काशी की प्राणवायु हैं धूप, अगरबत्ती, गांजे, ठहरे पानी की गंध के साथ चिताओं से उठती चिरांध

हर समाज अपने आनंद के कुछ जरिए बनाता है. मणिकर्णिका का समाज मुर्दा फूंक कर आनंद लेता है. शिव काशी के अधिपति देवता हैं. वे महाश्मशान में रहते हैं. यहीं खेलते हैं, यहीं रमते हैं. तभी वसंत में पंडित छन्नूलाल मिश्र इसी घाट पर गाते हैं- ‘खेलें मसाने में होरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी. भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी.’
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काश्यां मरणान् मुक्ति…!
दिल्ली पीछे छूट चुकी थी. लेटे-लेटे मैं बनारस के रास्ते में था. आंखे बंद थीं मगर दिल्ली के दृश्य अभी भी पीछा नही छोड़ रहे थे. लोग दिल्ली आने के लिए जान देते हैं. मैं दिल्ली छोड़ रहा हूं. दिल्ली छोड़ने से पहले मैने देखा कि राहुल चौधरी रास्ते के इंतजाम में लगे थे. वे कोई पास लाए थे, जिससे बनारस तक जाने में परेशानी नहीं होगी. वे यह भी बता रहे थे कि रास्ते में मैने स्ट्रिंगरों को भी कह दिया है. ज़िले-ज़िले में वे बंदोबस्त में रहेंगे. मैं तैयारियों में व्यस्त लोगों की चर्चा का आनंद ले ही रहा था कि अचानक योगेश थोड़ा गरम दिखे. वो गुस्से में थे. उसका कहना था कि बनारस कवरेज के लिए एक एंकर को भी भेजना होगा. मैं सतर्क हो गया. सोचा, पूछ लूं कि बनारस में एंकर का क्या काम? लेकिन मैं तो बोल नही सकता था.

पढ़ें, साठ साल के लोगों के लिए ऐसी घरबंदी..! अंतिम इच्छा यही है वरना अश्वत्थामा की तरह भटकूंगा

एक वरिष्ठ सहयोगी ने पूछ ही लिया कि एंकर को बनारस ले जाकर क्या होगा? योगेश ने झुंझलाकर कहा, लाइव कवरेज तो होगा न! घाट से. सहयोगी ने कहा कि रिपोर्टर से काम चल जाएगा. योगेश नाराज़ हुआ, बोला, सारा इंतजाम मैंने किया है. इवेंट मैनेजमेंट कंपनी मैंने हायर की. वीआईपी मैंने लाइन अप किए और अब आप कह रहे हैं कि एंकर नहीं जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो मैं भी नही जाऊंगा. तभी देखा कि एक छोटे कद का आदमी रिवाल्वर खोंसे योगेश को समझा रहा था. यह छोटे कद का आदमी समझदारी की बातें कर रहा था पर उसकी कोई सुन नही रहा था. वह अपने कद से मार खा रहा था. ‘अरे यह तो अपने चचा हैं, शमशेर. चचा सबको मास्क और सैनेटाइजर बांट रहे थे.’

सफेद चादर ओढ़े हुए मैं इन सब बातों को मन ही मन गुनगुना रहा था. दिल्ली से बनारस के रास्ते में लखनऊ है. लखनऊ के मित्र लगातार दबाव बनाए थे कि लखनऊ उनका कर्मक्षेत्र था. उन्हें यहां रोका जाए. पर यह संभव नही था. सरकार ने एक शहर से दूसरे शहर जाने का पास जारी किया है. आप बीच में नही रुक सकते. मगर लखनऊ के साथी सुरेश बहादुर सिंह अड़ गए. बोले कि वे उत्सवधर्मी थे. जब तक यहां रहे, हम उत्सव मनाते रहे. प्रेस क्लब में शोक सभा होगी. उन्होंने ऐलान किया कि शोक सभा दिन में नही शाम को होगी.अवध की शाम सुरमई होती है. साथ में रसरंजन और भोजन भी होगा. यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी.

लखनऊ में पत्रकारों का जलवा होता है. उन्होंने जो चाह लिया, वो हो गया. मेरी अंतिम यात्रा के रास्ते में एक पड़ाव लखनऊ का भी जुड़ गया. शोकसभा आयोजित की गई. पत्रकारों का जमावाड़ा लगा. शोकसभा में कामरेड विक्रम राव भी थे. उन्होंने कहा कि जब तक हेमन्त लखनऊ में था, कोई न कोई उत्पात मचाता रहा. दुखी वीर विक्रम बहादुर मिश्र ने कहा कि भवितव्यता टाली नही जा सकती. आदमी ज़हीन था, पर था बड़ा पाजी. एक दफा मेरे साथ बम्बई गया. जुहू चौपाटी पर मुझे फंसा दिया था. कुछ महिलाओं के साथ उस रोज़ मैं बाल-बाल बचा था. वरना मेरा धर्म-अध्यात्म सब खतरे में था.

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राकेश पांडेय ज्यादा ही रसरंजित हो चुके थे. उनकी स्मृतियों की मंजूषा खुल चुकी थी. अब वह बंद होने का नाम ही नही ले रही थी. जिसका भी हाथ पकड़ लेते, उसे पूरी कहानी सुनाने लगते. वे अब तक कई लोगों को मुझसे जुड़ी कहानियां सुना चुके थे. मैंने कई ऐसे लोगों को देखा जो उनके नजदीक आते ही मोबाइल कान से सटा लेते और फोन पर किसी से बात करने का बहाना करते हुए, वहां से कट लेते. एक आदमी पीछे खड़ा सिसक रहा था. अरे यह तो नरही के दूध वाले सुधीर हैं. वे कह रहे थे, ‘इनके लखनऊ से जाने के बाद मेरी दुकान से पत्रकारों की अड़ी ही उखड़ गई.’ सुभाष मिश्र भावुक दिखे. वे कई पुराने किस्सों का जिक्र कर रहे थे.

तभी नवीन तिवारी आते दिखे. उनके शोक पर लखनऊ की अव्यवस्था हावी थी. वे किसी वकील से शहर में अतिक्रमण और ट्रैफिक जाम पर पीआईएल दाखिल करने की बात कह रहे थे. वहीं तिवारी जी को एक फ्रीडम फाइटर पत्रकार मिले. वे आजादी की लड़ाई में जेल गए थे. पर किस जुर्म में बताते नही हैं. वे नवीन जी के कान में फूंकने लगे, बड़ा बदमाश आदमी था. सबके कपड़े उतारता था. आपके भी उतारा. पर आपने जवाब नही दिया. वे तिवारी जी को उकसाते रहे. तिवारी जी उनसे पिंड छुड़ाते रहे. देर रात तक लखनऊ की शोक सभा चलती रही. सभा के आखिर में मार होते-होते बची. मालूम पड़ा कि रसरंजन का स्टाक समय से पहले खत्म हो गया था. कुछ लोग तय हिस्से से ज्यादा गटक गए थे. वंचित वर्ग ने रूस की 1917 की साम्यवादी क्रांति की शक्ल में बगावत कर दी थी.

खैर, लखनऊ से विदाई हुई. मैं तड़के सुबह बनारस पहुंच चुका था. बनारस में लोग दुःखी शोकाकुल तो थे, पर बनारसी मिजाज के अनुसार वे मजे भी ले रहे थे. मैं लेटे-लेटे लगातार यही हिसाब लगा रहा था कि कौन-कौन आया और कौन नहीं आया. कौन रीथ लाया, कौन बिना माला फूल के आया. तभी यकायक बाराबंकी वाले पुराने समाजवादी शर्माजी दिखे. वे किसी को कुछ नहीं समझते. बड़े मुंहफट हैं, कहने लगे, अरे यह तो बड़ा बुरा हुआ. ये उम्र उनके जाने की नहीं थी. दुःखी शर्माजी पुरानी यादों में खो गए. तभी उनसे किसी ने पूछ लिया. “शर्माजी, आजकल किस पार्टी में हैं?” शर्माजी बोले, “जहां मेरे नेता हैं, वहीं मेरी पार्टी.” जब वे पार्टी बदलते हैं, तो मेरी पार्टी खुद-ब-खुद बदल जाती है.

एक किस्सा सुन लीजिए. बात साफ हो जाएगी. मेरे गांव में एक बेहना (जुलाहा) था. पिता की मौत के बाद उसकी मां ने दूसरी शादी दरजी से रचाई. किसी ने उस लड़के से पूछा, तुम्हारी जात क्या है? लड़का बोला—‘पहले रहे बेहना, अब हैं दरजी, आगे अम्मा की मरजी.’ शर्माजी बोले, ‘तो हमारी अम्मा हमारे नेता हैं. वे जहां-जहां जाएंगे, वहीं अपनी पार्टी होगी. खैर छोड़िए, आपने भी ऐसी वाहियात बात गमी के मौके पर छेड़ दी.’ शर्माजी समाजवादियों की उस परंपरा में हैं. जो हर वक्त झगड़े के लिए तैयार रहते हैं. एक बार वे ट्रेन से कहीं जा रहे थे. सामने वाले यात्री से उन्होंने पूछा, ‘कितने भाई हो?’ जबाव में उसने कहा, ‘दो’. शर्माजी तपाक से बोले, ‘तीन ही होते तो क्या कर लेते?’ अब आप समझ गए होंगे उनकी तासीर.

सुबह बनारस के घर से शवयात्रा में चलने के लिए जितने लोग जमा थे. उनमें ज्यादातर वे लोग थे, जिनकी मुझे उम्मीद नहीं थी. बचपन के दोस्त गुप्ताजी दिखे. गुप्ताजी तेल और इत्र बेचते हैं. बोले, ‘मैंने सुबह अखबार में इनके न रहने की खबर पढ़ी.’ वे किसी से कह रहे थे, ‘मैं तो शवयात्रा में सिर्फ थोड़ी दूर तक ही जाऊंगा. मुझे देर हो रही है, क्योंकि दुकान खोलना है. हेमंत हमारे स्कूल के साथी थे. सरकारी नौकरी नाहि मिलल त पत्रकार हो गइलन. दिल्ली में कौउनो अखबारै में नौकरी करत रहलन. अगर अखबारै में नौकरी करे के रहल. त बनारस में गांडीव में करतन/त हमऊ लोग पढ़ित.”

तेजी से दौड़ते-हांफते कौशल गुरु दिखे. वे फेसबुक वारियर हैं. बीएचयू के प्रोफेसर. अपना काम छोड़ बाकी सब करते हैं. अस्सी के डीह हैं, बवासीर की दवा से लेकर फ्रांस की क्रांति तक, तुलसीदास की भक्ति से लेकर नासा के नए अभियान तक, गंगा से लेकर हॉब्स, लॉक और रूसो तक, सब पर समान अधिकार से भाषण देते हैं. कहने लगे, मुझे तो अभी अस्सी पर पता चला. पप्पू की दुकान पर शोक सभा करके आ रहा हूं. बनारस में अस्सी पर पप्पू की चाय की एक ऐतिहासिक दुकान है. जहां दिल्ली के कॉफी हाउस से बेहतर बहस होती है. इस दुकान की विशेषता है कि अगर दक्षिण अफ्रीका में भी कोई कवि मर जाए तो भी यहं शोकसभा हो जाती है. प्रोफेसर मेरे मित्र हैं. मनुष्य एक बार जब प्रोफेसर हो जाता है, तो वह जीवन भर प्रोफेसर ही रहता है. बाद में चाहे वह समझदारी की कितनी ही बात क्यों न करने लगे!

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हम मर्णिकर्णिका घाट पहुंच चुके थे. कहते हैं कि भगवान शिव यहीं पार्वती के साथ भ्रमण पर निकले थे और पार्वती के कान की मणि यहीं कहीं गिर गयी सो नाम पड़ा मणिकर्णिका. इसी मणिकर्णिका पर मुक्ति के लिये शवदाह किया जाता है. यहॉं चिताओं की आग ठंडी नहीं होती. दिन रात जलती चिताएँ मनुष्य को नश्वरता की याद भले दिलाएँ पर मणिकर्णिका पर बिना कुछ भोग चढ़ाए चिता को अग्नि नहीं मिल पाती. बाकी सबकी अपनी अपनी सामर्थ्य. इस मुक्तिधाम में भी सांसारिक माया मोह से किसी को मुक्ति नहीं.

हर समाज अपने आनंद के कुछ जरिए बनाता है. मणिकर्णिका का समाज मुर्दा फूंक कर आनंद लेता है. शिव काशी के अधिपति देवता हैं. वे महाश्मशान में रहते हैं. यहीं खेलते हैं, यहीं रमते हैं. तभी वसंत में पंडित छन्नूलाल मिश्र इसी घाट पर गाते हैं- ‘खेलें मसाने में होरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी. भूत पिशाच बटोरी दिगंबर, खेलें मसाने में होरी.’

धूप, अगरबत्ती, गांजे और ठहरे पानी की गंध के साथ चिताओं से उठती चिरांध से युक्त यहां की हवा ही काशी की प्राणवायु है. इस हवा और पानी का अपना समाजवाद है. यहां क्रिया-कर्म संपन्न कराने के काम में किसी भी रूप में जुड़े तमाम लोग एक साथ बैठते हैं. खाते-पीते हैं, गप्प करते हैं, अड़ी लगाते हैं. यहां ‘डोम राजा’ की हैसियत इतनी बड़ी है कि उन्होंने राजा हरिश्चंद्र को खरीद कर अपने यहं नौकर रखा था. मुक्ति की इस धुरी पर चौबीस घंटे जलती लाशों के बीच उनकी धूनी देख कर लगता है कि समय ठहर गया है. इसी धर्मध्वजा के नीचे मदिरा से आकंठमग्न वे मुर्दों को फूंकने के लिए आग देते हैं.

श्मशान घाट का इंतजाम मेरे मित्र अशोक पांडेय के हवाले था. पांडेयजी उन समाजवादियों में हैं, जिनका राष्ट्रवाद जीवन के उत्तरार्ध में जागा. पांडेयजी समाजवादी नेताओं की उस नस्ल में हैं जो अब लुप्त हो रही है. वे अपने भाषणों में भी इसका जिक्र भी करते हैं, मसलन “डॉ. लोहिया नहीं रहे, जयप्रकाशजी नहीं रहे, मधुलिमये चले गए. मेरा भी स्वास्थ्य आजकल खराब ही रहता है.”

मेरी चिता लगवाने से लेकर कर्मकांड करवाने तक जिम्मा इन्हीं पांडेयजी का था. उन्हें देखते ही डोम राज अपने चंपुओं पर चिल्लाया—“जल्दी चिता लगाव. पांडेयजी क लाश आ गईल.” पांडेयजी बिफरे, “अबे मूरख लाश हमार नहीं, हमरे दोस्त का हौ.” पांडेयजी और डोम राजा में यह शास्त्रार्थ चल ही रहा था कि कुछ लोगों ने उठाकर मुझे चिता पर लिटा दिया. जो मित्र मेरे साथ तीस से चालीस साल से जुड़े थे, यकायक वे लोग भी मुझे छोड़कर सीढ़ियों पर खड़े हो गए. अलग-अलग समूह में ये सभी देश की चिंता में डूबे थे. किसी की चिंता का बिंदु था कोरोना के बाद देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था का क्या होगा? तो कोई समूह इस बात से परेशान था कि यह वायरस मनुष्य निर्मित है या प्राकृतिक.

इस बीच ‘जे’ गुरु बोले, जितने लोग कोरोना से नही मरे, उससे ज्यादा लॉकडाउन से उपजी भूख से मर जाएंगे. मणिकर्णिका के उस महाश्मशान पर देश दुनिया की चिंताओं की चर्चा छिड़ चुकी थी. मैं चुपचाप लेटा हुआ था. अब मेरे हिस्से सिर्फ सुनना ही रह गया था. लेकिन आंखे पूरी तरह चैतन्य थीं. कभी सुना था कि मर्द की आंख और स्त्री की जुबान का दम सबसे अंत में निकलता है. वह महसूस कर रहा था.

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बदरी कवि ने अपना दुःख दिल से ही लगा लिया था. उन्होंने एक कविता पढ़ी कि मृत्यु रोने का नहीं, मसखरी का विषय है. बदरी हास्य व्यंग्य के कवि हैं. ज़्यादातर कवि श्रोता की तलाश में होते हैं. पर बद्री कविता पढ़ने के लिए एकान्त की तलाश करते है. उनकी कविताओं का सार्वजनिक पाठन नहीं हो सकता. तभी टोपी पहने एक मौलाना दिखे. अरे ये तो हमारे मुहल्ले के बचपन के साथी असलम मियां हैं जो अब मौलाना बन गए हैं. बचपन में हम दोनों हर इतवार चित्रा में अंग्रेज़ी सिनेमा देखने ज़रूर जाते थे. मौलाना पढ़े लिखे नही थे. तो उन फिल्मों का आनन्द वो मूक बधिर फ़िल्मों जैसा ही लेते थे. मौलाना ने मेरे सामने आकर टोपी उतारी और दुआ पढ़ी. अल्लाह जन्नत में आला से आला मुकाम अता और मग़फिरत फरमाये.

गंगा किनारे सूरज ढल रहा था. दिल्ली से आए सुशीलजी बेचैन हो घड़ी देख रहे थे. यह दिव्य लोक में उनके विचरण का टाइम था. वे रिटायर होने वाले हैं. धीरे-धीरे सरकते हुए वे घाट की सबसे पीछे की सीढ़ी पर जाकर बैठ गए. पीछे की पॉकेट से सीसी निकाली और एक ही साँस में गला तर. फिर सिगरेट सुलगाई, उनके मुरझाए चेहरे पर दिव्य चमक आ गई. पहली बार वे भावुक होकर मेरी चिता की तरफ देख बड़बड़ाने लगे—आदमी बड़ा मस्त था. खुद तो शराब छूता नहीं था पर दूसरों को विलायती स्कॉच ही पिलाता था. सीसी का असर दिमाग तक गया तो वे और भावुक हो गए. फूट-फूटकर रोने लगे. उपाध्यायजी ने उन्हें आकर संभाला. कहने लगे—क्या कीजिएगा. प्रभु की यही इच्छा थी. अभी उनके जाने की उम्र थोड़े ही थी! पर हम क्या कर सकते हैं. आइए, चलिए नीचे, टाइम हो रहा है.

उसी वक्त मिसिरजी हड़बड़ाहट में उठे. अरे यार, बड़ा परेशान हो गइली. सुबह से कुछ खाया पीया नहीं, पेट में चूहा कूद रहा है. आवा ऊपर चला, कुछ खा के आयल जाय. सुना है, पास के घाट पर किसी इतावली ने पिज्जा की दुकान खोली है. तभी पीछे से त्रिवेदीजी चिल्लाए, ‘रुको यार, आग तो लग जाने दो.’ मिसिरजी फुसफुसाए—‘देर हो रही है. मिसिरजी का पेट बड़ा पापी है. उसमें कुछ पचता नहीं है. युधिष्ठिर ने स्त्रियों के पेट में बात न पचने का श्राप दिया था. पुरुषों को ऐसा श्राप नहीं था. फिर युधिष्ठिर का श्राप उन्हें कैसे लगा. यह शोध का विषय है.

राय साहब कुछ दुःखी दिखे. बोले—भइया का जुगाड़ बड़ा तगड़ा था. भरोसा था कि कभी जरूरत पड़ी तो वे खड़े मिलेंगे. रायसाहब ने यादवजी से कहा, अभी घंटा भर देरी है. आइए, पान जमा कर आया जाए. तिवारी बोले, यार हमारा बड़ा नुकसान हुआ. दिल्ली लखनऊ के हमारे संपर्क वही थे. सबकी मदद करते थे. तभी दौड़ते-दौड़ते खाली हाथ बचपन के दोस्त शर्माजी नमूदार हुए. इधर-उधर देखा और बगल के मुर्दे से एक माला उठाकर मेरे ऊपर डाल दी. दुःखी स्वर में बोले, “ये तो चले गए, अब हमारा हेडक्वार्टर कोटे से रेलवे का ‘रिजर्वेशन’ कैसे होगा?”

“वह तो ठीक है, अगर इतना गहरा संबंध था तो जेब से खर्चा करके मित्र के लिए एक माला तो लाते”—चौबेजी डपटे. शर्माजी का जवाब था. अरे भाई, वे देखने तो आ नहीं रहे, चाहे कहीं से माला लेकर पहनाएं. शर्माजी ने भेद खोला मैंने एक लड़के से माला मंगवाई थी. पर वह माला की जगह ‘माला डी’ लेता आया. तो क्या करता? मैंने देखा शर्माजी के आते ही वहां मातमी सन्नाटा टूटा था. “आदमी तो ठीक थे पर सबके उंगली करत रहलन”, सावजी बोले. “अरे यार, अच्छा खिलाते-पिलाते और घुमाते थे. पैसा खर्च करते थे मित्रों पर. यह बब्बू राय का चिंतन था. बचपन के दोस्त दाढ़ी वाले बाबू साहब बोले, “आइए, सिगरेट पीकर आते हैं. सबको एक दिन जाना ही है. पर एक बात तो थी कि यह आदमी हर काम ‘कैलकुलेट’ करके करता था. मुझे लगता है इतनी जल्दी मरने के पीछे भी कोई गणित जरूर है.” दाढ़ी खुजलाते बाबू साहब ने कहा.

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तभी एक झाल-मूड़ी बेचने वाला आ गया. सब उस पर टूट पड़े, वह मूड़ी चना बना रहा था. भाई लोग उड़ा रहे थे. यादव जी बोले, मणिकर्णिका की नींबू की चाय बड़ी बेजोड़ होती है. आप सब जरूर पीजिए. मामा सबके चाय के इंतजाम में लगे. मैं आग लगने के इंतजार में था. यकायक राजा साहब का काफिला दिखा, कोई कुछ बोलता, उससे पहले ही वे पिच्च से पान की पीक चिता के पास ही थूककर बोले, “अब देरी क्या है—जल्दी निपटाईए.” किसी ने टोका, “इतनी जल्दी में क्यों हैं राजा साहब. वे बोले, “हमें एक जरूरी रजिस्ट्री के लिए कचहरी जाना है. आज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष पटेल जी भी आने वाले हैं.” यह कहते उन्होंने पास में रखी पानी की बोतल उठा ली. मूड़ी खाने वाले सब लोग अब पानी पर कटे वृक्ष की तरह गिरे.

यह सब चल रहा था, लेकिन सीढ़ी पर कुछ लोग चुपचाप बैठे न किसी की सुन रहे थे, न बोले रहे थे. बेजान और सूनी आंखों से मेरी चिता की ओर देख रहे थे. कौन थे वे लोग! यह मैं नहीं बताऊंगा. तभी भूकंप सा आया. मेरा बिस्तर हिलने लगा.अचानक नींद टूटी. यह तो सुबह का सपना था.

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