क्यों ठहर गई ‘चलते’ मजदूरों की जिंदगी?

कल तक यही मजदूर (Workers) वोटर (Voter) होने के नाते मां-बाप थे, आज ये केवल सरकारों के एहसानों की भूखी आबादी हैं. कल तक ये मजदूर अर्थव्यवस्था (Economy) की रीढ़ थे और आज इनकी जिम्मेदारियां उठाने में अर्थव्यवस्था की पीठ पर बोझ बढ़ने लगा.
Migrant labourers and politics, क्यों ठहर गई ‘चलते’ मजदूरों की जिंदगी?

देश की अलग-अलग सड़कों, एक्सप्रेस-वे और हाईवे पर सैकड़ों-हजारों-लाखों मजदूर हैं. सभी हालात के आगे मजबूर हैं, जिन्हें दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से मिल पा रही है. मजदूर वही है, बस अब उसकी पहचान बदल गई है. इन मजदूरों को कोरोना कैरियर (Corona Careers) माना जा रहा है. इन्हें दूसरे लोगों के लिए खतरे के रूप में देखा जा रहा है. इसके लिए ये गरीब मजदूर बदसलूकी झेल रहे हैं और डंडे भी खा रहे हैं. अपने घर पहुंचने के लिए मजदूर लगातार चल रहे हैं. चलते रहना ही अब इनकी किस्मत बन गई है, क्योंकि इनके रुकते ही इनके लिए सबकुछ ठहर जाता है.

राज्य सरकारें रोज एक ही बात की रट लगा रही हैं, कि उन्होंने मजदूरों की घर वापसी का इंतजाम किया है. उनके खाने-पीने की व्यवस्था की है. इन्हें कोई तकलीफ नहीं होने दी जाएगी. वहीं, पैदल ही सड़क नापते मजदूर कहते हैं कि वे भूखे हैं. उन्हें उनके घर पहुंचाने का कोई इंतजाम नहीं किया गया है. अगर सरकारें पूरी तरह से सच कह रही होतीं, तो हजारों मजदूर सड़कों पर नहीं दिखाई देते. अगर सरकारें सच कह रही होतीं, तो रोटी के एक टुकड़े के लिए ये गरीब सड़क पर दिखने वाले इक्का-दुक्का दानदाताओं की तरफ लपक कर हाथ नहीं फैला रहे होते.

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कल तक यही मजदूर वोटर होने के नाते मां-बाप थे, आज ये केवल सरकारों के एहसानों की भूखी आबादी हैं. कल तक ये मजदूर अर्थव्यवस्था की रीढ़ थे और आज इनकी जिम्मेदारियां उठाने में अर्थव्यवस्था की पीठ पर बोझ बढ़ने लगा. कल तक ये मजदूर लोहे की फैक्टरियों की जीवन रेखा थे, आज लोहे जैसे सिस्टम के लिए ये बोझ बन गए हैं.

रेलवे की अच्छी लेकिन नाकाफी कोशिश

रेलवे का कहना है कि 15 मई की रात तक 1,074 श्रमिक स्पेशल ट्रेनें चलाई जा चुकी हैं. इन ट्रेनों के जरिये 14 लाख से ज्यादा मजदूर अपने-अपने घरों तक पहुंच चुके हैं. सुनने में तो यह संख्या काफी बड़ी लगती है. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह संख्या काफी है? सबको पता है कि देश के अलग-अलग शहरों में प्रवासी मजदूरों की संख्या इससे कहीं बहुत ज्यादा है. लॉकडाउन के दो महीने पूरे होने जा रहे हैं. इन गरीब मजदूरों की जिंदगी रोज कमाने और खाने पर ही टिकी है? इंतजाम में देरी भी हुई और सरकारी कोशिशों में कमी भी रही. इसके लिए किसी जांच की जरूरत नहीं है. सड़क पर पैदल चलती दिख रही मजदूरों की भीड़ इसका सीधा प्रमाण है.

इन मजदूरों ने भी बदली है भारत की तस्वीर

आज दुनिया में हर कोई भारत की बदली हुई तस्वीर की तारीफ कर रहा है. भारत की सच में तस्वीर बदली भी है. लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि इस बदली हुई तस्वीर के पीछे इन मजदूरों का भी हाथ है. खेतों से लेकर फैक्टरियों तक, फसल उगाने और माल बनाने से लेकर उन्हें मंजिल तक पहुंचाने और बेचने तक, हर पायदान पर अर्थव्यवस्था का पहिया इन्हीं से घूमता है. कई दमदार उपायों के साथ सस्ते श्रम (Labour) की अपनी USP बताकर भी हम विदेशी निवेशकों को अपनी तरफ खींचते हैं. लेकिन उसी सस्ते श्रम की जान आज बेहद सस्ती हो गई है.

जान की कद्र नहीं…हक की फिक्र नहीं

यूपी के औरैया में 26 मजदूर सड़क हादसे में मारे गए. ये सब अपने घरों को जा रहे थे. इसमें सिस्टम की गलतियां साफ-साफ नजर आईं. इस पर कार्रवाई भी की गई, लेकिन इसी के साथ एक और बेहद भयानक तस्वीर देखने को मिली. हादसे में बच गए झारखंड और पश्चिम बंगाल के मजदूरों को उसी ट्रक में लादकर भेज दिया गया, जिसमें मजदूरों की लाशें रखी गई थीं.

ललितपुर से मध्य प्रदेश के सागर की मंडी में लाया गया 1,000 बोरी गेहूं रंगे हाथों पकड़ा गया. यहां सवाल यह उठता है कि वे कौन लोग हैं, जो इतने संवेदनहीन (Insensitive) हैं कि भूखे लोगों के हिस्से का अनाज भी खा जा रहे हैं?

सोच पर पड़ी गर्द को कौन हटाए

दरअसल, सवाल एक अजीब किस्म की मानसिकता का है. दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में मजदूरों के लिए ठहरने का इंतजाम किया गया. स्कूल के मैदान में उनके लिए खूब सारे टेंट भी लगा दिए गए. लेकिन वहीं टेंट के नीचे अधिकारियों की गाड़ियां लगा दी गईं और बड़ी संख्या में गरीब मजदूर चिलचिलाती धूप में बैठे रहे. उनके बच्चे गर्मी से बिलखते रहे.

कुछ ही दिनों में लॉकडाउन के 2 महीने पूरे होने वाले हैं. मजदूरों को लेकर राज्य सरकारों की न नीति साफ दिखाई देती है और न ही नीयत. वोट मांगते समय जो मजदूर ‘अपने’ थे, अब वे ‘पराये’ हो गए हैं. अब वे ही मजदूर ‘मेरे’ नहीं ‘तेरे’ हो गए हैं.

स्वार्थ का ये रिश्ता बहुत तकलीफदेह है

महानगरों और देश के बड़े शहरों में करीब 8 करोड़ मजदूर हैं. जब इनके पसीने बहते हैं तब पूरी अर्थव्यवस्था का पहिया घूमता है. पैदल घर लौटते मजदूरों को देख पूंजीवादी व्यवस्था को डर सता रहा है, लेकिन मजदूरों की ट्रजेडी पर नहीं, बल्कि  उनके फिर से शहरों में न लौटने की हालत में होने वाले भयानक नुकसान की आशंका में. क्योंकि घर लौटते मजदूर वापस न आने की कसमें खा रहे हैं. डर है कि अगर वे नहीं लौटे, तो दिल्ली-मुंबई जैसे महानगर तो बिल्कुल ठप ही पड़ जाएंगे.

विपक्षियों को मजदूरों के आंसुओं में भी दिखते हैं राजनीति के मौके

ये स्वार्थ का रिश्ता है. स्वार्थ के इसी रिश्ते का नतीजा है कि विपक्षी पार्टियों को इन मजदूरों की त्रासदी और उनके आसुओं में भी राजनीति का मौका नजर आता है. तो कुछ सत्ताधारी पार्टियों को ये एक ऐसी जिम्मेदारी नजर आते हैं, जिसे निभाने की उनकी मजबूरी है. ये स्वार्थ का रिश्ता ही है कि कल तक ये फैक्टरियों के मालिकों के लिए सबसे बड़ी जरूरत थे, लेकिन आज ऐसी गैरजरूरी भीड़, जो उनकी आखों को भी चुभती हैं और जेब को भी.

याद रहे…कल भी इनकी जरूरत पड़ेगी

कहा जा रहा है कि बड़ी संख्या में कंपनियां चीन (China) को छोड़ेंगी. अनुमान है कि इनमें से सबसे ज्यादा कंपनियां भारत आएंगी. याद रहे तब यही नंगे पांव और भूखे पेट वाले ‘अर्थव्यवस्था के भाग्य विधाता’ फिर याद आएंगे. इनके जेहन में इतनी कड़वी यादें मत डालिए कि वापसी की उम्मीद ही खत्म हो जाए. प्रधानमंत्री की अगुवाई में भारत की कोरोना से लड़ाई की दुनिया भर में तारीफ़ हुई है. इसके बाद केंद्र के साथ जिम्मेदारी तमाम राज्य सरकारों पर है कि हम मजदूरों की तकलीफों को नजरअंदाज कर अपनी छवि खराब न होने दें.

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