अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

अयोध्या मामले से दो बातें साफ होती हैं. प्रभाषजी लिखने की आजादी के किस हद तक पक्षधर रहे. क्या कोई संपादक संपादकीय लेखों और खबरों में अलग-अलग लाइन की छूट दे सकता है? दूसरी बात यह कि भगवा बिग्रेड से प्रभाषजी आ​‍खिर क्यों नाराज हो गए. यह अब तक लोगों के लिए अबूझ पहेली है.
Prabhash Joshi Birth Anniversary Ayodhya Issue, अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

अयोध्या का जिक्र किए बिना प्रभाष जोशी को नहीं समझा जा सकता है. अयोध्या कांड से देश की राजनीति ने करवट बदली. साथ ही प्रभाषजी की लेखनी और व्यक्तित्व ने भी. अयोध्या मामले से दो बातें साफ होती हैं. प्रभाषजी लिखने की आजादी के किस हद तक पक्षधर रहे. क्या कोई संपादक संपादकीय लेखों और खबरों में अलग-अलग लाइन की छूट दे सकता है? दूसरी बात यह कि भगवा बिग्रेड से प्रभाषजी आ​‍खिर क्यों नाराज हो गए और अंत तक भगवा बिग्रेड को ललकारते रहे. यह अब तक लोगों के लिए अबूझ पहेली है. इस बारे में तरह​-तरह की कहानियां प्रचलित हैं कि जो प्रभाष जोशी संघ परिवार और नरसिंह राव के बीच अयोध्या मामले में बातचीत का हिस्सा थे, वे आ​‍खिर क्यों संघ परिवार पर फट पड़े? आ​‍खिर ऐसा क्या हो गया कि जो जमात कल तक सती प्रथा पर सिर्फ एक लेख लिखने की वजह से प्रभाषजी को पोंगापंथी कहने लगी थी, वहीं रातोंरात प्रभाषजी को अपने पाले में ले उड़े. इन सवालों का खुलासा राजनीति का अयोध्या कांड करता है.

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6 दिसंबर, 92 को जब मैंने अयोध्या के एक पी.सी.ओ से प्रभाषजी को बाबरी ध्वंस की जानकारी देने के लिए फोन किया तो रामबाबू ने कहा, “संपादकजी आपको ढूँढ़ रहे हैं.” मैंने उन्हें बाबरी ध्वंस की पूरी कहानी बताई. प्रभाषजी रोने लगे. कुछ देर चुप रहे. फिर कहा, “यह धोखा है, छल है, कपट है. यह विश्वासघात है. यह हमारा धर्म नहीं है. अब हम इन लोगों से निपटेंगे.” प्रभाषजी विचलित थे. उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था और मैं दोपहर बारह बजे से शाम पाँच बजे तक ध्वंस का पूरा हाल पाँच मिनट में उन्हें सुनाने की रिपोर्टरी उत्तेजना में था. दूसरे रोज प्रभाषजी ने लिखा, “राम की जय बोलनेवाले धोखेबाज विध्वंसकों ने कल मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रघुकुल की रीति पर कालिख पोत दी. बाबरी ढाँचे को विश्वासघात से गिरा दिया और लोग समझते हैं कि वे इस तरह राम का मंदिर बनाएँगे, वे राम को मानते-जानते और समझते नहीं हैं. ढाँचा गिराते वक्त रामलला की मूर्तियाँ बाहर ले जाना और फिर चुपचाप लाकर अस्थायी मंदिर में रख देना, इस बात का प्रमाण है कि यह सब पूर्व योजना के अनुसार हुआ ​था. यह सफेद झूठ है कि ढाँचे का ढहना हिंदू भावनाओं का विस्फोट है. इसे ढहाने में कोई तात्कालिकता नहीं थी. न हड़बड़ी थी.”

Prabhash Joshi Birth Anniversary Ayodhya Issue, अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

उनका मानना ​था कि ये हिंदुत्ववादी धर्म से कोसों दूर हैं. इन्होंने धर्म की मर्यादा, सहिष्णुता, वैष्णवता और उदारता को ध्वस्त किया है. शायद इसलिए वे जनाक्रोश के उभार के बावजूद हिंदी के अकेले संपादक थे, जिन्होंने अपना अलग ‘स्टैंड’ लिया. बाकी हिंदी अखबार कारसेवा में बह गए. यह बताने का मकसद सिर्फ इतना है कि प्रभाषजी ध्वंस से किस कदर दुःखी थे और खुद को ठगा हुआ समझ रहे थे, बावजूद इसके उन्होंने खबरों को लिखने की आजादी नहीं छोड़ी. और न ही कोई फतवा जारी किया. उन्होंने संपादकीय सहयोगियों से साफ कहा, “मैंने एक लाइन ली है. पर इसे खबरों की लाइन न समझा जाए.” दुर्भाग्यवश प्रभाषजी के बाद के संपादक इसे समझ नहीं पाए.

मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं है कि अयोध्या से भेजी जाने वाली खबरों में मैं प्रभाषजी से उलट लाइन ले रहा था. क्योंकि जमीनी उत्साह और जन आक्रोश का मुझ पर प्रभाव ​था. फिर विहिप ने मुसलिम तुष्टीकरण के सवाल पर देश-भर में जो आंदोलन खड़ा किया था, उसका आधार इतना व्यापक था कि मैं उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सका. नतीजतन प्रभाषजी ने मुझे रामभक्त पत्रकार घोषित कर दिया. उसी अखबार में अपने लेखों में मुझे इस नाम से संबो​धित किया. मेरी खबरों को खारिज करते हुए संपादकीय लिखे. एक उदाहरण कार्तिक पूर्णिमा पर विश्व हिंदू परिषद ने अयोध्या में संकल्प का आयोजन रखा. मैंने रपट लिखी. ‘आज पाँच लाख लोगों ने सरयू तट पर डुबकी लगाई और मंदिर निर्माण का संकल्प लिया’ आदि-आदि. मेरी यह खबर पहले पेज पर छपी.

दूसरे दिन प्रभाषजी का लेख छपता है कि मेरे रामभक्त पत्रकार ने लिखा है कि कल अयोध्या में पाँच लाख लोगों ने सरयू तट के किनारे मंदिर निर्माण का संकल्प लिया. मैं उन्हें बता दूँ कि अयोध्या में कार्तिक पूर्णिमा के रोज डुबकी लगाने वाले सभी लोग विहिप के सदस्य नहीं है. अयोध्या में कार्तिक पूर्णिमा पर स्नान की यह परंपरा तब से चल रही है जब विहिप, संघ और उनके संस्थापकों का जन्म भी नहीं हुआ था. डुबकी का यह सिलसिला हमारी अनंत परंपरा में है. ऐसे कम-से-कम दस अवसर होंगे जब प्रभाषजी ने मुझे अपने लेखों के जरिए सचेत किया. लेकिन मेरी रिपोर्ट ‘किल’ कभी नहीं की. यह आजादी उन्होंने मुझे दी. बाद के किसी संपादक से मुझे ऐसी आजादी नहीं मिली. मैं पूरे आंदोलन में प्रभाषजी की संपादकीय लाइन के ​खिलाफ था.

Prabhash Joshi Birth Anniversary Ayodhya Issue, अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

प्रभाषजी चाहते तो हिंदी संपादकों की आज की परंपरा के तहत मुझे ही लाइन पर ले सकते थे. उनके पास चार विकल्प थे. एक—प्रधान संपादक के नाते वे मेरी खबरों को संपादित कराते. वह अंश निकाले जाते जिन पर उन्हें एतराज होता. दो—फिर भी नहीं मानता तो मेरी खबरें किल होती. जैसा बाद में एक संपादक ने रामबहादुर राय की कई रपटों के सा​थ किया. तीन-हेमंत शर्मा चेत जाओ, नहीं चलेगी तुम्हारी अराजकता. यह मेमो मिलता. और चार—मुझे नमस्कार कर घर बैठने को कहा जा सकता था. संपादकों का उत्तर प्रभाष जोशी परंपरा में चौथा विकल्प आजकल सबसे आसान है. आप कह सकते हैं, यह अराजक आजादी थी. पर थी. इसी आजादी ने ‘जनसत्ता’ का चरित्र बनाया था.

अपने रिपार्टरों को ऐसी आजादी कौन देता है? कौन संपादक है आज, जो अपने रिपोर्टर के पीछे मजबूती से खड़ा हो. और मुद्दों पर उनके सामने उसी मजबूती से अड़ा हो. प्रभाषजी ने कभी भी रिपोर्ट इसलिए नहीं रोकी कि रिपोर्ट संपादक को पसंद नहीं है. या इस रिपोर्ट से कोई राजनेता नाराज होगा या फिर फलाँ आदमी संपादक का मित्र है.

अब बात अयोध्या पर प्रभाष जोशी के बिफरने की. यह बहुत कम लोगों को पता है कि प्रभाषजी सरकार और संघ के बीच अयोध्या पर हो रही बातचीत का हिस्सा थे. कोई बीच का रास्ता निकले, सहमति बने, इस को​शिश में वे ईमानदारी से लगे थे. वे नरसिंह राव और रज्‍जू भैया के बीच होनेवाली बातचीत में भी शामिल थे. होने वाली हर बातचीत में कुछ बातें साफ थीं. ढाँचा गिराया नहीं जाएगा और सह​मति बनने तक विवादित स्थल के बाहर कारसेवा की इजाजत दी जाएगी. लेकिन प्रभाषजी को विहिप की नीयत में खोट जुलाई में ही दिखने लगा. 9 जुलाई से ढाँचे के सामने जिस चबूतरे पर कारसेवा होनी थी उसके बारे में ‘जनसत्ता’ पहला अखबार था जिसने लिखा ​कि कोर्ट के आदेशों को ठेंगा दिखाकर होगी कारसेवा. दूसरे रोज 8 जुलाई को फिर खबर दी—‘झूठ और फरेब पर बनेगा मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर’. इसी रिपोर्ट के आधार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 15 जुलाई को कारसेवा रोक दी. बावजूद इसके प्रभाषजी मुझे रामभक्त कहते रहे. मैंने कभी उनसे इसकी ​शिकायत भी नहीं की. यहीं से प्रभाषजी ने अपनी लाइन बदली.

Prabhash Joshi Birth Anniversary Ayodhya Issue, अयोध्या में ‘राम भक्त’ रिपोर्टर और असहमति का आदर करते अनोखे संपादक प्रभाषजी

इसी खुन्नस में चम्पुओं ने बाद में प्रचार शुरू किया कि उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा, इसलिए प्रभाषजी नाराज हैं. उन्हें यह पता ही नहीं कि जब 1989 में वी.पी. सिंह ने सरकार बनाई तो प्रभाषजी को राज्ससभा में भेजने का प्रस्ताव हुआ था. लेकिन प्रभाषजी को उस रास्ते नहीं जाना था. सो वे नहीं गए. प्रभाषजी जे.पी. के सहयोगी रहे हैं. विश्वनाथ प्रताप सिंह, चंद्रशेखर और नरसिंह राव जैसे प्रधानमंत्रियों से उनकी मित्रता रही है. उनके लिए यह मामूली चीज थी. पर राजनीति उन्हें भायी नहीं.

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1998 के सितंबर में मैं प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से सात रेसकोर्स पर मिला. मैं लखनऊ से आता था. अटलजी कल्याण सिंह में रुचि रखते थे, इसलिए मेरी उनसे लगभग हर दिल्ली यात्रा में बात होती थी. इस बार अटलजी ने यकायक कहा, ‘प्रभाषजी को क्या हो गया है’ इस पर मैंने कहा कि आपके ही लोग तो कह रहे हैं कि उन्हें राज्यसभा में नहीं भेजा. अटलजी ने छूटते ही कहा कि मैं यह नहीं मानता. प्रभाषजी इससे ऊपर हैं. मैं उनकी तकलीफ समझता हूँ. लेकिन उनकी भाषा से सहमत नहीं हूँ. मैं इस प्रसंग का जिक्र इसलिए कर रहा हूँ कि अटलजी भी इस प्रचार की असलियत समझते थे. दरअसल, बाबरी मस्जिद प्रभाषजी की नजरों में सिर्फ भारतीय मुसलमानों की ऐतिहासिक और अतिक्रमित धर्मस्थली नहीं थी. वह उनके लिए हिंदुओं की धर्म-संस्कृति और सामाजिक परंपराओं की कसौटी भी थी.

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