सुशासन का ‘मर्डर’ हुआ तो ‘विकास पुरुष’ की छवि लेकर क्या करेंगे नीतीश कुमार

ये तो तय है कि बिना सुशासन के विकास पुरुष की छवि बरकरार नहीं रखी जा सकती. लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर ही लालू - तेजस्वी का साथ नीतीश ने छोड़ दिया था.

पितृ पक्ष शुरू होने वाला है. एक महीने से कम समय शेष है. बिहार के गया में पुरखों का पिंडदान सर्वोत्तम माना जाता है. पिछले साल इसी दौरान बिहार के डिप्टी सीएम सुशील मोदी का बयान बरबस जेहन में आता है. उन्होंने गया की धरती से अजीबोगरीब अपील की थी. अपराधियों से पितृ पक्ष के दौरान संयम बरते की अपील. कुछ लोगों ने इसे नीतीश कुमार सरकार ( Nitish Kumar ) की लाचारी की पराकाष्ठा बताया.

उनके बयान से कुछ दिन पहले ही मुजफ्फरपुर में पूर्व मेयर समीर कुमार को एके – 47 से भून दिया गया था. पटना में भी तबरेज आलम पर एके – 47 की मैगजीन खाली हुई थी.

इस घटना के बाद 17 अक्टूबर, 2018 को अपराधियों ने खगड़िया में इंस्पेक्टर आशीष कुमार को गोली मार दी थी. वो सलारपुर दियारा में एक अपराधी को पकड़ने गए थे.

लगभग एक साल बाद क्या बदला है ? पुलिस वाले भी निशाने पर हैं. 20 अगस्त को जो हुआ वो बिहार पुलिस को शर्मसार करने वाला है. सारण में स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) को ही अपराधियों ने उड़ा दिया. एक दारोगा और एक कॉन्सटेबल शहीद हो गए. एक अब भी जिंदगी और मौत से जूझ रहा है. उनके एके – 47 लूट लिए गए. गंभीरता भांप कर डीजीपी गुप्तेश्वर पांडे वहां पहुंचे तो सुशील मोदी से भी घटिया बयान दे दिया.

पांडे को जब गांववालों ने घेरा तो वो बोल गए – ये क्या अपराधी चाहें तो डीजीपी को भी मार सकते हैं.

ठांए – ठांए फिस्स

एक और वाकया. पूर्व सीएम जगन्नाथ मिश्र का अंतिम संस्कार. सूबे के मुखिया नीतीश कुमार ( Nitish Kumar ) खुद मौजूद. दिवंगत सीएम को राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई देनी थी. लिहाजा 21 अगस्त को 21 बंदूकों की सलामी दी जानी थी. जवानों ने आसमान की ओर नाल उठा ट्रिगर दबाए लेकिन एक भी गोली नहीं चली. अब जांच वाली परिपाटी निभाई जा रही है.

ये हाल है बिहार पुलिस का. सुशासन बाबू पुलिसवालों से सशक्त महसूस करने की अपील करते आए हैं. पिछले साल जब पटना के बेली रोड पर भव्य और अत्याधुनिक पुलिस भवन का उदघाटन कर रहे थे तब नीतीश ने एक अपली भी की थी – आम जनता को भगवान भरोसे मत छोड़िए.

ये तो तय है कि बिना सुशासन के विकास पुरुष की छवि बरकरार नहीं रखी जा सकती. कथित घोटाले ही सही लेकिन लॉ एंड ऑर्डर के नाम पर ही लालू – तेजस्वी का साथ नीतीश ने छोड़ दिया था. आँकड़े बताते हैं कि आरजेडी के साथ उनकी सरकार में जघन्य अपराध ( Crime in bihar ) कम थे. बाद में बढ़ गए. बिहार पुलिस ने 2019 में मई तक के आंकड़े अपनी वेबसाइट पर दिए हैं. मर्डर के मामले देखें तो जनवरी में 212 घटनाएं हुई. ये माह दर माह बढ़ कर मई में 330 पर पहुंच गया.

कहां चूक रहे हैं नीतीश ..

सवाल उठता है कि प्रशासनिक दक्षता के लिए चर्चित नीतीश ( Nitish Kumar ) चूक कहां रहे हैं. उनकी पार्टी जेडीयू बचाव में एक दलील देती आई है. वो ये कि कई आपराधिक घटनाओं में लालू – तेजस्वी की आरजेडी के लोग शामिल हैं. लेकिन सत्ता तो नीतीश के पास है. पुलिसिया चाबुक चलाने से किसने रोका ?

दरअसल शराबबंदी और बालू कारोबार को रेगुलेट करने की कोशिशों के बाद एक तरह का नेक्सस सामने आया है. पुलिस – कार्टेल गठजोड़. जहां काम करता है ठीक है. जहां नहीं, वहां पुलिस वालों पर भी कोई मुरव्वत नहीं. अपराधी खुलेआम उन्हें भी निशाना बनाते हैं.

पुलिस रिफॉर्म की धीमी रफ्तार और पुलिसकर्मियों की कमी भी बड़ी समस्या है. बिहार में हर 839 लोगों पर एक पुलिसकर्मी है जबकि राष्ट्रीय औसत 554 का है. लगभग 30 हजार पद खाली हैं. पुलिस रिफॉर्म का उल्टा असर हो रहा है. लॉ एंड ऑर्डर और इन्वेस्टिगेशन को अलग करने की कोशिश थाना स्तर पर चल रही है. इससे पुलिस – अपराधी – कारोबारी नेक्सस में कई तरह की पेचीदगियां सामने आ रही है.

एक ही थाने में लॉ एंड ऑर्डर और इन्वेस्टीगेशन डिपार्टमेंट के पुलिस वाले आपस में ही टकरा रहे हैं. दरअसल ये भ्रष्टाचार के स्वार्थों का टकराव है. जब तक नीतीश कुमार सियासी चिंता को तवज्जो देते रहेंगे तब तक सुशासन का राज कायम नहीं हो पाएगा.