45 किलोमीटर में फैला 22 हजार फीट ऊंचा कैलास, यहां हर गोंपाओं पर दिखता है चीनी आतंक का असर

किसी जमाने में बौद्ध गोंपा व मठ संस्कृत तथा पालि ग्रंथों से भरे पड़े थे. सन् 1920 से 1930 के बीच महापंडित राहुल सांकृत्यायन याक पर लाद ढेर सारे ग्रंथ भारत लाए थे. दलाई लामा भी अपने साथ कुछ लाए. लेकिन काफी महत्वपूर्ण हस्तलिखित ग्रंथों को चीनियों ने जला दिया. हर गोंपा में चीनी तांडव का एक आतंक गूंजता है.
mount kailash mansarovar parikrama, 45 किलोमीटर में फैला 22 हजार फीट ऊंचा कैलास, यहां हर गोंपाओं पर दिखता है चीनी आतंक का असर

द्वितीयोनास्ति , कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 7
जैदी से 40 किलोमीटर दूर तारचेन कैलास परिक्रमा का आधार शिविर है. यहीं से कैलास की परिक्रमा शुरू होती है. मित्रों की हालत देख एक बार तो लगा कि अब हम तारचेन न जाएं, यहीं से वापस लौट चलें. एक-एक कर सभी साथी लस्त-पस्त हो रहे थे, खासकर महिलाएं. रास्ते में एक गांव पड़ा. यह गड़रियों का गांव है. एक बड़े समतल मैदान के बीच कच्चे रास्ते से हमारी गाड़ी चली जा रही थी. पठार का सौंदर्य अद्भुत था.

थोड़ी देर में तारचेन दिखा. वह छोटे-छोटे ध्वजों, पताकाओं और झंडियों से सजा था. इस छोटे बाजार में एक बैरकनुमा अतिथिगृह भी था. यात्रा यहां तक गाड़ियों से आती है. इसके आगे गाड़ियां नहीं जातीं, यहीं रुक जाती हैं. इसलिए यहां गाड़ियों के कुछ मेकैनिक और छोटे गैराज भी हैं. एकाध तिब्बती रेस्त्रां भी हैं. कुछ छोटी दुकानें स्मारिकाओं और उपहारों की भी थीं. इस दुर्गम जगह से कोई पत्थर का टुकड़ा भी ले जाना एक स्मृति-चिह्न है. फिर यह तो उपहारों की दुकान थी, जहां हमारे साथी रुककर स्टीकर, रूमाल, स्कार्फ और झंडी-पताका खरीदने लगे. तारचेन में बुद्ध और शिव के चित्र एक साथ एक ही दुकान पर मिल रहे थे.

इस बस्ती में लगभग तीन सौ घर हैं. यहां रहनेवाले सभी भेड़-बकरी और याक चरानेवाले गड़रिए हैं या फिर तीर्थयात्रियों की सेवा-शुश्रूषा से जो मिल जाए. उसी से उनका जीवन चलता है. स्कूल के नाम पर रेडक्रॉस का एक स्कूल है. पर अस्पताल या कोई डिस्पेंसरी नहीं है. बीमार लोगों को 120 किलोमीटर दूर तकलाकोट तक जाना पड़ता है. रेडक्रॉस यहां अस्पताल खोलना चाहती है, पर चीनी सरकार न जाने क्यों इसकी इजाजत नहीं देती. शायद सीमांत इलाका है, इसलिए सरकार कुछ ज्यादा ही चौकसी बरतती है. चीनी सेना के जवान यहां आपको हर मोड़ पर मिलेंगे. कैलास के रास्ते इंसानी सभ्यता का यह अंतिम गांव है. इसके आगे तो सिर्फ निर्जन और अंतहीन सफेदी ही दिखती है.

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तारचेन से सामने की ओर से कैलास साफ दिखाई पड़ता है. 22,000 फीट की ऊंचाई वाला कैलास कुल 45 किलोमीटर इलाके में फैला है. यह पर्वत पांच बौद्ध गोंपाओं से घिरा है. गोंपा झोंपड़ीनुमा बौद्ध विहार होते हैं, जहां अब कुछ ही नाममात्र के भिक्षु पूजा-पाठ करते हैं. लामा व्यवस्था तक इन गोंपाओं का बड़ा जलवा था. इन्हें धार्मिक के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकार भी प्राप्त थे. सन् 1949 में माओ के नेतृत्व में बौद्ध मठ और विहार तोड़े, लूटे व जलाए गए. चीनी क्रांति ने सारे गोंपाओं को खंडहरों में तब्दील कर दिया. उन्हीं खंडहरों को फिर से रंग-रोगन कर झोंपड़ीनुमा आकार में फिर से खड़ा कर दिया गया है. अब न तो उनका वो वैभव है, न विस्तार. ज्यादातर में तो दरवाजे, खिड़की भी नहीं हैं. बौद्धों का यह देवस्थान है.

किसी जमाने में बौद्ध गोंपा व मठ संस्कृत तथा पालि ग्रंथों से भरे पड़े थे. सन् 1920 से 1930 के बीच महापंडित राहुल सांकृत्यायन याक पर लाद ढेर सारे ग्रंथ भारत लाए थे. दलाई लामा भी अपने साथ कुछ लाए. लेकिन काफी महत्वपूर्ण हस्तलिखित ग्रंथों को चीनियों ने जला दिया. हर गोंपा में चीनी तांडव का एक आतंक गूंजता है. सहमे बौद्ध भिक्षु धीमी व दबी आवाज में मंत्र-पाठ करते हैं. वे लाचार और डरे हुए दिखते हैं. उन्हें देख तिब्बत में तिब्बतियों की दशा पर क्रोध और क्षोभ दोनों होता है.

कैलास पर्वत-शृंखला भूटान तक फैली है. ल्हा चू और झोंग चू के बीच ही कैलास पर्वत है. इसकी सबसे निचली चोटी तारचेन और सबसे ऊंची चोटी डेशफू गोंपा है. कैलास की परिक्रमा 16,000 फीट की ऊंचाई से शुरू हो 19,000 फीट तक जाती है.

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हम आगे बढ़े. सामने का नजारा अद्भुत था. दो घाटियों के बीच में बर्फ की सफेद चादर से ढकी पर्वत-शृंखला, उसके पीछे नीला साफ आकाश. इस नीले आकाश पर कहीं-कहीं सफेद बादल के टुकड़े. उस पर्वत से पिघलते बर्फ के झरने. दूर से दिखा जैसे पर्वत से दुग्धधारा निकल रही हो. दूध की ऐसी धाराएं मैंने महाशिवरात्रि में काशी के विश्वनाथ मंदिर में ही देखी थी.

थोड़ा और आगे बढ़े, एक और घाटी, चारों तरफ बर्फ से ढकी हुई. हमें बताया गया कि यहीं महादेव ने कामदेव को भस्म किया था. तब यहां इतनी बर्फ नहीं थी, हरियाली थी और फूल खिलते थे. बारहों महीने वसंत रहता था. तारक नाम के राक्षस से देवता आक्रांत थे. उसे ब्रह्मा का वरदान था. देवता ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्माजी मुस्कुराए, बोले—तारक का संहार शिव-पुत्र ही करेगा. पर शिव तो सती के वियोग में तपस्यारत हैं, फिर पुत्र कैसे होगा? उनकी तपस्या तोड़ने के लिए इंद्र ने कामदेव को भेजा. कामदेव पहुंचे तो उस बर्फीले पर्वत पर वसंत छा गया.

पार्वती अपनी सखियों के संग शिव के दर्शन के लिए पहुंचीं. तपस्या में लीन शिव के चरणों में पुष्प अर्पित किए. घनी झाड़ी में छुपे कामदेव ने फूलों से बींधा बाण चला दिया. शिव ने पार्वती को देखा, उनकी तरफ हाथ बढ़ाया. सोचने लगे, यह सुंदरी यहां कैसे! ध्यान भटका. लेकिन फिर तप में लीन हो गए. पर कहीं व्यवधान था. ध्यान केंद्रित नहीं हुआ. शिव चकित थे. काम का बाण अपना असर दिखा रहा था. कामदेव मुस्कुराए. तभी शिव का तीसरा नेत्र खुल गया. कामदेव वहीं भस्म हो गया. पार्वती व सखियां घबराकर भाग गईं.

कामदेव की पत्नी रति रोती-बिलखती शिव की शरण में आई—मेरा क्या होगा प्रभु? भोलेनाथ पिघले. बोले—अच्छा, जाओ, कामदेव को जीवित करता हूं; पर अब वह अनंग रहेगा. कभी सामने नहीं आ पाएगा. हमेशा छुपकर वार करेगा. पहले वहां बारहों महीने फूल खिला सकता था, पर अब नहीं. अब केवल दो महीनों के लिए फूल खिलेंगे और तब वसंत आएगा. तभी से वसंत सिर्फ दो महीनों के लिए ही आता है.

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अब हम यमद्वार के पास थे. इसे स्वर्ग जाने का इकलौता रास्ता बताते हैं. यहां पहाड़ों की आकृति एक बड़े द्वार की तरह है. नीचे मनुष्यों ने भी एक द्वार बना रखा है. लोग पत्थरों पर पत्थर रख उसे पिरामिड की शक्ल देते हैं. यहां ढेर सारे पिरामिड बने हैं. एक मंदिर भी है, तीर्थयात्री जहां पत्थर रखकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं. यमद्वार पर बुद्धकालीन एक शिलालेख भी है. युधिष्ठिर यहां से आगे अकेले अपने कुत्ते के साथ स्वर्ग की ओर गए थे. नचिकेता का यमद्वार भी यहीं है. दाईं ओर ऊपर पहाडि़यों पर तिब्बत के 84 महासिद्धों की आकाश समाधियां हैं. आकाश समाधि वह स्थान है, जहां मनुष्य की देह को अंतिम संस्कार के लिए चीलों व गिद्धों को खिलाने के लिए रखा जाता है. हम वहां नहीं गए. जाना दिवंगत लोगों के प्रति असम्मान होता.

इसे ‘शिब-त-साल’ यानी ‘मृत्यु का पठार’ भी कहते हैं. यहां सुरक्षित पहुंचना पुनर्जन्म माना जाता है. मुरारी बापू को यह जगह बहुत पसंद है. वे कई बार यहां अपना कथा शिविर लगा चुके हैं. यमद्वार से आगे का रास्ता दुष्कर है. इसलिए सामान ले जाने के लिए याक मिलते हैं. ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल इसी के पास है.

गिरते-पड़ते हम अष्टपद की ओर जा रहे थे. अष्टपद जैन धर्म का पवित्रतम स्थान है. पहले तीर्थंकर ऋषभदेव ने इस अष्टपद की परिक्रमा की थी. बाद में यहीं उन्होंने शरीर छोड़ा. इसलिए जैन लोग भी कैलास से उतनी ही श्रद्धा रखते हैं जितनी हम.

अब हम कैलास के दक्षिणी मुख पर हैं. सामने शिव का नंदी बहुत करीब दिखता है. दरअसल यह नंदी के आकार का एक पहाड़ है. उसे ही नंदी पर्वत कहते हैं. सांस अब भारी हो चली थी. चारों तरफ ऊंचे पहाड़, बीच में दलदल, ऊबड़-खाबड़ रास्ता. पहली बार मुझे ‘लैंडक्रूजर’ गाड़ी की असली उपयोगिता पता चली.

जारी… 18,000 फीट की ऊंचाई पर पन्ने के रंग जैसी झील है गौरी कुंड, बर्फ हटाकर करते हैं स्नान

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