जब गिरेबान ही फटा हो तो राजनीति के धर्मवीर झांकेंगे कहां, अली में या बजरंगबली..

चुनाव का मौसम है. मॉनसून नहीं. फिर टर्र - टर्र की आवाज़ आ रही हो तो सचेत रहने की ज़रूरत है. सियासी मेढ़कों ने अपना काम शुरू कर दिया है

अली, बजरंगबली और बजरंगअली. इसका पहले चरण की वोटिंग और अंडरकरंट से क्या लेना-देना है? मुझे भी पता नहीं. हां ये दीगर है कि पिछले तीन दिनों में ये शब्द नए उपसर्ग और प्रत्यय के साथ नए रूपों में सामने आ रहे हैं. 84 करोड़ देवताओं को मानते हैं इसका मतलब ये नहीं कि कोई आजम या योगी कोई नया भगवान थमा जाए.

चुनाव का मौसम है. मॉनसून नहीं. फिर टर्र – टर्र की आवाज़ आ रही हो तो सचेत रहने की ज़रूरत है. सियासी मेढकों ने अपना काम शुरू कर दिया है. ये हर दल में हैं. राम मंदिर को मैनिफेस्टो में रखने वाली पार्टी में भी. बीजेपी का भगवान भरोसे रहना अजीब लगता है. लेकिन सबूत तो सामने हैं. देश के सबसे बड़े प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ ने खुद माना है. वो कहते हैं, “अगर एसपी-बीएसपी और कांग्रेस को अली पर भरोसा है तो हमें भी बजरंगबली पर भरोसा है. वे इस बात को मान चुके हैं कि बजरंगबली के अनुयायी उन्हें कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे.”

लगे हाथ समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान ने अली और बजरंगबली का घालमेल कर दिया. उन्होंने कहा, इस बार बजरंग अली सारे दुश्मनों की नली तोड़ेंगे. वो भगवान हनुमान के एक आह्वान को ट्विस्ट दे रहे थे – जय बजरंगबली, तोड़ दे दुश्मन की नली. धार्मिक सदभाव की बत अलग है. लेकिन आस्था का मिलान शायद लोग पसंद न करें. इसलिए बजरंग अली वाले बयान पर आजम खान निशाने पर हैं. बीजेपी ने शाहनवाज हुसैन को ही आधिकारिक निशानेबाज बनाया. उन्होंने आजम को बदजुबानी न करने की नसीहत दी. शाहनवाज के मुताबिक ये हिंदुओं की आस्था ही नहीं बल्कि मुसलमानों की आस्था पर भी चोट है. उनकी दलील है कि अली सिर्फ हजरत के बाद लिखा जाना चाहिए. बजरंग के बाद नहीं.

राजनीति के दलदल में धंसे संकटमोचक

पर बजरंगबली पिछले ही रामनवमी से चर्चा में हैं. तब रामनवमी जुलूस के बाद पश्चिम बंगाल और बिहार में सांप्रदायिक दंगे हुए थे. इसके बाद भी बजरंगबली नेताओं के फोकल प्वाइंट पर बने रहे. उन्हें सामाजिक न्याय सो जड़ दिया गया. दलित एक्ट पर बवाल के बीच बजरंग बली का प्रादुर्भाव दलित के तौर पर हुआ. योगी ने ही जाति बताई. फिर कई लोगों ने बताई. मुस्लिम धर्म गुरुओं ने भी हाथ साफ किया. अब तक जाति के इतर सभी हिंदुओं के संकटमोचक जातीय पहचान के संकट से ग्रस्त हो गए. दलित के बाद किसी ने राजपूत बनाया तो किसी ने ब्राह्मण. नवाब साहब ने मुसलमान बना दिया. बवाल मचा. थम गया.

दूसरे चरण के चुनाव से पहले पवनसुत किस पार्टी की हवा निकालेंगे पता नहीं पर एक अदद कोशिश नेताओं की तरफ से बनती है न. धर्म और राजनीति के घालमेल पर विमर्श नया नहीं है. निष्कर्ष भी नया नहीं है.

धर्म पर राजनीति नहीं होनी चाहिए, राजनीति का धर्म ज़रूर होना चाहिए. राजनीति का धर्म यानी इंसानियत का धर्म. बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी बार-बार इसका जिक्र किया करते थे. राजधर्म निभाने की गुजारिश तो उन्होंने सबके सामने नरेंद्र मोदी से ही कर दी थी.

लेकिन राज करने वाले धर्म को हथियार बनाने से कहां चूकने वाले थे. हालांकि सपा से समझौते के बावजूद आजम खान से खुंदक रखने वाली मायावती ने चौंकाने वाला बयान दिया. वो कहती हैं, अली और बजरंगबली दोनों हमारे हैं. वही मायावती जो दलितों को हिंदुओं से अलग बताकर बौद्ध धर्म अपनाने की धमकी दे चुकी हैं. चौंकिए मत. अली और बजरंगबली दोनों को अपनाने का सियासी फायदा किसी सेफोलॉजिस्ट से पूछ लीजिए. ऐसे में तहजीब सामने आ ही जाती है.

इस दंगल में अटल जी की ही एक बात याद आती है. उन्होंने कहा था – राजनीति काजल की कोठरी है. जो इसमें जाता है, काला होकर ही निकलता है.