OPINION : क्या ये अरविंद केजरीवाल के ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ का वक्त है!

शपथ के बाद केजरीवाल ने अपने संबोधन में तस्वीर बिल्कुल साफ कर दी. दिल्ली से एकदम नई राजनीति की शुरुआत का दम भरा और तिरंगे की शान से लहराने की जो शर्तें बताईं, वो समर्थकों के दिलों में उतर गईं.
Arvind Kejariwal politics, OPINION : क्या ये अरविंद केजरीवाल के ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ का वक्त है!

11 फरवरी को नतीजों में इतिहास रच दिया. तीसरी बार दिल्ली का राजपाट भी संभाल लिया. नतीजों के बाद ‘बजरंगी भाईजान’ बताए गए केजरीवाल का स्वागत दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘सिंघम रिटर्न्स’ और ‘नायक पार्ट-2’ जैसे बैनर-पोस्टर से हुआ.

अपने नेता की विशाल छवि गढ़ने के लिए ये शब्द बड़े ही प्रभावी लग रहे थे. ‘काले अंग्रेजों भारत छोड़ो’ लिखे एक बड़े-से बैनर ने फिर से तस्दीक की कि अरविंद केजरीवाल की पार्टी अब दिल्ली से आगे भारत की सोच रही है.

Arvind Kejariwal politics, OPINION : क्या ये अरविंद केजरीवाल के ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ का वक्त है!

शपथ के बाद केजरीवाल ने अपने संबोधन में तस्वीर बिल्कुल साफ कर दी. दिल्ली से एकदम नई राजनीति की शुरुआत का दम भरा और तिरंगे की शान से लहराने की जो शर्तें बताईं, वो समर्थकों के दिलों में उतर गईं. बकौल केजरीवाल ये शर्तें कुछ यूं हैं-

जब भारत मां का हर बच्चा अच्छी शिक्षा पाएगा

जब भारत के हर बंदे को अच्छा इलाज मिल पाएगा

जब हर नौजवान के माथे से बेरोजगार का तमगा हट जाएगा

जब धर्म-जाति से ऊपर उठकर हर भारतवासी केवल भारत को आगे बढ़ाएगा

तभी अमर तिरंगा शान से लहराएगा.

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अपनी दिल्ली अपना देश !

दिल्ली के सीएम अपने संबोधन में पूरी दिल्ली को अपना बता रहे थे, तो साथ ही देश से भी खुद को जोड़ते रहे. दिल्ली वालों के दुख-दर्द को अपना बताते रहे, तो साथ ही पूरे देश की तकलीफों को दिल्ली की तर्ज पर मिटाने का भरोसा भी देते रहे. संदेश साफ है. ये केजरीवाल के राष्ट्रीय प्रस्थान का आगाज है.

सारे मंत्रियों को रिपीट करना बड़ी बात

सारे पुराने मंत्रियों को दोहराना एक बड़ी ही खास बात रही. शायद देश में ऐसा पहली बार हुआ. ये कोई मामूली बात नहीं है. जनता ने केजरीवाल के काम पर वोट किया, तो मंत्रियों को दोबारा मौका देकर केजरीवाल ने अपनी टीम को जनादेश का श्रेय दे दिया. ये कोई मामूली बात नहीं.

पीएम मोदी 2019 में जब दूसरी बार शपथ ले रहे थे, तो देश के विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री, गृह मंत्री, वित्त मंत्री और मानव संसाधन मंत्री नए थे. यानी देश ने ज्यादातर बड़े मंत्रालयों में नए चेहरे देखे. ये नहीं कह सकते कि इन मंत्रालयों के काम 2014 से 2019 के कार्यकाल में कमजोर रहे. सुषमा और जेटली जी तो वैसे भी स्वास्थ्य कारणों से मंत्रिमंडल से दूर रहे.

लेकिन इतना तो मानना ही होगा कि पीएम मोदी और शाह को काम को लेकर अपने जज्बे के मुताबिक नए सिरे से टीम बनाने पर मजबूर होना पड़ा. लेकिन केजरीवाल के सामने न ऐसी कोई मजबूरी दिखी और न उन्होंने इसकी जरूरत समझी.

केजरीवाल की दूसरी जीत पहली से बड़ी

2015 में 67 सीटें जीतीं. 2020 में 62 सीटों पर कामयाब हुए. सीटों के लिहाज से जीत छोटी है. लेकिन असल में केजरीवाल की ये जीत 2015 से बहुत बड़ी है. 2015 की जीत में दिल्ली की जनता ने केजरीवाल से बेहतरी की उम्मीदें लगाई थीं. जबकि 2020 की जीत उन उम्मीदों के पूरे होने पर मुहर थी.

यही बात बीजेपी के लिए सबसे बड़ी चुनौती है. क्योंकि राष्ट्रीय पहचान वाले मौजूदा राजनेताओं में अब तक ऐसे करिश्मे ज्यादातर प्रधानमंत्री मोदी के नाम ही दर्ज हैं. मोदी ने गुजरात में कई बार ये करिश्मा दोहराया. यही काम उन्होंने (मोदी ने) 2019 में दोबारा जीत हासिल करके कर दिखाया. अब वैसी ही उपलब्धि की पहली सीढ़ी केजरीवाल ने चढ़ ली है.

Arvind Kejariwal politics, OPINION : क्या ये अरविंद केजरीवाल के ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ का वक्त है!

इस बीच यमुना में बहुत पानी बह गया

2014 के लोकसभा चुनाव में बेहद लचर प्रदर्शन के बाद 2015 में केजरीवाल ने ऐतिहासिक जीत जरूर दर्ज की, लेकिन पार्टी आम चुनाव में हार के झटकों से उबर नहीं सकी. राष्ट्रीय स्तर पर जहां कहीं भी पार्टी ने अपनी जड़ें जमानी शुरू की थीं, एक-एक कर कमजोर होती गईं. पार्टी दिल्ली तक सिमट गई.

दिल्ली में भी शासन के शुरुआती साल बेहद उथल-पुथल वाले रहे. उप राज्यपाल से आए दिन की तू-तू मैं-मैं से संदेश यही गया कि ये लोग सरकार चलाने वाले नहीं, आंदोलनकारी ही रहेंगे. लेकिन अपने टर्म के स्लॉग ओवर्स में किये गए धुआंधार ने केजरीवाल को एक और ऐतिहासिक जीत दिला दी. ये जीत आप के लिए सिर्फ दिल्ली की जीत नहीं थी. बल्कि इसके साथ ही उसका ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ भी शुरू हो गया.

Arvind Kejariwal politics, OPINION : क्या ये अरविंद केजरीवाल के ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ का वक्त है!

जीत के बाद ही राष्ट्रीय प्रस्थान का पहला संदेश

दिल्ली नतीजों के दिन शाम ढलने से पहले आम आदमी पार्टी के ट्विटर हैंडल पर एक संदेश आया. लिखा था- राष्ट्र निर्माण के लिए आप से जुड़ें. नीचे एक मोबाइल नंबर भी दर्ज था. मीडिया ने ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली.

फिर एक और संदेश आया. केजरीवाल के शपथग्रहण में बाकी बीजेपी विरोधी दलों को नहीं बुलाया गया. सवाल था कि क्या ताम-झाम और दिखावे से दूरी के लिए केजरीवाल ने ये फैसला किया है? ऐसा बिल्कुल नहीं था.

दरअसल, राज्यों के क्षत्रपों को नजरअंदाज करना केजरीवाल की पार्टी का ‘राष्ट्रीय प्रस्थान’ की दिशा में पहला बड़ा कदम था. क्योंकि अब यहां से कई राज्यों में आम आदमी पार्टी की मौजूदगी बीजेपी से कहीं ज्यादा स्थानीय पार्टियों को अखरने वाली है.

बाकी बीजेपी विरोधियों को नजरअंदाज करना बड़ी रणनीति

वक्त आ गया है कि आप के नतीजों के दिन राष्ट्र निर्माण वाले संदेश और शपथग्रहण में बाकी विपक्ष को नजरअंदाज करने की दो घटनाओं को जोड़कर देखा जाए. और ये कुछ और नहीं, अरविंद केजरीवाल के राष्ट्रीय प्रस्थान का बिल्कुल साफ ऐलान है.

पिछले 5 दिनों में संजय सिंह समेत कुछ और नेताओं ने इसकी तस्दीक भी की. शपथ ग्रहण के गवाह बनने आए सांसद भगवंत मान ने तो ऐतिहासिक रामलीला ग्राउंड में आप का राष्ट्रवाद बनाम बीजेपी का राष्ट्रवाद की बात तक कह दी.

केजरीवाल के लिए रामलीला ग्राउंड का ऐतिहासिक ही नहीं, इमोशनल महत्व भी है. सबसे ज्यादा इसी मैदान से उन्हें देश और दुनिया ने जाना है. 16 फरवरी 2020 की सुबह वही रामलीला ग्राउंड एक तपे और राजनीति में पके केजरीवाल का वेलकम कर रहा था.

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कितना अनुकूल और कितना प्रतिकूल है आप का राष्ट्रीय प्रस्थान?

राष्ट्रीय विस्तार और प्रस्थान की योजना बन चुकी है. अगले कुछ दिनों में ये काम शुरू भी हो जाएगा. लेकिन क्या ये काम इतना आसान होगा? अनुकूल बात ये है राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस अपने जीवनकाल की सबसे निर्बल-दुर्बल अवस्था में है. प्रतिकूल बात ये है कि मुकाबला बीजेपी जैसी बेहद संगठित और आक्रामक पार्टी से है.

नतीजों के बाद कुछ राजनीतिक पंडितों ने कहा कि केजरीवाल ने पीएम मोदी से जीतने की अदा सीख ली. सच शायद ये है कि केजरीवाल ने जीत की अपनी एक बिल्कुल अलहदा रणनीति बनाई और मैदान मार ले गए.

अब राष्ट्रीय स्तर पर भी केजरीवाल की कामयाबी शायद इसी बात पर निर्भर करेगी कि कांग्रेस की लाइन और बीजेपी की पद्धति से अलग आम आदमी पार्टी क्या ठोस और प्रभावी सोच लेकर आती है?

दोस्तों को दुश्मन बनाने की अदा छोड़ेंगे?

राजनीति में आने के बाद केजरीवाल ने जितने दोस्त बनाए उससे कहीं ज्यादा उन्होंने दोस्ती तोड़ी. अब इस पर चर्चा गैरजरूरी है कि कौन-सी दोस्ती किसकी वजह (गलती) से टूटी? क्योंकि फेहरिस्त लंबी है और उन कारणों में जाने पर यहीं पूरी किताब लिख जाएगी.

फिलहाल तो सवाल ये है कि क्या केजरीवाल अपने व्यक्तित्व के उस पक्ष पर काबू कर पाएंगे, जिसकी वजह से उनके दोस्त टिकते नहीं? साथ ही यक्ष प्रश्न ये भी रहेगा कि क्या वे पुराने साथियों को जोड़ने की पहल करेंगे.

केजरीवाल ऐसा कर सकते हैं क्योंकि काम पर जीतकर आए केजरीवाल अब बहुत आगे निकल चुके हैं. उनकी सत्ता को आप के भीतर चुनौती देना अब आसान नहीं रहेगा. ऐसे में अगर केजरीवाल दोस्तों को सहेजने की अदा सीख लेते हैं, तो राष्ट्रीय प्रस्थान की दिशा में उनका ये एक निर्णायक कदम हो सकता है.

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घिसी-पिटी लकीरों को मिटा पाएंगे केजरीवाल?

धर्म को लेकर बीजेपी के मजबूत आग्रह के दबाव ने कांग्रेस को मजबूर कर दिया. ग्रैंड ओल्ड पार्टी सॉफ्ट हिन्दुत्व की सोचने लगी. देश की कमोवेश हर पार्टी धर्म और जाति का सहारा लेती ही लेती रही है. कई पार्टियों का तो आधार ही यही है. ऐसे में क्या एक और ऐसी पार्टी के लिए देशव्यापी स्पेस है? शायद बिल्कुल भी नहीं. लेकिन यही वैक्यूम केजरीवाल के राष्ट्रीय प्रस्थान के लिए वक्त बिल्कुल मुफीद है.

बस, उन्हें अपने देश की राजनीति की घिसी-पिटी सोच, परंपराओं और मान्यताओं को तोड़ना होगा. क्या केजरीवाल ऐसा कर पाएंगे? इसके लिए केजरीवाल को सबसे पहले शपथ के बाद के अपने ही संबोधन को अपने कर्मों में उतारना होगा. इसके लिए अपने ही इस संबोधन को वह बार-बार सुन सकते हैं. राष्ट्रीय प्रस्थान में आपको इसका लाभ जरूर होगा.

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