बॉर्डर पर हो आत्‍मन‍िर्भर भारत की ललकार, इसके ल‍िए ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों की ऐसी रणनीति हो तैयार

ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड का कॉर्पोरेटाइजेशन हो रहा है. लेक‍िन आयुध फैक्‍ट्र‍ियों के ल‍िए इतना काफी नहीं है. जरूरत है जाबांजों की जरूरत के ह‍िसाब से इनोवेशन की ताक‍ि सुरक्षा के मामले में वे आत्‍म न‍िर्भर भारत की दहाड़ दुश्‍मनों को सुना सकें.
ordnance factory, बॉर्डर पर हो आत्‍मन‍िर्भर भारत की ललकार, इसके ल‍िए ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियों की ऐसी रणनीति हो तैयार

रक्षा मंत्रालय ने हाल ही में ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड (OFB)के कॉर्पोरेटाइजेशन के लिए खेतान एंड कंपनी लिमिटेड के साथ केपीएमजी को नियुक्त किया है. डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस (DIB) प्राइवेट सेक्टर और पब्लिक सेक्टर को लेकर आजकल बहस चल रही है. ओएफबी के कॉर्पोरेटाइजेशन को लेकर ढेर सारे विचार सामने आ रहे हैं. अधिकतर विचार ऐसे ही हैं कि निजी क्षेत्र अपनी कंपनी खुद लगाए और चलाए, जिससे रक्षा मंत्रालय को तत्काल उसका रिटर्न मिले. राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में सरकारी और निजी क्षेत्र की भूमिका का विषय बहुत से देशों में संवेदनशील विषय बन चुका है.

रक्षा सामग्री के उत्पादन में निजी क्षेत्र की सहभागिता शीत युद्ध की समाप्ति के बाद विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में अचानक बढ़ी. कारण था कि शीत युद्ध की समाप्ति के बाद दुनिया की बड़ी-बड़ी सेनाएं सिकुड़ने लगीं थीं और हथियारों की मांग कम हो गई थी. पर आज भारत का रक्षा परिदृश्य दुनिया के ताकतवर देशों से अलग है. यहां एलएसी पर भारत की सेना को दुश्मन देश की सेना के साथ आए दिन आंख में आंख में डालकर आमना सामना करना पड़ रहा है. इसलिए यहां ड‍िफेंस इंडस्‍ट्र‍ियल बेस को सुधारना जरूरी है. हालांक‍ि लागत के अनुसार परिणाम पाना भी जरूरी है, लेक‍िन इस ओर कदम पर्याप्त सावधानी से बढ़ाने होंगे ताक‍ि इनकी वजह से संगठन में होने वाली हलचल और व्यवधान को कम क‍िया जा सके.

कुछ समय पहले रक्षा मंत्रालय ने प्राइसवाटरहाउस कूपर्स को आर्मी बेस वर्कशॉप्‍स (जहां सेना के हथियारों और उपकरणों के रखरखाव, मरम्मत और पुणर्निर्माण का काम होता है ) पर सरकारी स्वामित्व वाले संविदाकारक (Government Owned Contractor Operated- GOCO) मॉडल के तहत रणनीतिक सलाह देने और इसे लागू कराने के ल‍िए सलाहकार के तौर पर न‍ियुक्‍त क‍िया था. ऐसे में एक खास बात जो सामने आई, वह था मूल पुनर्निर्माण के संचालन को निजी ऑपरेटरों को सौंपने पर सेना का एक ही तरह का दृष्‍टिकोण. यह व‍िचार करने वाला वो व‍िषय है ज‍िसे महज बातचीत से सुलझाया नहीं जा सकता. चूंक‍ि नेताओं को एक साथ कई मुद्दों को लेकर चलने की आदत नहीं है, ल‍िहाजा GOCO को लागू करने में भी उन्‍होंने एक हद तक अदूरदर्शी रवैया ही द‍िखाया. ये व‍िस्‍तृत र‍िपोर्ट भी भुगतान के बदले नौस‍िख‍िया प्रयास को ही द‍िखाती है. यहां इस बात को पूरी तरह नजरअंदाज क‍िया गया है क‍ि आर्मी बेस वर्कशॉप्‍स इंजीन‍ियर‍िंग में बेहद दक्ष बॉडीज हैं ज‍िनके पास पुरानी मशीनरी व हथ‍ियारों को म‍िशन स्‍तर पर तुरंत ठीक करने की ऐसी तकनीक है जो व‍िश्‍व की तमाम जगहों से एकत्र‍ित कर तैयार की गई है. इस पुराने ज्ञान की वजह से फ‍िलहाल करीब 30 साल पुरानी बोफोर्स ही लाइन ऑफ कंट्रोल और लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल के ल‍िए मुख्‍य तौर पर हथ‍ियार मुहैया करवा रही है. सुपर हाई एल्टीट्यूड पर गतिव‍िध‍ियां बनाए रखने और बंदूकों को चलाने के लिए देखरेखकर्ता के बेहद श्रमसाध्य प्रयासों की आवश्यकता होती है. देश की सुरक्षा पर लंबे समय से मंडरा रहे खतरे को देखते हुए हमें बाकी देशों द्वारा ल‍िए फैसलों को थोड़े खुले नजर‍िए से देखने की जरूरत थी. इसमें खाड़ी युद्ध के दौरान अमेर‍िका और यूके को मिले सबक भी शामिल क‍िए जा सकते थे ज‍िसमें उनका GOCO को अस्‍वीकार क‍िया जाना शामिल था ताक‍ि पब्‍लिक प्राइवेट पार्टनरश‍िप का संतुलन बनाकर मिशन के ल‍िए एकदम तैयार, बेहतर क्षमता और प्रभावी ऑपरेशंस की उच्‍चतम स्‍थ‍ित‍ि को प्राप्‍त क‍िया जा सके. फ‍िलहाल वास्तविक नियंत्रण रेखा पर गतिरोध लगने के बाद से एक बार फ‍िर पहले जैसी तत्परता की जरूरत महसूस हो रही है और उम्‍मीद है क‍ि आर्मी बेस वर्कशॉप्‍स पर सीधे अधिकार की जगह कॉन्‍ट्रैक्‍टर संचाल‍ित एमआरओ को लेने से पहले आर्मी इस पर गौर करेगी. क्‍योंक‍ि क‍िसी भी तरह का कॉन्‍ट्रैक्‍ट हमारी तैयारी और तत्‍परता को प्रभाव‍ित कर सकता है.

ऑर्डिनेंस फैक्ट्री कई साल तक सशस्त्र बलों को हथियार और युद्ध का साजो-सामान उपलब्ध कराता रहा है जो या तो डीआरडीओ द्वारा विकसित होते थे या फ‍िर जिसकी तकनीक व‍िदेश से आती थी. सेना की ओर से ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के उत्पादों की गुणवत्‍ता, लागत और मिलने वाले समय के संबंध में वाजिब सवाल उठाए जाते रहे हैं. ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में निश्चित रूप से आधुनिकीकरण, योग्य कर्मचारियों की उपलब्धता जैसी औद्योगिक सर्वोत्तम प्रथाओं को लागू करने की आवश्यकता है. हालांकि, ऑर्डिनेंस फैक्ट्री के कुछ अनोखे लाभ की पेशकश को अनदेखा किया जाता है, जैसे संकट के समय में डिलीवरी करने की क्षमता, युद्ध क्षेत्र में तैनात सिस्टम को तत्परता से एक अन्य विकल्प के साथ मेंटेंनेंस पहुंचाना. कुछ ऐसा ही सिस्टम शीतयुद्ध खत्म होने के पहले तक विकसित देशों में भी चलता रहा.

दो फ्रंट वॉर की संभावनाओं के साथ, जैसा सीडीएस ( चीफ आफ डिफेंस स्टाफ) की बातों से जाहिर होता है, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि यह कंसल्टिंग एजेंसी एक मात्र इस उद्देश्य के साथ काम शुरू करे क‍ि इसे ब‍िना रुके बर्फीली चोट‍ियों पर सेना के वीर लड़ाकों को भरोसे के असॉल्ट राइफल, टैंक, गन पहुंचाना है जो आख‍िरी राउंड तक ब‍िना रुके चलते रहें. ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बोर्ड के साथ कंसल्टेंसी खुलेपन के माहौल में किए जाने की जरूरत है , न कि जीओसीओ के पीडब्लूसी के लिए अपनाए गए ‘हमारे और उनके’ जैसे भाव के साथ. यह याद रखने की जरूरत है कि संगठनों में परिवर्तन तभी होता है जब वो लोगों के बीच सुर्खियों में होती है. परिणामों और जवाबदेही पर जोर देने के साथ-साथ कर्मचारियों के कल्याण, काम और जीवन के संतुलन के बारे में भी चिंता होनी चाहिए. प्रौद्योगिकी चुनौती नहीं है, संस्कृति है. संस्कृति को सहयोगी, अभिनव, उच्च प्रदर्शन करने वाला, भरोसेमंद और पारदर्शी बनाया जा सकता है. डिफेंस प्रबंधन के पास कई सरकारी क्षेत्र की कंपनियां हैं. इनमें जिनका कॉर्पोरेटाइजेशन हो चुका है वो सभी अब तक पहले जैसी ही समस्याओं से जूझ रही हैं – जैसे उत्पाद की गुणवत्ता, लागत और समय पर काम पूरा न होना तथा मुश्किल से किसी इनोवेशन का होना.

यदि प्रधानमंत्री के आत्मनिर्भर भारत के नारे को वास्तविकता में बदलना चाहते हैं तो डीआईबी ( डिफेंस इंडस्ट्रीयल बेस) को भी उसी तरह चलना होगा. इसके ल‍िए हमें मूल दक्षताओं पर जोर देना होगा और आयुध कारखानों व प्राइवेट सेक्‍टर के साथ उप प्रणाली स्तर पर मिलकर काम करना होगा. आयुध फैक्‍ट्र‍ियों और ड‍िफेंस पब्‍ल‍िक सेक्‍टर यून‍िट्स को को ऐसे ही न‍िचले स्‍तर पर रखा नहीं जा सकता है क‍ि ये मुद्रण और छोटे पार्ट्स बनाने के काम में लगे रहें. इनको आगे बढ़कर उच्‍च स्‍तर की र‍िसर्च और इनोवेशन में जुटना होगा क‍ि इनकी रचनात्‍मकता न स‍िर्फ भारत मां की सुरक्षा करे बल्‍क‍ि स‍िव‍िल फील्‍ड में भी काम आए. हथियार प्रणालियां उन तमाम तकनीकों के मेल से बनती हैं जो एक साथ जुड़ कर सैन्य प्रभाव तय करती हैं. भारत को व‍िश्‍व में ऐसे अन्वेषक और निर्यातक के तौर पर उभरने के लिए इसी तरह की हथियार प्रणाली को व‍िकस‍ित करने की जरूरत है. ओएफबी को जो कॉरपोरेट में बदला जा रहा है, उसका फोकस कीमत से ज्‍यादा असर या प्रभाव पर होगा, तो ही ये कदम प्रधानमंत्री का सपना पूरा कर पाएगा.

(लेखक लेफ्टिनेंट जनरल (डॉ.) एन बी सिंह, PVSM, AVSM, VSM, ADC एक पूर्व DGEME, DGIS और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के सदस्य हैं.)

Related Posts