राजस्थान की सियासत: ना निकम्मा, ना गद्दार…ये 3 तो मजबूरी के यार !

पायलट (Pilot) की वापसी से फौरी तौर पर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) की सरकार सुरक्षित हो गई है. राजनीति के जादूगर होने की उनकी छवि और मजबूत हुई है.

कांग्रेस की फ्लाइट मिस करने के 31 दिन बाद सचिन पायलट (Sachin Pilot) वापस उसी कांग्रेसी विमान में बोर्ड कर गए हैं. गहलोत सरकार (Gehlot Government) के ऊपर मंडरा रहा संकट खत्म हो गया. तो क्या गहलोत जीत गए? शायद नहीं. कांग्रेस का एक होनहार नेता पार्टी से फिसलते-फिसलते वापस टिक गया. तो क्या कांग्रेस जीत गई? शायद नहीं. सीधे-सीधे आलाकमान के आदेशों की ना-फरमानी के बाद भी सचिन पायलट को घर वापसी की इजाजत मिल गई. तो क्या सचिन पायलट जीत गए? शायद नहीं. सच तो ये है कि तीनों हार गए. और तीन हारे हुए ‘योद्धाओं’ ने मजबूरन साथ हो लेने का फैसला किया है.

गद्दार…निकम्मा…फिर भी समझौता !

पायलट की वापसी से फौरी तौर पर अशोक गहलोत (Ashok Gehlot) की सरकार सुरक्षित हो गई है. राजनीति के जादूगर होने की उनकी छवि और मजबूत हुई है. महीने भर से बहुमत जुटाने के लिए बेचैन गहलोत ने सचिन पायलट (Sachin Pilot) की वापसी से अपना पुराना और पूरा बहुमत हासिल कर लिया है, लेकिन गहलोत के हिस्से में आया पायलट समर्थकों का ये समर्थन अब उधार का होगा. एक ऐसा उधार, जिसकी ब्याज समेत अदायगी भविष्य में गहलोत को करनी पड़ सकती है. यहां से आगे आशंका में जीने की यही मजबूरी अशोक गहलोत के लिए एक तरह की हार ही है.
गहलोत और पायलट (Gehlot and Pilot) के बीच जो कड़वाहट बढ़ी, वह राजस्थान के सीएम के लिए सबसे बड़ी चुनौती होने वाली है. गहलोत ने सचिन पायलट को गद्दार कहा, नाकारा कहा. कांग्रेस के खिलाफ काम करने का आरोप लगाया. बीजेपी से मिले होने का लांछन मढ़ा. ये सब ऐसे आरोप हैं, जिन्हें सचिन पायलट (Sachin Pilot) शायद ही भूलना चाहेंगे. कांग्रेस में लौट आने के बाद उन्होंने गहलोत से मिले इस दर्द को जाहिर भी किया.

पायलट की वापसी गहलोत के लिए खतरा

42 साल के ‘जख्मी’ युवा पायलट का वापस कांग्रेस में आना करीब 70 साल के गहलोत के भविष्य के लिए खतरे की घंटी जरूर है. गहलोत की परेशानी उनके खुद तक सीमित नहीं रहने वाली. पायलट की वापसी का असर उनके बेटे वैभव गहलोत के भविष्य की राजनीति को भी प्रभावित करेगी. भला कैसे भूल सकते हैं कि दोनों के बीच गंभीर मनमुटाव की एक वजह गहलोत के सुपुत्र की लोकसभा चुनाव में हार भी थी. सीनियर गहलोत अपने बेटे की हार से इतने झल्ला गए थे कि उन्होंने न सिर्फ सचिन पायलट के लिए मन में अपनी गांठ और गहरी कर ली, बल्कि खुलेआम उन पर वैभव की हार का ठीकरा फोड़ा.

मजबूर और कमजोर कांग्रेस के ‘पायलट’

पायलट की वापसी से राहुल का पार्टी पर नियंत्रण फिर से बनता हुआ दिखा. इस बात की संभावना भी बढ़ी कि राहुल फिर से पार्टी अध्यक्ष हो सकते हैं. संयोग से पार्टी में राहुल (Rahul) की ना सुनी जाने की बात सबसे पहले तभी आई थी, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया की जगह कमलनाथ सीएम बन गए. सचिन पायलट (Sachin Pilot) की जगह गहलोत बाजी मार ले गए थे. संयोग देखिए, अब उन्हीं सचिन पायलट पर लिए गए फैसले की वजह से राहुल फिर से कांग्रेस का नेतृत्व करते दिख रहे हैं. हां यह जरूर है कि इसी बीच कांग्रेस ने अपनी निष्क्रियता और फैसले ना लेने की काहिली की वजह से सिंधिया जैसे नेता को खो दिया, लेकिन कांग्रेस सिर्फ मध्य प्रदेश में ही नहीं हारी, उसकी हार राजस्थान में भी हुई. जिन सचिन पायलट ने आलाकमान के हर आदेश की नाफरमानी की, आंखें दिखाईं, पार्टी तोड़ने की कोशिश की, उन्हीं पायलट को सोनिया, राहुल और प्रियंका तीनों ने बाकायदा समय दिया. उनकी शिकायतें सुनीं और पार्टी में बने रहने का मौका दिया.
संभवत: उनकी कुछ मांगों को मानने का भरोसा भी दिया गया हो. इन सबसे ये जाहिर हुआ कि कांग्रेस कितनी मजबूर और कमजोर हो चुकी है. पूरे एपिसोड में एक हारी और थकी हुई कांग्रेस दिखी.

सर्जिकल स्ट्राइक में नाकाम पायलट की घर वापसी !

31 दिन पहले सचिन पायलट बागी हो गए. गहलोत के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. डिप्टी सीएम की अपनी कुर्सी दांव पर लगा दी. मंत्री पद जाने की परवाह नहीं की. सबकुछ बड़ी ठसक के साथ किया. काफी हद तक अपने लिए सहानुभूति भी जुटाने की कोशिश की. पायलट समर्थक बार-बार याद दिलाते रहे कि सीएम बनना तो पायलट को ही था, गहलोत ने उनका हक मार लिया. बीजेपी भी सचिन के पीछे खड़ी दिखी. सबकुछ इस उम्मीद में हुआ कि गहलोत की सरकार गिर जाएगी. पायलट का बदला पूरा हो जाएगा. और जोड़-तोड़ के बाद जो व्यवस्था बनेगी, उसमें पायलट के साथ उनके समर्थकों को उम्मीद के मुताबिक इज्जत और ओहदा मिल जाएगा. मगर न नौ मन तेल हुआ न राधा नाची. गहलोत की सरकार गिरती हुई नजर नहीं आई. बीजेपी की शुरुआती गर्मजोशी धीरे-धीरे ठंडी पड़ती गई. जो जंग गहलोत बनाम पायलट की शक्ल में शुरू हुई थी, वह गहलोत बनाम बीएसपी और गहलोत बनाम बीजेपी में बदलती दिखी.
पायलट का विरोध धीरे-धीरे प्रभावहीन होने लगा और फिर तब औचित्यहीन लगने लगा, जब गहलोत (Gehlot) बहुमत जुटाने में कामयाब होते दिखे. अब तक पायलट को समझ में आ गया था कि बैक गियर मारने में ही भलाई है. लेकिन 31 दिन बाद 11 अगस्त को जिन सचिन पायलट के कांग्रेस में बने रहने की सहमति बनी, वह पहले की तरह प्रखर नहीं नजर आए. बहरहाल, एक मजबूर और गहलोत पर सर्जिकल स्ट्राइक में नाकाम पायलट का कांग्रेस में स्वागत है.

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