महमूद अली जी! जिस पुलिस ने नहीं लिखी FIR उस पर अपनी बहन से ज्यादा भरोसा कैसे करती पीड़िता?

पीड़िता की बहन ने बताया कि वे जब शिकायत करने गए तो उनकी FIR नहीं लिखी गई, बताया कि मामला दूसरे थाने का है. पीड़िता की मां ने कहा कि पुलिस ने शुरुआत में लापरवाही की नहीं तो बेटी जिंदा होती.

जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई

तेलंगाना के गृहमंत्री मो. महमूद अली से यही कहने का मन होता है. हैदराबाद के जघन्य कांड पर अली ने बयान दिया कि ‘ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि पीड़िता ने अपनी बहन को कॉल किया बजाय 100 नंबर डायल करने के. उन्होंने ऐसा किया होता तो वे बच सकती थीं.’

महमूद अली ने जिस कॉन्फिडेंस से ये कहा उसे देखकर लगता है कि पुलिस हर बार बचा ही लेती है. जबकि पीड़िता की बहन ने बताया कि वे जब शिकायत करने गए तो उनकी FIR नहीं लिखी गई, बताया कि मामला दूसरे थाने का है. पीड़िता की मां ने कहा कि पुलिस ने शुरुआत में लापरवाही की नहीं तो बेटी जिंदा होती.

हालांकि इसके लिए पूरी तरह दोष पुलिस के मत्थे मढ़ना ठीक नहीं. दिल्ली पुलिस का आंकड़ा है कि उसके पास रोजाना कम से कम आठ कॉल रेप से संबंधित क्राइम की आती हैं. तेलंगाना में आंकड़ा इससे बड़ा होगा.

एक सच ये भी है कि पूरे देश की पुलिस में जनता का भरोसा बहुत कम है. अपनी बहन से ज्यादा तो बिल्कुल नहीं. इस छवि के लिए पुलिस और प्रशासन सब जिम्मेदार हैं. मुश्किल में अपने घर वालों से भी पहले पुलिस को कोई फोन करे, ऐसा भरोसा पुलिस को जनता में जगाना होगा. महमूद अली के कहने भर से किसी के बचने की गारंटी नहीं मिल जाती.

महमूद अली को बदमाशों के बीच फंसने का कितना अनुभव है? रात के अंधेरे में अगर कहीं गाड़ी खराब हो जाए तो बड़े-बड़े ‘मर्दों’ का हलक सूख जाता है. अगर कोई साया भी नजर आता है तो लगता है कि ये बचाने वाला तो नहीं हो सकता, लूटने ही आया होगा. क्या पता जान भी ले ले. हो सकता है इसके पास पिस्टल हो. या शायद चाकू हो. यहां भागने का कोई रास्ता भी नहीं है. एक मिनट में मन हजार तरह के डर पैदा करता है. उस वक्त पुलिस को फोन करने का आइडिया कितने लोगों को आता है.

वो तो एक लड़की थी. उसके पास खोने के लिए जान-माल के अलावा सामाजिक चोंचलों के अनुसार ‘इज्जत’ भी होती है. उन्हें किसी भी पुरुष से उस वक्त चार गुना ज्यादा डर लग रहा होता है. रात में निकलने का रिस्क और कहीं फंस जाने का डर कोई लड़की ही समझ सकती है, हमारे आपके जैसे घरों में सुकून से बैठे लोग नहीं.

जरा पता कीजिएगा कि महमूद अली के काफिले में कितनी गाड़ियां हैं? अगर उनकी सारी सिक्योरिटी हटा दी जाए तो उन्हें कोई प्रॉब्लम तो नहीं होगी? उनके घर से गार्ड हटा दिए जाएं, उनके बच्चों को स्कूल ले जाने के लिए सिक्योरिटी न रहे तब भी क्या वे इतनी लापरवाही से यही बात अपने घर वालों से कर पाएंगे कि ‘अगर तुम्हें कहीं खतरा नजर आए तो मुझे फोन करने से पहले 100 डायल करना?’

ये भी पढ़ें:

‘प्लीज मुझसे बात करती रहो जब तक मेरी स्कूटी वापस आती है, मैं बहुत डरी हुई हूं’