व्यंग्य: ‘राजनीतिक व्यवसाय’ के देसी घराने…लाभ-हानि के अपने-अपने पैमाने !

भारतीय राजनीति के व्यवसाय में निवेश करते हुए (वोट डालते हुए) इससे जुड़े जोखिमों को ध्यानपूर्वक समझ लें. निवेश का लॉक-इन पीरियड 5 साल का है. कोई जरूरी नहीं है कि राजनीतिक कंपनियां ‘रिटर्न’ के जो वादे कर रही हैं, वो सही हो.
Satire on political business, व्यंग्य: ‘राजनीतिक व्यवसाय’ के देसी घराने…लाभ-हानि के अपने-अपने पैमाने !

लंदन से 16 साल बाद लौटा आर्थिक मामलों का विशेषज्ञ दोस्त घर पर आया. बेहद हताश और निराश था. कहने लगा- भारतीय राजनीति में कुछ नहीं बचा है. विशुद्ध व्यवसाय बन गया है. सेवा से इन्हें कुछ लेना-देना ही नहीं है. चाहे कोई भी पार्टी हो. मैंने कहा- इसमें रोनी सूरत बनाने की कौन-सी बात है? नया क्या है इसमें? दोस्त के विचलित मन पर मेरे इन मामूली वाक्यों का कोई असर नहीं हुआ. मुझे एक तरकीब सूझी. मैंने अपने दोस्त के ही एक शब्द को पकड़ा. ये शब्द था ‘व्यवसाय’. यानी धंधा. पहले मैंने उसे भारतीय राजनीतिक व्यवसाय के लाभ-हानि और जोखिमों को डिस्क्लेमर के जरिए समझाया.

डिस्क्लेमर: भारतीय राजनीति के व्यवसाय में निवेश करते हुए (वोट डालते हुए) इससे जुड़े जोखिमों को ध्यानपूर्वक समझ लें. निवेश का लॉक-इन पीरियड 5 साल का है. कोई जरूरी नहीं है कि राजनीतिक कंपनियां ‘रिटर्न’ के जो वादे कर रही हैं, वो सही हो. आपके निवेश (वोट) पर रिटर्न (आपसे किए वादों की पूर्ति) बाजार की स्थिति (तात्कालिक मुद्दों और सरकार की वित्तीय स्थिति) पर निर्भर है. 5 साल से पहले अगर कंपनी कोई बड़े नीतिगत बदलाव करती है, तो आपका पूरा निवेश (वोट की शक्ल में पार्टी में जताया गया भरोसा) डूब भी सकता है. जैसे कि महाराष्ट्र में शिवसेना के वोटरों का और बिहार में जेडीयू के वोटरों का निवेश डूब गया.

राजनीति के धंधे में कौन कहां?

अब उसे उसी की शब्दावली में अलग-अलग पार्टियों की स्थिति समझाने की चुनौती थी. मैंने शुरुआत कांग्रेस से की. फिर कुछ और पार्टियों की बात की. सिलसिलेवार बताना शुरू किया कि राजनीति के व्यवसाय में कौन कहां खड़ा है और जो जहां है, उसकी वजह क्या है? और क्यों हमें भारतीय राजनीति की इस अभिनव अवस्था को खुले दिल से कबूल कर लेना चाहिए? बतौर वोटर हमें कैसे इनमें निवेश करना चाहिए? और अपने निवेश पर लाभ की कितनी उम्मीद करनी चाहिए?

कांग्रेस के कारोबार में घाटा क्यों?

कांग्रेस की स्थिति एक ऐसे औद्योगिक घराने की है, जो आज भी अतीत की समृद्धि में खोया है. न उद्योग में लगे अपने कल-पूर्जे बदले और न ही (विचारों का) नया निवेश किया. कारोबार में घाटे पर घाटा होता गया. दूसरे व्यवसायी कांग्रेस के बाजार को हथियाते गए. जब सबकुछ लुट गया, तो भी ये ग्रैंड ओल्ड घराना मानने के लिए तैयार नहीं है कि विरासत के वारिस के पास जरूरी दूरदृष्टि और उद्यमशीलता की कमी है.

बीजेपी के घराने का बेपनाह विस्तार कैसे?

इस घराने को चलाने वाले दशकों तक देश की खाक छानते रहे. इस दौरान उन्हें बाजार की जरूरतों का अहसास हुआ. उसे करीब से समझा. ये भी पता चला कि बाजार की डिमांड और प्राथमिकताएं बहुत ही तेज गति से बदलती है. उसी के हिसाब से वादा किया और फिर डिमांड पूरी भी की. तीन तलाक, 370, राम मंदिर और अब बोनस में सीएए यानी हर ‘उपभोक्ता’ के लिए कुछ-न-कुछ. एक ‘प्रॉडक्ट’ आउटडेटेड हुआ भी नहीं कि नया ‘प्रॉडक्ट’ लॉन्च. फिर भला कौन रोक सकता है इस घराने के विस्तार को?

आम आदमी पार्टी के धंधे में उतार-चढ़ाव क्यों?

कुछ ही महीने पहले लोकसभा चुनाव के बाद केजीवाल का राजनीतिक कारोबार दिल्ली में नंबर तीन पर चला गया था. कांग्रेस से भी काफी नीचे. पर अब विधानसभा चुनाव के बाद केजरीवाल ही केजरीवाल. क्यों? 2015 में विधानसभा जीतने के बाद केजरीवाल ने सबसे ज्यादा अपने इगो में निवेश किया. डिविडेंड के रूप में उन्हें ढेर सारे विवाद मिले. और नतीजे में आया चुनावी नुकसान. फिर केजरीवाल ने अचानक धंधे की पूरी रूपरेखा ही बदल दी. पानी-बिजली की सेल लेकर आ गए. खरीदारों की भीड़ लग गई. गल्ला वोट से लबालब हो गया.

क्यों डूबा लालू का राजनीतिक उद्योग?

लालू यादव ने शून्य से शुरू कर धंधा बहुत अच्छा चलाया. कुछ खास ग्राहकों (पिछड़े-यादव-मुस्लिम) के लिए बड़े ही लुभावने ऑफर लेकर आए. बिहार के राजनीतिक कारोबार में डेढ़-दो दशक तक इस घराने का न कोई जोड़ दिखा और न ही तोड़. अचानक घराने के संस्थापक ने ही निवेशकों (वोटरों) के भरोसे की जमा-पूंजी का गबन कर लिया. जेल गए. धंधा बिखर गया. अब घराने का वारिस ‘लालू एंड संस’ (आपके भरोसे वाली वही पुरानी दुकान) का बोर्ड लगाकर बिखरे और बिछड़े ग्राहकों को तलाश रहा है.

पुनरुद्धार की कोशिश में मुलायम घराना

‘मुलायम एंड संस’ का ये घराना भी राजनीति में पुराना है. लेकिन इसके मुखिया से ही बड़ी गलती हो गई. उद्योग में नए जमाने के हिसाब से बदलाव की कभी सोची ही नहीं. शुक्र है विरासत का वारिस लायक निकला और थोड़ी नई सोच का निवेश धंधे में किया. लंबी अवधि में फायदे के लिए चाचा के साथ घराने के बंटवारे का जोखिम भी उठाया. आने वाले वर्षों में इस औद्योगिक घराने के राजनीतिक बाजार में सुधार की गुंजाइश जरूर है.

क्यों बिखरा मायावती का राजनीतिक कारोबार?

राजनीति के व्यवसाय के इस घराने की मालकिन हमेशा से शक्की रहीं. धंधे में किसी पर भरोसा नहीं किया. कारोबार के इस रास्ते पर चलकर जितना माल (सत्ता के साल) कमाना था कमा लिया. लेकिन बदले में भी वही मिला. लोग राजनीति के व्यापार का समझौता करके जुड़ते रहे और हानि की आशंका होते ही अपना निवेश वापस खींचते भी रहे. अब इस राजनीतिक कंपनी में न ज्यादा निवेशक बचे हैं और न ही अपनी खुद इतनी पूंजी (समर्थक/वोटर) दिख रही है, जिससे लगे कि फिर से इनका धंधा फलने-फूलने वाला है.

शिवसेना को नए निवेश साझीदारों से कितना लाभ?

इस राजनीतिक औद्योगिक घराने ने डगमगाते व्यवसाय को संभालने के लिए नए समझौते किए. बिल्कुल अलग तरह से धंधा करने वाले दो दूसरे घरानों के साथ संयुक्त उद्यम लगा लिया. फिलहाल धंधा ठीक ही चल रहा है. लेकिन जब चुनावी वित्त वर्ष (जो कि 5 साल का होता है) के आखिर में बैलेंस सीट (चुनावी नतीजे) आएगा, तो पता चलेगा कि नए व्यावसायिक सहयोगियों से क्या मिला और क्या लुटा? चुनौती अपनी जमा पूंजी (वोटर/समर्थक) बचाए रखने की है, क्योंकि बाजार में स्पेस देखकर एक नए खिलाड़ी (राज ठाकरे) ने एंट्री मार ली है. राज ने खुद को रिनोवेट कर बिल्कुल पहले वाली शिवसेना जैसी ही दुकान खोल ली है. एकदम चकाचक.

मेरे दोस्त की शंकाएं दूर हो चुकी हैं. विरक्ति उसके चेहरे पर साफ दिख रही है. अब वह खुशी-खुशी वापस लंदन जा सकेगा.

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