रात 9 बजे तक रहता है मानसरोवर में उजाला, ये अमृत है तो 15 हजार फीट की ऊंचाई पर राक्षसताल विष

मैं मानसरोवर की ओर बढ़ा. कोई पचास कदम चलने के बाद सरोवर के किनारे था. नीला पारदर्शी जल, हमारी सभ्यता का पवित्रतम जल. उसे सिर पर रखा. आचमन किया. सामने चमक रहे कैलास को प्रणाम किया और मंत्रमुग्ध-सा खड़ा देखता रहा. इस सन्नाटे का भी एक संगीत था.
Mount Kailash Lake Mansarovar Travlogoue, रात 9 बजे तक रहता है मानसरोवर में उजाला, ये अमृत है तो 15 हजार फीट की ऊंचाई पर राक्षसताल विष

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 5

हमें तकलाकोट के रेस्ट हाउस में ही रात गुजारनी थी. कार से मानसरोवर तक की दूरी यहां से सिर्फ डेढ़ घंटे की थी, इसलिए मैंने तय किया कि हम रात मानसरोवर के किनारे कैंप में ही बिताएंगे. क्योंकि मैंने यह पढ़ रखा था कि वहां तड़के देवतागण नहाने आते हैं. आकाश में गजब की लीला होती है. शक्ति-पुंज घूमते हैं. माहौल में रहस्य और रोमांच होता है. रात वहीं बिताने के मूल में यही उत्सुकता थी. शाम ढलने के पहले ही हम मानसरोवर के लिए अपनी-अपनी गाड़ियों से निकल पड़े.

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पहाड़ों के बीच समतल मैदान में हम चल रहे थे. दूर टीले और टीलेनुमा पहाड़ियां थीं. बिना गड्ढे के चौड़ी सड़कें. चिकनी, लेकिन ऊपर चढ़ती-उतरती. इस कारण काफिले की दूसरी गाडि़यां कभी-कभी ओझल हो जाती थीं. ऐसी ऊंचाई पर अनंत रेगिस्तान-सा मैदान अचंभा और कौतुक पैदा कर रहा था. बारीक मिट्टी. न कहीं कोई दर्रा, न गहराई वाली घाटी, न जरा भी ऊंचाई का डर. सर्पीली नदियां जरूर साथ-साथ चल रही थीं. एक ओर पहाड़, दूसरी ओर फिरोजी रंग की नदी. यह स्वर्ग का रास्ता था.

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बाईं तरफ नंदादेवी, धौलागिरि और त्रिशूल पहाडि़यां दिख रही थीं. इन पहाड़ियों के उस पार भारत था. लगभग दो घंटे चलने के बाद यकायक ड्राइवर ने कहा? बाईं ओर देखिए. बाहर देखते ही मैं सन्न रह गया. लगा—सपना सच हो गया. अरे, यह क्या! सामने श्वेत-शुभ्र, उज्ज्वल-धवल कैलास था. ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. सब गाड़ी से उतर पड़े. हम फोटो खींचते रहे. वहां से हटने को कोई तैयार नहीं था. ड्राइवर ने चेतना को झकझोरा, आगे चलिए, और बेहतर दिखेगा.

Mount Kailash Lake Mansarovar Travlogoue, रात 9 बजे तक रहता है मानसरोवर में उजाला, ये अमृत है तो 15 हजार फीट की ऊंचाई पर राक्षसताल विष

दूसरी ओर सड़क के नीचे राक्षसताल था. 15 हजार फीट की ऊंचाई पर इस ताल में न पूजा हो सकती है, न आचमन. दोनों वर्जित हैं. तिब्बत में मान्यता है कि यहां बुरी आत्माएं रहती हैं. गाइड ने बताया, यहीं रावण ने तपस्या की थी. तपस्या कर शिव से वरदान मांगा कि वह कैलास को लंका ले जाएगा. देवता परेशान हो गए. अब शिव के दर्शन के लिए लंका जाना पड़ेगा. देवताओं ने एक षड्यंत्र किया. जब रावण कैलास उठाकर लंका की तरफ बढ़ने लगा तो उसे तीव्र लघुशंका लगी. रावण ने पास खड़े गणेश को कैलास थमाया और कहा, इसे तब तक भूमि पर न रखें जब तक मैं निवृत्त न हो जाऊं. रावण को निवृत्त होने में घंटों लग गए. गणेशजी थक रहे थे. आखिर थककर कैलास को जमीन पर रख दिया. जो रखा तो वहीं रह गया.

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रावण को कैलास उठाने का वरदान सिर्फ एक ही बार का था. इसलिए कैलास लंका जाने से बच गया. राक्षसताल उसी रावण का बनाया है. इसलिए अपवित्र है. राक्षसताल के बाबत ऐसी कई रोचक दंतकथा और मान्यता यहां प्रचलित है. राक्षसताल 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है. एक छोटी नदी ‘गंगा-छू’ दोनों झीलों को जोड़ती है. इस झील का रंग भी काला है. काला रंग विष का प्रतीक है. यह ईश्वर की लीला है. मानसरोवर अमृत है, राक्षसताल विष. कैलास शिव का घर है और शिव विषधारी. वैज्ञानिक भी राक्षसताल को विषैला इसलिए मानते हैं कि इसमें मिनरल्स का स्तर काफी ऊंचा है. इस वक्त रात के 8 बजे थे. पर कैलास और राक्षसताल दोनों चमक रहे थे. मानसरोवर में उजाला रात 9 बजे तक रहता है. वक्त अब छंट रहा था. मनुष्य की बनाई सभ्यता हमसे पीछे छूट रही थी. सामने गुरला मांधाता पर्वत था. राजा मांधाता ने ही सबसे पहले मानसरोवर की खोज कर उसके तट पर तपस्या की थी. इसलिए इस पर्वत को मांधाता कहते हैं.

अरे, यह तो मानसरोवर है! हम मानसरोवर के सामने थे. अद्भुत! अपूर्व! अलौकिक!! हमारे होशो-हवास गुम. इसकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती. एक आश्चर्य लोक. चारों ओर पहाड़, बीच में यह अपार जलराशि. दूर क्षितिज पर आकाश से झील जुड़ती नजर आ रही थी. मैं अवाक् एकटक घंटों मानसरोवर के किनारे खड़ा होकर उसे अपलक निहारता रहा था. तभी नेपाली गाइड शेरपा ने हमें सचेत किया ठंड बहुत है, ‘‘जैकेट पहनिए.’’ मैं लहरों के उठने और गिरने में अपनी सुध-बुध खो रहा था. लहरों के साथ किनारे आती सुनहरी मछलियां तट की सुंदरता को बढ़ा रही थीं. मानसरोवर में मछलियां मारना मना है. लेकिन लहर जब वापस जाती तो कुछ मछलियों को तट पर छोड़ जाती. लोग उन्हें बटोरकर अपने घर में रखते हैं, इन्हें शुभांकर मानते हैं और सूखी मछलियां ठंड से भी बचाती हैं.

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हवा तेजी से चुभ रही थी. हड्डियां कड़कड़ा रही थीं. हमें शून्य से कम तापमान के लिए खास तौर पर बनी जैकेट पहनाई गई. कोई 20 किलो से ज्यादा वजन के कपड़े मैंने पहने हुए थे. फिर भी ठंड का असर कम नहीं हो रहा था. मानसरोवर के इस किनारे को जैदी कैंप कहते हैं. सामने ठहरने के लिए एक-एक कमरे की सराय-नुमा की कॉटेज बनी थीं. यहीं ऋषिकेश वाले चिदानंद मुनिजी का भी आश्रम है. वे अकेले भारतीय हैं, जिन्हें चीन सरकार ने आश्रम बनाने की इजाजत दी है. यहां कुछ दुकानें भी थीं, जहां याक का सूखा मांस छत से टंगा लटक रहा था. उसके टुकड़े को स्थानीय लोग टॉफी की तरह चूसते हैं. याक का मांस गरम होता है. ठंड से निजात मिलती है.

कैंप के हर कमरे में तीन चारपाइयां थीं. जैसे ही हम अपने कमरे में गए, सभी को कुछ-न-कुछ परेशानी शुरू होने लगी. किसी को माइग्रेन, किसी को चक्कर और बेचैनी, किसी को सांस लेने में तकलीफ. सिरदर्द के साथ मेरी भी समझने की क्षमता कम हो रही थी. जैकेट, टोपी, मफलर, दस्ताने पहने-पहने मैं छह-सात कंबल एक साथ ओढ़कर लेट गया. गाइड शेरपा आया. उसने फौरन एक ऑक्सीजन सिलेंडर दिया. मुंह से ऑक्सीजन लिया. शेरपा ने पैर, कनपटी और हथेली में तिब्बत की जड़ी-बूटी से बना कोई गाढ़ा तेल रगड़ा. इस तेल से जादू की तरह चेतनता वापस आई. पास के कमरे में खाना बनना शुरू हो गया था. हमारे साथ चल रहे रसोइए ने हमें तिब्बती सूप पिलाया.

कुछ मित्रों की सांसें अब भी उखड़ रही थीं. वे सब रजाई में ऑक्सीजन सिलेंडर लिये पड़े थे. बाहर भयानक ठंड थी. हिम्मत नहीं हुई कि खाना खाने बाहर जाया जाए. गाइड ने कहा, हम खाना यहीं ले आते हैं. उसका कहना था, न खाने से परेशानी बढ़ सकती है. इसलिए हमने सिर्फ खिचड़ी खाने का फैसला किया वह भी रजाई ओढ़कर. गाइड ने निर्देश दिया कि रात में अकेले बाहर न निकलें. टॉयलेट के लिए भी समूह में जाएं. छड़ी हाथ में जरूर रखें, क्योंकि यहां के कुत्ते खतरनाक हैं.

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लेकिन हमें तो ब्रह्म मुहूर्त में मानसरोवर का रहस्य जानना था. इसे लेकर एक कुतूहल मन में था. इस बेचैनी से नींद भी नहीं आ रही थी. मैं तड़के का इंतजार करता रहा. रात कोई 3.30 बजे उठा. कैमरा लिया और कमरे के बाहर निकला. सामने ही पवित्र मानसरोवर था. थके-मांदे सभी सो रहे थे. निपट अकेला ही मैं मानसरोवर की ओर बढ़ा. कोई पचास कदम चलने के बाद सरोवर के किनारे था. नीला पारदर्शी जल, हमारी सभ्यता का पवित्रतम जल. उसे सिर पर रखा. आचमन किया. सामने चमक रहे कैलास को प्रणाम किया और मंत्रमुग्ध-सा खड़ा देखता रहा. इस सन्नाटे का भी एक संगीत था, जिसका सुंदर वर्णन रामायण, महाभारत और स्कंदपुराण में मिलता है. बाणभट्ट की ‘कादंबरी’, कालिदास के ‘रघुवंश’ और ‘कुमारसंभव’ के अलावा संस्कृत व पालि ग्रंथों में भी कैलास के सौंदर्य का अपूर्व वर्णन है.

आकाश में तारे इतने चमकीले थे कि बिना चंद्रमा के तारों की रोशनी से ही मानसरोवर चांदी-सा दिख रहा था. प्रतिपल हर कोण से सरोवर का रंग बदल रहा था. उत्तेजना में कभी मैं कैमरे की आंख से मानसरोवर देखता, कभी नंगी आंखों से. दादी से सुन रखा था कि देर रात यहां देवता, ऋषि और अप्सराएं आती हैं. मैं लगातार दबे पांव उनका इंतजार कर रहा था. थोड़ी देर में ही झील सुनहरे रंग की हो गई. मैं चमत्कृत था. आपे में नहीं था.

तभी कोई ज्योति-पुंज दिखा. दूर ढेर सारे लोगों की आहट सुनाई पड़ी. पर दिख कोई नहीं रहा था. मैं सन्न, स्तब्ध खड़ा रहा. तापमान शून्य से नीचे. चुभती हवा, जकड़ती ठंड. लेकिन ठंड की जरा भी परवाह नहीं. लग रहा था, न जाने क्या पा लिया! किनारे खड़ा सोचता रहा—क्या करूं? कैसे समेटूं इस आनंद को? कुछ समझ नहीं आ रहा था. जैसे किसी कंगले को खजाना मिल गया हो. लगा, कोई उत्सव हो रहा है यहां.

मैंने क्या देखा, क्या अनुभव किया, इसे व्यक्त करना मुश्किल है, वर्णनातीत है. बिलकुल नि:शब्द.

Mount Kailash Lake Mansarovar Travlogoue, रात 9 बजे तक रहता है मानसरोवर में उजाला, ये अमृत है तो 15 हजार फीट की ऊंचाई पर राक्षसताल विष

अब तक सूरज निकल आया था. धूप की चमक सरोवर के रंग को और गाढ़ा बना रही थी. मैं पीछे मुड़ा तो होश उड़ गए. देखा—कुत्तों का एक झुंड मेरे पीछे खड़ा था. मैं डर गया. अब क्या होगा? जाते वक्त मानसरोवर का ढेर सारा साहित्य पढ़कर गया था. उसके मुताबिक, यहां के कुत्ते मांसाहारी होते हैं, चुपचाप चोरी से हमला करते हैं. पर ये सारे कुत्ते धीर-गंभीर, दार्शनिक मुद्रा में एकदम शांत खड़े थे.

पहली बार लगा, ज्ञान मनुष्य को डरपोक बनाता है और अज्ञान के आगे डर लाचार होता है. मैं पीछे मुड़ पांव धीरे-धीरे खिसकाने लगा. मुझे मालूम था, तिब्बत में मृत मनुष्य के अंतिम संस्कार में उसे जलाते नहीं. मृत्यु के बाद उसकी देह को लामा लोग टुकड़े-टुकड़े काट पहाड़ों पर फेंक देते हैं गिद्ध और दूसरे पक्षियों के लिए. इतनी ऊंचाई पर पक्षी कहां मिलें, सो अकसर यह मांस कुत्ते ही खाते हैं. इसलिए उन्हें आदमी का मांस खाने की आदत पड़ जाती है. इस तथ्य को याद कर मेरी हालत और भी खराब हो रही थी.

इस उधेड़बुन में मैं सरकते-सरकते लगभग तीस कदम तक पीछे हट चुका था. अब गंतव्य तक पहुंचने के लिए लगभग बीस कदम और बचे थे. यकायक मैं पीछे मुड़ा और उसैन बोल्ट की गति से जान हथेली पर रखकर दौड़ा. देखा, सामने गाइड खड़ा था. वह मजे लेने के अंदाज में बोला, ‘‘मैंने कहा था न कि बाहर अकेले न जाएं.’’ कमरे में पहुंचते ही मुझे लगा, जान बची तो लाखों पाए. मेरी सांस तेजी से फूल रही थी. जान बचने के अहसास से बड़ी राहत मिली.

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इस हादसे के डर से मैं अभी उबरा ही था कि दूसरी जबरदस्त समस्या का सामना करना पड़ा. इस कैंप में निपटने-नहाने का कोई इंतजाम नहीं था. सब खुला खेल था. इस इलाके में सुबह के वक्त निवृत्त होना मानो युद्ध जीतने जैसा था. यहां भारत जैसे कच्चे संडास बनाए गए थे, जिस पर छत नहीं थी. सभी लाइन से बने थे. एक-दूसरे से कोई आड़ भी नहीं थी. हम भारतीयों को लाइन लगाने की आदत तो होती है, पर इस काम के लिए मुझे लाइन में बैठना ठीक नहीं लगा. तेज बर्फीली हवाओं के बीच जैकेट, टोपी, मफलर, दस्ताने, जूते पहन दो पत्थरों पर संतुलन बनाकर बैठना किसी सर्कस से कम नहीं था.

बर्फ से पगी तूफानी हवाएं शरीर में पिन की तरह चुभ रही थीं. पहने हुए कपड़ों का अपार बोझ. तूफानी हवा. कुत्तों का डर. पर क्या करूं? लक्ष्य भी महान था. एक साथ इन सारे दबावों में मैं कैसे निवृत्त हुआ, बता नहीं सकता. हां, उसके बाद विश्व-विजेता की मुद्रा में जरूर कैंप की तरफ लौटा. इस विजय से लगा, मैं हाथ में तिरंगा ले लॉर्ड्स क्रिकेट ग्राउंड का चक्कर लगा रहा हूं और लोग मेरी जीत पर तालियां बजा रहे हैं.

जारी… एक बार के स्नान से तर जाती हैं सात पीढ़ियां, पढ़िए आखिर क्या है मानसरोवर के प्रवाह का तिब्बती कनेक्शन?

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