राजीव गांधी के पास देश के लिए नए इरादे थे, 80 के दशक में 21वीं सदी के भारत का सपना देखा था

भारत में टेलीकॉम और कंप्यूटर क्रांति के बीज भी राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) के नेतृत्व में बोए गए. वरना इससे पहले तो टेलीफोन और कंप्यूटर अमीरों के इस्तेमाल की चीज़ें मानी जाती थीं.
Rajiv Gandhi 76th birth anniversary, राजीव गांधी के पास देश के लिए नए इरादे थे, 80 के दशक में 21वीं सदी के भारत का सपना देखा था

राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे. उनकी शख्सियत के लगभग सभी पहलू लोगों का ध्यान खींचते थे. उनके बोलने का अंदाज़ निराला था. वह एक ज़िम्मेदार और समर्पित प्रधानमंत्री थे. वह भारत को दुनिया में एक प्रभावशाली भूमिका में देखना चाहते थे. 80 के दशक में ही उन्होंने 21वीं सदी के भारत का सपना देखा था.

हालांकि भारत एक जनतंत्र है लेकिन उनको प्रधानमंत्री पद विरासत में मिला था, और यह कहने में मुझे कोई झिझक नहीं है कि उन्होंने इस ज़िम्मेदारी के साथ पूरा न्याय किया. भले ही राजनीति के डगर पर चलते हुए उनके सबसे करीबी दोस्त, संबंधी और विश्वासपात्र लोग उन्हें छोड़ कर चलते बने.

1982 में दिख गयी थी प्रतिभा

एक प्रशासक के रूप में उनकी प्रतिभा तभी दिख गयी थी जब 1982 के एशियाई खेलों के आयोजन में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. अगर 1983 में उनके छोटे भाई संजय गांधी (Sanjay Gandhi) की मौत एक प्लेन क्रैश में नहीं हुई होती तो शायद भारतीय राजनीति को राजीव गांधी जैसा नेता नहीं मिलता क्योंकि संजय ही नेहरू-गांधी परिवार की विरासत संभालने के लिए उनकी माँ इंदिरा गांधी (Indra Gandhi) की पहली पसंद थे.

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File Pic-Rajiv Gandhi

1984 में बड़ी भूमिका निभाई 

1984 के लोकसभा चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस (Congress) को 400 से ज़्यादा सीटों का ऐसा बहुमत मिला कि दुनिया ने दांतों तले उंगली दबा ली. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के आघात से उबरने में इस जनमत ने बड़ी भूमिका निभाई और केंद्र में जो सरकार बनी उससे बड़ी उम्मीद थी.

देश को एक युवा प्रधानमंत्री मिला था, उसके पास देश के लिए नए इरादे, नए सपने थे. सच में राजीव सरकार के कार्यकाल में बहुत कुछ हुआ जो भविष्य को प्रभावित करने वाला था. पीछे मुड़कर देखें तो महसूस होता है कि राजीव गांधी बहुत कुछ करना चाहते थे और तेज़ी से करना चाहते थे ताकि नई रवायतें कायम हों..

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एंटी डिफेक्शन कानून लेकर आए

अपने टर्म के पहले साल में ही 1985 में सरकार एंटी डिफेक्शन कानून लेकर आयी, क्योंकि राजीव गांधी चाहते थे कि देश की राजनीति स्वच्छ हो और चुने हुए विधायकों को तोड़कर, उन्हें प्रलोभन देकर सरकारें न बनाईं जाएं. यह सच है कि इतिहास की कसौटी पर यह कानून कमज़ोर साबित हुआ है, लेकिन जब यह बना था तब इसकी बहुत तारीफ हुई थी.

वोटरों में समर्थन के लिए संतुलन कायम करने की कोशिश

1986 में पहले शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) के फैसले के उलट कानून बनाकर और फिर राम मंदिर (Ram Mandir) परिसर का ताला खुलवाने की घटनाएं यह साबित करती हैं कि राजीव सरकार हिन्दू और मुसलमान वोटरों में समर्थन के लिए संतुलन कायम करने की कोशिश कर रही थी.

सरकार अपने मंशे में तो असफल रही ही, उल्टे बीजेपी को भारतीय राजनीति में प्रासंगिक होने का अवसर दे दिया. तब लाल कृष्ण आडवाणी (Lal Krishna Advani) का रथ जो अयोध्या के लिए चला था, वह वहां तो नहीं पहुंचा लेकिन उससे भी आगे निकल कर दिल्ली पहुंच बीजेपी के हाथों देश की बागडोर थमा गया.

जब जवाहर नवोदय विद्यालयों की शुरुआत हुई

1986 में ही राष्ट्रीय शिक्षा नीति (National education policy) को संसद में मंज़ूरी मिली, जो देश में उच्च शिक्षा के नवीकरण और व्यापक प्रसार पर लक्षित थी. जवाहर नवोदय विद्यालयों की शुरुआत तभी हुई थी.

भारत में टेलीकॉम और कंप्यूटर क्रांति के बीज भी राजीव गांधी के नेतृत्व में बोए गए. वरना इससे पहले तो टेलीफोन और कंप्यूटर अमीरों के इस्तेमाल के चीज़ें माने जाते थे.

देश की जनता को पीने केलिए स्वच्छ जल मिले और देश की नदियों में निर्मल जल बहे, इस विषय में भी राजीव सरकार की पहल की सराहना की जानी चाहिए.

Rajiv Gandhi 76th birth anniversary, राजीव गांधी के पास देश के लिए नए इरादे थे, 80 के दशक में 21वीं सदी के भारत का सपना देखा था
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उनकी सबसे बड़ी विफलता

राजीव गांधी देश में माई-बाप सरकार के लाइसेंस राज को ख़त्म करना और आर्थिक सुधारों की शुरुआत भी चाहते थे, लेकिन समाजवाद की दुहाई देने वाले कांग्रेसी नेताओं से पार नहीं पा सके. यह शायद उनकी सबसे बड़ी विफलता थी क्योंकि उनके पास संसद में विशाल बहुमत था.

आंतरिक मुद्दों पर शांतिपूर्ण हल

राजीव सरकार के समय में ही उनकी अपनी देख रेख में पंजाब से आतंकवाद के खात्मे के बाद शांति स्थापित हुई, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश को राज्यों का दर्जा मिला और असम आंदोलन का शांतिपूर्ण हल निकाला गया.

विदेश नीति भी प्रभावशाली

भारतीय विदेश नीति को ज़्यादा प्रभावशाली बनाने में भी राजीव गांधी की भूमिका रही. रूस के साथ तो भारत के संबंध मधुर थे ही. उन्होंने जून 1985 में अपनी अमरीका यात्रा में राष्ट्रपति रोनल्ड रेगन और अमेरिकी नागरिकों, दोनों का दिल जीत लिया.

व्हाइट हाउस में रेगन और राजीव की प्रेस कांफ्रेंस में भारतीय प्रधानमंत्री ने अमेरिकी प्रेस के सवालों के जवाब इतनी सहजता से दिए कि सभी प्रभावित हो गए. उनके वन लाइनर्स इतने अच्छे थे कि राष्ट्रपति रेगन जिन्हें Soundbites का बादशाह मना जाता था, वह भी ठहाके लगाए बिना न रह सके.

Rajiv Gandhi 76th birth anniversary, राजीव गांधी के पास देश के लिए नए इरादे थे, 80 के दशक में 21वीं सदी के भारत का सपना देखा था
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हिंद महासागर क्षेत्र में भी राजीव गांधी के कार्यकाल में भारत की भूमिका प्रभावशाली दिखी. 1986 में सीशेल्स में और 1988 में मालदीव में चुनी हुई सरकारों के खिलाफ तख्ता पलट की कोशिशों को भारत ने सैनिक हस्तक्षेप कर के रोका. 1987 में सियाचिन ग्लेशियर में क़ायद पोस्ट पर फिर से जीत प्राप्त कर भारतीय तिरंगा राजीव गांधी के समय में ही फहराया गया.

लेकिन पाकिस्तान (Pakistan) के साथ संबंधों में कोई सुधार नहीं दिखा. राजीव गांधी बातचीत के लिए दिसंबर 1988 में इस्लामाबाद गए भी, पर नतीजा सिफ़र ही रहा. हालांकि उस समय उनकी और प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की केमिस्ट्री के बड़े चर्चे थे.

 कांग्रेस जब 1989 बोफोर्स स्कैंडल के प्रभाव में आई

राजीव गांधी लोकतंत्र की गरिमा का सम्मान करने वाले नेता थे. 1989 बोफोर्स स्कैंडल के प्रभाव में कांग्रेस को लोक सभा चुनाव में भारी नुकसान हुआ. फिर भी 197 सीटें लेकर पार्टी सदन में सबसे बड़ी थी.

राजीव चाहते तो सरकार बनाने का दावा कर सकते थे, लेकिन उन्होंने यह कह कर ऐसा नहीं किया कि वोटर का मेंडेट सरकार के खिलाफ है. जनता के फैसले का सम्मान करने के लिए उन्होंने कांग्रेस पार्टी में यह नीति भी बनाई थी कि अगर कोई नेता लोकसभा चुनाव हार जाता है तो उसे बैकडोर से राज्यसभा में मनोनीत नहीं किया जाएगा.

अगर आज की कांग्रेस को देखें तो साफ़ दिखता है कि पार्टी राजीव गांधी के आदर्शों से कब का किनारा कर चुकी है. राजीव गांधी अगर ज़िंदा होते तो अब अपने जीवन के 77वें साल में प्रवेश करते. एक बड़ा नेता होने के साथ साथ वह एक अच्छे व्यक्ति भी थे, भारत की प्रगति में योगदान के लिए इतिहास के पन्नों में वह हमेशा ज़िंदा रहेंगे.

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