Opinion : शिवसेना का नया सेक्‍युलरिज्‍म : कैसे ‘सेक्‍युलर’ से ‘सिकुलर’ हो गई भारतीय राजनीति?

ये वही शिवसेना है जिसके नेता संजय राउत ने 2015 में कहा था कि संविधान की प्रस्‍तावना से 'सेक्‍युलर' शब्‍द को निकाल देना चाहिए.

महाराष्‍ट्र में शिवसेना, कांग्रेस और राष्‍ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) एक साथ आए हैं. कांग्रेस और NCP के लिए ‘कम्‍युनल’ रही शिवसेना अब शायद ‘सेक्‍युलर’ हो गई है. शिवसेना के ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ से जुड़े सवाल पर पार्टी प्रमुख उद्धव ठाकरे कहते हैं, “सेक्युलर का मतलब क्या है? संविधान में जो कुछ लिखा है, वही सेक्युलर है.”

ये वही शिवसेना है जिसके नेता संजय राउत ने 2015 में कहा था कि संविधान की प्रस्‍तावना से ‘सेक्‍युलर’ शब्‍द को निकाल देना चाहिए. अब सरकार बनाने वाली तीनों पार्टियों के कॉमन मिनिमम प्रोग्राम में कहा है कि वे संविधान में बताई गईं ‘सेक्‍युलर वैल्‍यूज’ का मान रखेंगी. ये ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ आखिर क्‍या बला है जिसने भारतीय राजनीति में ध्रुवीकरण की खाई को और चौड़ा किया?

पश्चिम से कैसे अलग भारत का सेक्‍युलरिज्‍म?

पश्चिम में सेक्‍युलर शब्‍द का मतलब मुख्‍य रूप से तीन बातें हैं- धर्म की आजादी, धर्म देखे बिना हर नागरिक को समान नागरिकता, धर्म और राज्‍य का अलगाव. धर्म और राज्‍य को अलग-अलग रखना पश्चिम के कई लोकतंत्रों की व्‍यवस्‍था का हिस्‍सा रहा है.

भारतीय सेक्‍युलरिज्‍म में धर्म और राज्‍य को अलग-अलग नहीं देखा जाता. यहां सेक्‍युलरिज्‍म का अर्थ सभी धर्मों के साथ एकसमान व्‍यवहार से है. भारत में सरकारें, धर्म के मामलों से अलग नहीं हैं. कई राज्‍यों में धार्मिक स्‍कूलों, संस्थाओं को सरकार मदद देती है.

सेक्‍युलरिज्‍म की खासियत

  • धार्मिक नियमों और शिक्षाओं से स्‍वतंत्रता
  • धर्म के मामलों पर राज्‍य की निष्‍पक्षता
  • राज्‍य के लिए सभी धर्म समान
  • सार्वजनिक गतिविधियों और फैसलों, विशेष रूप से राजनीतिक फैसलों को धार्मिक विश्‍वासों और प्रथाओं के प्रभाव से दूर रखना

संविधान क्‍या कहता है?

भारतीय संविधान को दुनिया का सबसे धर्मनिरपेक्ष संविधान माना जाता था मगर निर्माताओं ने इसमें ‘धर्मनिरपेक्षता’ या ‘सेक्‍युलर’ शब्द शामिल नहीं किया था. अनुच्‍छेद 14, 15, 16, 25-28, 44, 325 और 326 के शब्‍दों में विश्‍वास और पूजा की स्‍वतंत्रता की गारंटी दी गई थी. संविधान की प्रस्‍तावना में ‘सामाज‍िक सुरक्षा’ था जिसका मतलब यही समझा गया कि धर्म, वर्ग के आधार पर राज्‍य किसी तरह का भेदभाव नहीं करेगा. मगर यह प्रस्‍तावना 1976 में बदल दी गई.

Secularism Debate in India, Opinion : शिवसेना का नया सेक्‍युलरिज्‍म : कैसे ‘सेक्‍युलर’ से ‘सिकुलर’ हो गई भारतीय राजनीति?
42वें संशोधन से पहले संविधान की प्रस्‍तावना (बाएं) और संशोधन के बाद प्रस्‍तावना (दाएं).

आपातकाल के समय, 42वें संविधान संशोधन के जरिए तत्‍कालीन इंदिरा गांधी सरकार ने भारत को ‘संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य’ की जगह ‘संप्रभु, समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य’ बना दिया. इसी संविधान संशोधन से यह स्‍पष्‍ट कर दिया गया कि भारत गणराज्‍य का कोई धर्म नहीं है. भारत में सेक्‍युलरिज्‍म का मतलब ऐसी सरकार से है जो सभी धार्मिक समूहों के प्रति निष्‍पक्ष हो.

सेक्‍युलरिज्‍म और राजनीति

इंदिरा गांधी के इस कदम का खूब विरोध हुआ. ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ के नाम पर वोट बैंक तैयार करने की शुरुआत हुई.  खास वर्गों को खुश करने के लिए नीतियां बनने लगीं. पर्सनल लॉ के मामले में सरकारों ने मुस्लिमों को विशेष अधिकार दिए. शाह बानो का मामला ऐसा ही था जिसने सेक्‍युलरिज्‍म पर बहस तेज कर दी. पूरे देश में ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड’ की मांग जोर पकड़ रही थी. विचारधाराएं दो धड़ों में बंटने लगीं. राइट विंग और लेफ्ट विंग. बीच में वे दल थे जो किसी तरफ झुकाव जाहिर नहीं करते थे मगर जरूरत पड़ने पर दोनों विचारधाराओं से मिल जाते थे.

शिवसेना, बीजेपी जैसे दलों की नींव पड़ी जो ‘हिंदुत्‍व’ के एजेंडे को मजबूती से रखती थीं. इन दलों ने ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ की तथाकथित परिभाषा को नकार दिया. भाजपा पर भारतीय राजनीति को ‘कम्युनल’ बनाने का आरोप लगा. इसी दौरान उनके नेता, लालकृष्‍ण आडवाणी ने उन लोगों को ‘स्‍यूडो सेक्‍युलर’ कह दिया जो ‘वोट बैंक की राजनीति के लिए सेक्‍युलरिज्‍म का गुणगान’ करते हैं. ‘स्‍यूडो-सेक्‍युलर’ उन दलों को कहा गया जिन्‍होंने अल्‍पसंख्‍यकों को लुभाने के लिए नीतियां बताईं. ये वो दल रहे जो खुद को ‘सेक्‍युलर’ बताते हैं मगर असल में ‘एंटी-हिंदू’ हैं.

Secularism Debate in India, Opinion : शिवसेना का नया सेक्‍युलरिज्‍म : कैसे ‘सेक्‍युलर’ से ‘सिकुलर’ हो गई भारतीय राजनीति?
(सोफे पर बायीं तरफ से) शिवसेना संस्‍थापक बाल ठाकरे, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, वरिष्‍ठ भाजपा नेता लालकृष्‍ण आडवाणी की एक तस्‍वीर.

‘सेक्‍युलरिज्‍म’ से चौड़ी हुई ध्रुवीकरण की खाई?

1984 में सिख विरोधी दंगे हुए. सेक्‍युलरिज्‍म फिर खतरे में पड़ा. शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राजीव गांधी ने संसद में कानून बनाकर पलट दिया. इसके बाद, भारतीय राजनीति कभी पहले जैसी नहीं रही. अयोध्‍या विवाद ने आग में घी का काम किया. हिंदुस्‍तान की राजनीतिक पार्टियां दो धड़ों में बंट चुकी थीं.

एक धड़ा वो था जो बीजेपी की हिंदुत्‍ववादी पॉलिटिक्‍स के साथ खड़ा था. दूसरे धड़े में वे दल थे जो BJP को ‘अछूत’ बताकर ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ के नाम पर एक छत के नीचे आ गए. गठबंधन की सरकारों का दौर भी आ चला था, ऐसे में ‘सेक्‍युलर’ होना या ना होना, साथ आने की अहम योग्‍यता बन गया.

नई सदी में भी ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ हॉट टॉपिक बना रहा है. 2002 में गुजरात के गोधरा और अन्य शहरों में हुए दंगों ने देश में सांप्रदायिक भेदभाव की खाई को और गहरा ही किया. तकनीक के दौर में अल्‍पसंख्‍यकों को लुभाने वाले दलों को ‘सिकुलर’ कहा जाने लगा है. ‘सिकुलर’ शब्‍द सोशल मीडिया की देन है जिसे ‘सेक्‍युलरिज्‍म के बुखार से ग्रस्‍त व्‍यक्ति/पार्टी’ के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है.

क्‍यों भारतीय सेक्‍युलरिज्‍म का होता है विरोध?

भारतीय संविधान की 7वीं अनुसूची में धार्मिक संस्‍थाओं और ट्रस्‍ट्स को समवर्ती सूची में रखा गया है. यानी इस पर केंद्र और राज्‍य, दोनों सरकारें कानून बना सकती हैं. भारतीय सेक्‍युल‍रिज्‍म के समर्थक मानते हैं कि अगर यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बने, यानी जिसमें धर्म देखे बिना सबके लिए एक जैसा कानून हो, तो वह बहुसंख्‍यक हिंदू आदर्शों को थोपेगा.

भारत में धार्मिक आधार पर कानून हैं. मुस्लिम शरिया आधारित मुस्लिम पर्सनल लॉ फॉलो करते हैं तो हिंदुओं, ईसाइयों और सिखों के लिए कॉमन कानून है. मुस्लिमों के कई धार्मिक कानून संसदीय कानूनों से अलग हैं और उन्‍हें सुपरसीड करते हैं. भारतीय सेक्‍युल‍रिज्‍म के विरोधी कहते हैं कि भारत जो शरिया और अन्‍य धार्मिक कानूनों को मानता है, वह ‘कानून की नजर में सब बराबर’ के सिद्धांत का उल्‍लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट ने एसआ बोम्माई बनाम भारतीय गणराज्य (1994) मामले में साफ तौर पर ‘सेक्‍युलरिज्‍म’ को भारतीय संविधान का मूलभूत बनावट का हिस्सा माना था. अदालत ने कहा था कि संसद को इसे कमतर करने का अधिकार नहीं है.

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