हुई.

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यात्रा का विकल्प– दो
नेपाल के रास्ते कैलास मानसरोवर

इस रास्ते को कुछ ही साल पहले नेपाल सरकार ने खोला है. चीन सरकार से अधिकृत नेपाली प्राइवेट ट्रैवेल एजेंसियां इस रास्ते यात्रा करवाती हैं. यहां से यात्रा ‪15 दिन में‬ पूरी होती है. पहले दिल्ली में परमिट की सारी औपचारिकताएं पूरी की जाती हैं, फिर कड़े हेल्थ चेकअप के बाद आपको सीधे काठमांडू ले जाया जाएगा. आप चाहें तो काठमांडू में एक दिन रुककर अगले दिन से यात्रा शुरू कर सकते हैं. अकसर लोग यहां पशुपतिनाथजी के दर्शन के बाद ही कैलास के दर्शन के लिए आगे ‘लैंडक्रूजर’ गाडि़यों से जाते हैं.

काठमांडू से तकरीबन एक घंटे की यात्रा के बाद ‘फ्रेंडशिप ब्रिज’ पर मानसरोवर यात्रियों की जांच चीनी अधिकारी करते हैं. यह पुल नेपाल-चीन की सीमा है. सभी कागजात की जांच होने के बाद यात्रा आगे बढ़ती है. यात्रा का पहला पड़ाव नायलम होता है. नायलम तिब्बत में है. समुद्र-तल से इसकी ऊंचाई 3,700 मीटर है. नायलम में अपने शरीर को वातावरण के अनुकूल करने के लिए एक रात रुकना पड़ता है. गाडि़यां हर रोज 260-270 किलोमीटर की दूरी तय करने का लक्ष्य लेकर चलती हैं. शाम तक यात्रा सागा पहुंचती है. सागा से अगले दिन आपका सफर प्रयांग के लिए शुरू होता है. सागा से प्रयांग की दूरी 270 किलोमीटर है. दस घंटे की यात्रा के बाद रात्रि प्रवास प्रयांग में होता है.

अद्भुत प्राकृतिक नजारा और भगवान् शिव के दर्शन की ललक शायद ही आपको थकान का एहसास होने दे, क्योंकि यात्रा के अगले दिन आपको मानसरोवर के दर्शन होने वाले हैं. दिल्ली से महज चार दिन के सफर के बाद पांचवें दिन आप पारलौकिक अहसास वाली मानसरोवर झील के सामने होंगे. मानसरोवर के इस किनारे से कैलास पर्वत का दक्षिणी हिस्सा भी दिखाई देगा. कैलास की परिक्रमा के लिए मानसरोवर झील से 60 किलोमीटर दूर तारचेन के बेस कैंप पहुंचना होता है. वहां से परिक्रमा आप या तो पैदल कीजिए या फिर घोड़े के जरिए. 54 किलोमीटर की कैलास परिक्रमा करना आसान नहीं होता है.

यात्रा के पांचवें दिन 18,800 फीट की ऊंचाई तक जाना होता है, फिर रास्ता सीढ़ी की तरह है—कभी ऊंचाई तो कभी एकदम ढलान. ऊंचाई अधिक होने के कारण यहां ऑक्सीजन की कमी होती है. डेरापुक के लिए पदयात्रा शुरू करते ही रास्ते में आसपास झरने और ठंडी हवाएं आपकी थकान मिटाते हैं. इसी रोज आपको गौरी कुंड के दर्शन होंगे. माना जाता है कि माता पार्वती इसी कुंड में स्नान करती थीं. इस रोज 24 किलोमीटर की दूरी तय होती है. परिक्रमा के दौरान कैलास पर्वत के पश्चिमी, उत्तरी और दक्षिणी मुख के दर्शन होते हैं.

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यात्रा का विकल्प- तीन
नेपाल से वायु मार्ग के रास्ते कैलास मानसरोवर

नेपाल और भारत से कैलास मानसरोवर पहुंचने का तीसरा विकल्प है वायु मार्ग. कैलास तक जाने के लिए हेलीकॉप्टर की सुविधा सबसे आसान है. काठमांडू से नेपालगंज और नेपालगंज से सिमिकोट, फिर वहां से हिलसा तक हेलीकॉप्टर से जाया जाता है. उसके बाद मानसरोवर तक पहुंचने के लिए ‘लैंडक्रूजर’ गाडि़यां मिलती हैं. काठमांडू से ल्हासा के लिए ‘चाइना एयर’ वायुसेवा उपलब्ध है, जहां से तिब्बत के विभिन्न कस्बों—शिंगाटे, ग्यांत्से, लहात्से, प्रयांग पहुंचकर भी मानसरोवर जा सकते हैं.

काठमांडू से नेपालगंज घंटे भर की उड़ान है. फिर नेपालगंज से सिमिकोट के लिए उड़ते हैं. यहां रुकना पड़ता है. एक तो ऊंचाई से तालमेल बिठाने के लिए, दूसरे यह नेपाल का अंतिम प्रशासनिक मुख्यालय है. यहीं आव्रजन कार्यालय भी है. नेपाल सरकार के नियमों के अनुसार चीन में प्रवेश से पहले सारे कागजात यहां दिखाने होते हैं. सिमिकोट में औपचारिकताएं पूरी करने के बाद आप हिलसा के लिए उड़ते हैं. हिलसा में लैंड करने के बाद यात्रा एक झूलेनुमा पुल से करनाली नदी पार कर चीन में प्रवेश करती है. फिर चीनी कस्टम कार्यालय में दस्तावेजों की जांच होती है. इसके बाद ‘गाडि़यों से’ से कोई 1 घंटे में तकलाकोट पहुंचा जाता है. इस यात्रा में वक्त भी काफी कम लगता है.

• हेलीकॉप्टर के जरिए नेपालगंज से सिमिकोट डेढ़ घंटा
• हेलीकॉप्टर के जरिए सिमिकोट से हिलसा 30 मिनट
• हिलसा से शेर गांव पैदल 1 घंटा
• शेर गांव से तकलाकोट ‘लैंडक्रूजर’ से 1 घंटा

तकलाकोट में रुककर ऊंचाई के साथ शरीर का तालमेल बिठाया जाता है. आप चाहें तो यहां खोजरनाथ मंदिर, जो श्रीराम-सीता और लक्ष्मण का प्राचीन मंदिर है, देखने जा सकते हैं. 1,100 साल पुरानी मोनेस्ट्री भी देखने लायक हैं. वहां जाने में गाड़ी से 45 मिनट लगते हैं. सुबह तकलाकोट से मानसरोवर ‘लैंडक्रूजर’ से डेढ़ घंटे की ड्राइव है. रास्ते में राक्षसताल और दूसरे खूबसूरत दृश्यों की तसवीरें ले सकते हैं.

तकलाकोट से मानसरोवर 72 किमी का सफर है. मानसरोवर झील में पूजा-पाठ और स्नान करने के बाद गाडि़यों से तारचेन (कैलास पर्वत का बेस कैंप) पहुंचते हैं. मानसरोवर झील से तारचेन की दूरी 40 किमी की है. जाने में एक घंटा लगता है. तारचेन से यमद्वार गाड़ी 45 मिनट में ले जाती है. यमद्वार से आगे की बाकी यात्रा पैदल होती है. डेराफुक से डोल्मा पास के लिए पदयात्रा. फिर गौरी कुंड होते हुए तारचेन वापसी. वहां से तकलाकोट, फिर हिल्सा सीमा पैदल पार कर हिल्सा से हेलीकॉप्टर के जरिए नेपालगंज वापसी.

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इन बातों पर ध्यान दें –

• पहाड़ों का सम्मान करें और पहाड़ पर विजय पाने की कोशिश न करें. अपनी शारीरिक क्षमता का प्रदर्शन न करें. स्थिर एवं लयबद्ध होकर चलें. कोशिश करें कि हमेशा एक सहयोगी के साथ हों. यह आकस्मिक बीमारी या दुर्घटना से बचने का सुरक्षित उपाय है.
• अकसर यहां बिजली गिरती रहती है. बिजली गिरने के दौरान चिह्नित वस्तुओं, जैसे वायरलेस और बर्फ काटने की कुल्हाड़ी के विद्युतीय संपर्क में आने से बचें. चोटीदार चट्टानों से दूर रहें. अगर कम ऊंचाई पर हैं तो किसी लंबे पेड़ के नीचे या किसी ऊंची पहाड़ी की चोटी पर न बैठें. इसके बजाय खुले में बैठना ज्यादा सुरक्षित है.
• दो या तीन से ऊनी कपड़े न पहनें. इसकी जगह कई ढीले कपड़े पहनें, जो हवा को रोकने में सहायक हों.
• यात्रा में कम-से-कम दो अच्छे ट्रैकिंग जूते साथ रखें. आप उन जूतों को पहनकर चलने का पहले से अभ्यास कर लें, ताकि यात्रा के वक्त वे पैरों को न काटें.
• यात्रा के वक्त पहने जाने वाले जूतों के अंदर कम-से-कम दो (एक सूती तथा एक ऊनी) मोजे जरूर पहनें.
• सुनिश्चित करें कि आपके पैर सूखे हों. डस्टिंग पाउडर का प्रयोग मोजे पहनने से पहले करें. जैसे ही कैंप में पहुंचें, मोजे तुरंत बदल दें. गीले मोजे या जूते के साथ यात्रा करना असुविधाजनक, छालों तथा त्वचा संबंधी रोगों की वजह हो सकता है.
• अपने हाथों एवं उंगलियों की सुरक्षा के लिए अच्छी तरह फिट दस्तानों का प्रयोग करें. हाथ, पैर, मुंह तथा नाक को ठंड से बचाना चाहिए. इन अंगों का लगातार ठंड के संपर्क में रहना शरीर के तापमान को गिरा सकता है, जिसका परिणाम कभी-कभी जानलेवा हो सकता है.
• चढ़ाई के दौरान ज्यादा मात्रा में पानी व तरल पदार्थ पीते रहें. यह जरूरी है. अपने शरीर को पर्याप्त ऊर्जा देने के लिए थोड़ी मात्रा में गरम व मीठे तरल पदार्थ थोड़ी-थोड़ी देर पर लें.
• अच्छी क्वालिटी के चश्मे (सनग्लास) का प्रयोग करें.
• छोटी-मोटी चोटों की अनदेखी न करें, अल्सर तथा छाले आदि का फौरन उपचार करें.
• हाथों और पैरों को हिलाते रहें तथा कुछ-कुछ समय के बाद एक्सरसाइज करें. यह शरीर को गरम रखने के लिए भी जरूरी है.
• सहयात्रियों से अलग न हों. यदि भारी बर्फबारी या कोई बर्फीला तूफान आए तो सभी यात्री एक-दूसरे के नजदीक रहें. छोटे-छोटे समूह में यात्रा करें.
• सुनिश्चित करें कि समूह अपनी यात्रा सुबह में शुरू करे और तय समय पर गंतव्य तक पहुंच जाए.
• एक या दो के ग्रुप में यात्रा न करें. पर्वतारोहण कर रहे मुख्य समूह से अलग न हों. इस बात का ध्यान दें कि आपके सामने चल रहा व्यक्ति आपकी नजर में रहे.
• जूते पहनकर न सोएं.
• ज्यादा वजन के साथ यात्रा न करें.
• यात्रा के दौरान अल्कोहल न लें, खासकर ऊंचाई पर यह ज्यादा खतरनाक है.
• दुर्गम यात्रा के दौरान अकसर कमजोरी और बेचैनी महसूस होने लगती है. इसके लिए ग्लूकोज और इलेक्ट्रॉल जरूर रखें.
• अगर यात्रा के दौरान आपको बार-बार भूख लगे तो ऐसे में भारी खाना खाने के बजाय सूखे मेवे, चने और बिस्कुट खाएं, जिससे कि आप यात्रा जारी रख सकें.
• महिलाओं को ऐसे कपड़े पहनने चाहिए, जिससे पैदल चलने और टट्टू पर बैठने में आसानी हो.
• परिक्रमा में मौसम कभी भी तेजी से बदलता है. बारिश में चलना और भी मुश्किल हो जाता है. इससे बचने के लिए वाटरप्रूफ जूते, वाटरप्रूफ बैग और हलकी बरसाती रखें.
• टॉर्च, मोमबत्ती, माचिस, सूई-धागा भी आपके सफर की मुश्किलों को आसान करेगा.
• मुश्किल वक्त के लिए सहायता केंद्रों का नंबर अपने पास जरूर रखें.
• मानसरोवर में अपनी शारीरिक क्षमता और आदत के विपरीत वाहवाही के लिए ज्यादा देर तक स्नान करना खतरनाक हो सकता है.
• अगर आपको जरूरत नहीं भी है तो पोनी या पोर्टर की सुविधाएं जरूर लें. न जाने कब इनकी जरूरत पड़ जाए. पोनी अथवा पोर्टर गाइड और सहयोगी दोनों के काम आते हैं.
• फोटोग्राफी करते समय इस बात का ध्यान रखें कि सेना के कैंप, चाहे वे भारत के हों या चीन के, फोटो न लें.
• इस इलाके में हर समय चारों तरफ बर्फ फैली रहती है. सुबह और शाम चेहरे एवं हाथों पर वैसलीन तथा त्वचा-रक्षक अन्य पदार्थ अच्छी तरह लगाने चाहिए, वरना त्वचा फट जाती है और नाक में घाव भी हो सकते हैं.

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