सिद्धांतों का हवन कर दें तो उद्धव को ‘आडवाणी’ बनने में देर नहीं लगती

बहुमत तो मानो राजनीति का नीरस खेल रह गया है. मजा त्रिशंकु सदन में है. सारी संस्थाएं, नेताएं एक्टिव मोड में रहते हैं. ऐसे में दलविहीन संवैधानिक संस्था के लिए मुसीबत पैदा हो जाया करती थी.
ncp congress ideology swap with shiv sena, सिद्धांतों का हवन कर दें तो उद्धव को ‘आडवाणी’ बनने में देर नहीं लगती

राजनीति सत्ता पाने का जरिया है. सत्ता में आने के बाद भूमिका तय होती है. सेवा जनता की करनी है या किसी और की. प्राथमिकता तो सत्ता है. आदर्श स्थिति में सत्ता गौण है. विचारधारा अहम. अब उलट है. सत्ता श्रेष्ठ है.

इसके लिए नेता कई चीजों की आहुति देते हैं. सिद्धांत इनमें से एक है. सिद्धांतों और विचारधाराओं की आहुति में पिछड़ना सत्ता से दूर होना है. इसका ध्यान महाराष्ट चुनाव ( NCP Congress Shiv Sena alliance ) के बाद भी रखा गया. एनसीपी, ( NCP ) कांग्रेस, ( Congress ) शिव सेना (Shiv Sena ) और भारतीय जनता पार्टी ( Bhartiya Janata Party BJP ) सबने इसका भरपूर खयाल रखा.

बहुमत तो मानो राजनीति का नीरस खेल रह गया है. मजा त्रिशंकु सदन में है. सारी संस्थाएं, नेताएं एक्टिव मोड में रहते हैं. ऐसे में दलविहीन संवैधानिक संस्था के लिए मुसीबत पैदा हो जाया करती थी. वो विचारों और सिद्धांतों की तिलांजलि में खुद को ठगा हुआ पाते थे. लेकिन अब ऐसा नहीं रहा. राजभवन की नीरसता भी ऐसे मौकों पर जाती रही.

अब राज्यपाल भी चर्चा में रहते हैं. सिद्धांतों और परंपराओं की तिलांजलि राजभवन में भी होती है. पर संविधान ने राज्यपाल को कवच प्रदान किया है. पहले दबी जुबान आलोचना भर से काम चलता था. पर अब नहीं. राज्यपाल ने नियमों को ताखे पर रखा या नहीं ये कहलवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने लगे हैं. ये 90 के दशक से ही चल रहा है. इस 23 नवंबर को आप-हम उठे तो देवेंद्र फड़नवीस ( Devendra Fadnavis ) को महाराष्ट्र का सीएम पाया. ये पहली बार नहीं है.

आडवाणी उदार और फड़नवीस अछूत कैसे हो गए ? ( ncp congress ideology swap with shiv sena )

उत्तर प्रदेश में तो ये 1997 में हो चुका है. तब 22 फरवरी की सुबह देश ने जगदंबिका पाल को यूपी का नया सीएम पाया. तब रोमेश भंडारी गवर्नर थे. अब महाराष्ट्र में भगत सिंह कोश्यारी गवर्नर हैं. तब भी बीजेपी घटनाक्रम के केंद्र में थी. आज भी है. इस बीच तो बिहार, झारखंड, उत्तराखंड, गोवा, कर्नाटक हर जगह त्रिशंकु सदन ने सुप्रीम कोर्ट समेत सभी संवैधानिक संस्थाओं को एक्टिव किया. राजभवन-स्पीकर पर संविधान की धज्जियां उड़ाने के आरोप लगे. उधऱ सत्ता के लिए राजनीतिक दलों ने अपना खेल खेला.

इस खेल ने एक अच्छा काम तो किया है. राजनीति में छुआछूत की भावना पूरी तरह खत्म हो गई है. अब कोई भी किसी का दामन थाम सकता है. पहले कुछ परहेज करते थे. लालू जैसे नेता अब भी राजनीतिक अस्पृश्यता में विश्वास रखते हैं. हालांकि इसका काट निकाला गया है. परहेज दल की विचारधारा से होता है उसके विधायकों या नेताओं से नहीं. तो आपसी आवागमन दुविधा  दूर करती है.

ncp congress ideology swap with shiv sena, सिद्धांतों का हवन कर दें तो उद्धव को ‘आडवाणी’ बनने में देर नहीं लगती

बावजूद इसके, पूरी जिंदगी अपनी पार्टी की विचारधारा का झंडा उठाने वाले शीर्ष नेताओं को लेकर विरोधी दलों में गुस्सा थोड़ा ज्यादा रहता है. लेकिन अब ये भी नहीं रहा. इसका निदान भारतीय राजनीति ने खोज निकाला है. ऐसे नेताओं को अपनाने के लिए किसी दूसरे नेता को खलनायक बनाया जाता है. नरेंद्र मोदी के पीएम बनने के बाद पितामह लालकृष्ण आडवाणी ( Lal Krishna Advani ) के साथ भी ऐसा ही हुआ. कट्टर हिंदू की छवि वाले आडवाणी अचानक उदार हो गए.

आडवाणी के खिलाफ कभी मोर्चा खोलने वाले सभी दलों की सहानुभूति आज उनके साथ है. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सिद्धांतों की तिलांजलि रस्म अदायगी भर रह गई है. इसी ने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे को ‘आडवाणी’ बना दिया है. टीकाकार कहते थे बीजेपी समझौता कर सकती है लेकिन शिवसेना कट्टर हिंदुत्व से पीछे नहीं हट सकती. ( ncp congress ideology swap with shiv sena )

आज का सीन देखिए. उद्धव ठाकरे के पुत्र आदित्य ठाकरे सोनिया गांधी के नाम पर शपथ ले रहे हैं. सोनिया को विदेशी बहू बताने वाले शरद पवार बगल में खड़े हैं. एनसीपी-कांग्रेस के खिलाफ जहर उगलने वाले उद्धव अब उन्हीं के सीएम कैंडिडेट हैं. वहीं, जिस बीजेपी के साथ शिवसेना चुनाव लड़ी उसके नेता फड़नवीस विलन नंबर वन हैं. तो क्या एनसीपी – कांग्रेस को उद्धव ठाकरे से ज्यादा खतरनाक देवेंद्र फड़नवीस नज़र आने लगे हैं?

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