Sushant Singh Suicide Case: जिसकी सत्ता, उसका ‘क्वारंटीन’… फिर तो CBI ही बचा रास्ता

जून के पहले ही पखवाड़े में तीन घटनाएं घटती हैं. 8 जून को रिया सुशांत का घर छोड़कर चली जाती है. 9 जून को दिशा सालियान कथित तौर पर खुदकुशी कर लेती है. फिर 14 जून को सुशांत कथित तौर पर सुसाइड कर लेते हैं.
Sushant Singh Rajput death case, Sushant Singh Suicide Case: जिसकी सत्ता, उसका ‘क्वारंटीन’… फिर तो CBI ही बचा रास्ता

सुशांत सिंह राजपूत केस में सीबीआई की एंट्री का स्वागत है. कायदे से ये काम पहले ही हो जाना चाहिए था. सिफारिश बिहार सरकार की ओर से आई है. नीतीश के पास कोई विकल्प भी नहीं बचा था. जांच के लिए गया उनका अफसर क्वारंटीन होम में ‘कैद’ कर दिया गया. जांच के लिए गई बिहार पुलिस को बीच सड़क पर धकियाया गया. मुंबई पुलिस सुशांत के सच पर एकाधिकार का दावा कर बैठी. पूरे केस पर कुंडली मारकर बैठ गई. महाराष्ट्र की सत्ता में बैठे सत्ताधीश सच बाहर लाने की मांग पर फुंफकारते, डराते और नकारते दिखे. फिर तो सीबीआई ही रास्ता है, लेकिन याद रहे ये सिफारिश अभी भी महाराष्ट्र सरकार की ओर से नहीं आई है.

क्या सोचा था विनय तिवारी ने?

पटना के एसपी सिटी विनय तिवारी बिहार से मुंबई पहुंचे. क्रांति करने. सुशांत के परिवार को न्याय दिलाने. शायद ये सोचा होगा कि सुशांत के फैंस शाबाशी देंगे. उद्धव की पुलिस थाल सजाकर स्वागत करेगी. न्याय पसंद लोग तालियां बजाएंगे. जबरन क्वारंटीन कर दिए गए. हाथ पर ठप्पा मार दिया गया. अब आप इसे उद्धव का ‘अंधा कानून’ कहकर इस कार्रवाई पर रोना रोते रहिए. उद्धव की सरकार इसे कोरोना को लेकर अपनी संजीदगी बता और दिखा रही है, तो क्या कर लेंगे आप? आपके (बिहार के) अस्पतालों में तो वैसे भी कोरोना मरीजों को मरते और उनके परिजनों को बिलखते सबने देखा है.

क्वारंटीन में बंधक लोकतंत्र!

बिहार के मुखर डीजीपी ने अपने युवा और ‘सिंघम’ आईपीएस के हाथों पर लगी मुहर को देखा. विचलित हो गए. गुप्तेश्वर जी अनुभवी हैं. बेहद काबिल भी माने जाते हैं. समझ गए कि ये किसी को क्वारंटीन करने की सामान्य-सी मुहर नहीं है. ये मुहर है न्याय की राह रोकने की. ये मुहर है अपने तरीके से कानून को हैंडल करने की. मनमानी की. नीतीश सरकार को समझ में आ गया कि ये मुहर नहीं, ऐलान है इस बात का कि जो करना है कर लो, होगा वही, जो हम चाहेंगे. जितनी जांच करनी हो कर लो, जांच के नतीजे तो हम ही तय करेंगे.

महाराष्ट्र में कानून की इस ‘माफियागीरी’ पर किसी को ऐतराज हो, तो वह इस बात पर मंथन के लिए स्वतंत्र हैं कि ये जो लोकतंत्र है वह ‘लोक’ के लिए है या ‘तंत्र’ में बैठे लोगों के लिए?

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हमारा क्वारंटीन ही हमारा कानून है!

महाराष्ट्र में शिवसेना की अगुवाई में सरकार है. कांग्रेस और एनसीपी के बेमेल पाये उसके खड़े रहने की तब तक गारंटी हैं, जब तक कि कांग्रेस एक और राज्य में अपने ही कर्मों से ‘शून्य’ को न प्राप्त कर ले और एनसीपी के लिए सत्ता में हिस्सेदारी का कोई और जुगाड़ न लग जाए. बीएमसी में भी शिवसेना की सत्ता है. फिर परेशानी न होनी थी, न हुई. विनय तिवारी जबरन क्वारंटीन कर दिए गए. जिसकी सत्ता उसका क्वारंटीन. भाड़ में जाए देश का कानून! आईपीएस विनय तिवारी से पहले भी बिहार पुलिस की टीम जांच के लिए मुंबई पहुंची थी. सवाल करने वाले सवाल करते रहे कि तब उद्धव की संवेदनशील सरकार ने उन्हें क्वारंटीन करने की जरूरत क्यों नहीं समझी? बेशक, विनय तिवारी के हाथ पर क्वारंटीन की मुहर चीख-चीख कर कह रही है दाल में कुछ काला है. अब इसी काले को तलाशने की जिम्मेदारी सीबीआई पर है.

तीन घटनाओं के तार को न जोड़ने की जिद

जून के पहले ही पखवाड़े में तीन घटनाएं घटती हैं. 8 जून को रिया सुशांत का घर छोड़कर चली जाती है. 9 जून को दिशा सालियान कथित तौर पर खुदकुशी कर लेती है. फिर 14 जून को सुशांत कथित तौर पर सुसाइड कर लेते हैं. मासूम मुंबई पुलिस की नजर में अब तक इन मामलों का एक-दूसरे से कोई लेना-देना नहीं. मुंबई पुलिस के लिए दिशा की मौत बस एक हादसा है. ये हादसा इस काबिल भी नहीं कि उसकी जांच से जुड़ी जानकारी सहेज कर रखी जाए. मुंबई पुलिस के लिए मौत से पहले दिशा सालियान के घर हुई पार्टी के मेहमानों की भी कुछ खास अहमियत नहीं.

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ठीक इसी तरह से मुंबई पुलिस के लिए रिया का सुशांत के घर से चले जाना बस लिव इन में रह रही एक महिला का निजी फैसला है. रिया के जाने का रिश्ता न दिशा की मौत से है और न ही सुशांत की मौत से! महज 34 साल के एक कामयाब एक्टर की मौत मुंबई पुलिस के लिए महज डिप्रेशन में की गई खुदकुशी है. इसका न दिशा की मौत से कोई लेना-देना और न ही रिया के चले जाने से. सुशांत की दोस्त आरती नागपाल का ऑन कैमरा बयान है. सुशांत कह रहा था कि जिन्होंने दिशा को मारा है, वे मुझे भी नहीं छोड़ेंगे. सुशांत के करीबी या उन्हें करीब से जानने वाले ऐसे तमाम क्लू देते रहे, लेकिन मुंबई पुलिस ने अपनी आंख और कान बंद कर ली. बस, किसी अनजान दबाव में मुंह से अनाप-शनाप दलीलें देती रही. फिर तो सीबीआई ही रास्ता है.

विनय तिवारी ने मुंबई पुलिस को सतर्क कर दिया?

मुंबई एयरपोर्ट पर उतरते ही विनय तिवारी ने इन्हीं सवालों, दावों, खुलासों और घटनाओं के आपसी तार को जोड़ने की बात कही. तिवारी 14 दिन के लिए क्वारंटीन कर दिए गए. हाथ पर मुहर लगाकर जुबान बंद कर दी गई. क्यों? कौन है, जो तीनों घटनाओं की कड़ियों को जुड़ने नहीं देना चाहता? इन घटनाओं की कड़ियां जुड़ने से किनके हाथों तक हथकड़ियां पहुंच सकती हैं? मुंबई पुलिस न नादान है और न ही निकम्मी. अब उन्हीं लोगों को ढूंढने की जिम्मेदारी सीबीआई पर है.

उद्धव सरकार को लगा था कि बिहार पुलिस आएगी. हाथ-पांव मारेगी. मायानगरी की माया में गुम हो जाएगी. फिर थक-हारकर चली जाएगी. लेकिन बिहार की पुलिस अड़ गई. तो मुंबई पुलिस बीच सड़क पर ही अकड़ गई. बिहार पुलिस को सड़क पर रेला. कैदियों की तरह वाहन में धकेला. बिहार सरकार और बिहार की पुलिस दबाव में आ गई. मुंबई पुलिस के हाथों बिहार पुलिस के सम्मान का मान-मर्दन हुआ. मुद्दा राजनीतिक बन गया. बिहार में चुनाव है. लिहाजा सुशांत को न्याय दिलाने के लिए बिहार बीजेपी-जेडीयू-आरजेडी-एलजेपी सब साथ-साथ हैं.

दबाव बढ़ता गया, मुंबई पुलिस मुकरती गई

मुंबई पुलिस ने दिशा सालियान की मौत के जुड़ी जानकारी बिहार पुलिस को देने का वादा किया. कहते हैं कि किसी बड़े का फोन आया. उद्धव की पुलिस मुकर गई. कहा गया कि दिशा सालियान केस की फाइल डिलीट हो गई. फजीहत होने लगी तो सफाई आई कि ऐसा नहीं है. अहसास कराया गया कि ये मुंबई पुलिस की मासूम भूल थी. पर नहीं. ये तो रची-बुनी गई साजिश ज्यादा लगी. मुंबई पुलिस की इन बेशर्म मनमानियों के बाद सीबीआई के सिवा रास्ता क्या है?

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नीतीश के बिंदास डीजीपी कहते रहे कि न्याय को हलक से निकाल लेंगे. उद्धव की पुलिस बगैर कुछ कहे कह रही है कि न्याय की राह निकाल सको, तो निकाल कर दिखाओ. सुशांत के फैंस और कानून का मान चाहने वाले सोचते रहे- सॉरी सुशांत ! सॉरी दिशा ! हम आपको न्याय दिलाने की गारंटी नहीं ले सकते.

मुंबई पुलिस की साख किसने मिट्टी में मिला दी?

कायल कर देने वाली बात महाराष्ट्र कांग्रेस के प्रवक्ता सचिन सावंत ने की. इतना कुछ हो जाने के बाद भी आरोप लगाया कि मुंबई पुलिस को बदनाम किया जा रहा है. उस मुंबई पुलिस को बदनाम किया जा रहा है, जिसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर साख रही है. सावंत साहब को आत्ममंथन करना चाहिए. मुंबई पुलिस को कोई बदनाम कर रहा है या अपनी बदनामी खुद करा रही है? वैसे सावंत को शायद ये जानकारी भी जरूर होगी कि मुंबई पुलिस अपनी तमाम बदनामियों की कीमत पर जो कुछ कर रही है, उसके पीछे उसकी मजबूरी क्या है? उसके पीछे कौन-सी ‘बड़ी शक्ति’ का हाथ है?

बीजेपी के सीनियर नेता और प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन अगर कहते हैं कि मुंबई पुलिस के रवैये को देखते हुए इसमें किसी गहरे राज की आशंका लगती है. उद्धव के पुराने साथी अगर ऐसी आशंका जाहिर कर रहे हैं, तो चंद महीने पहले शिवसेना का हाथ थामने वाली कांग्रेस को नतीजे पर पहुंचने से पहले तथ्यों का विश्लेषण तो करना ही चाहिए था.

सफेदपोशों का संरक्षण… कानून की पहली जिम्मेदारी?

कानपुर के विकास दुबे कांड को याद कर लीजिए. दुबे तब तक शान से अपने अपराध का साम्राज्य चलाता रहा, जब तक कि वह अपने अपराध में कुछ सफेदपोशों और पुलिस वालों का हमसफर बनाए रखा. लेकिन जैसे ही उसी दुबे से पुलिस और सफेदपोशों पर आंच आती दिखी, विकास ने अपने विनाश को बुला लिया. कानून कानपुर के बिकरू कांड में शहीद होने वाली पुलिस या बांद्रा के फ्लैट में मृत पाए गए सुशांत को न्याय दिलाने के लिए काम नहीं करता. उससे पहले कानून और सत्ता के संरक्षण में बैठे सफेदपोशों की चिंता करता है.

अनगिनत सवाल… है कोई जवाब?

नहीं पता कि सुशांत अनजाने में किनके लिए खतरा बन गए थे? दिशा सालियान की मौत के बाद वे क्यों डर गए थे? बकौल आरती नागपाल क्यों कहा था कि जिन्होंने दिशा को खत्म किया वे मुझे भी नहीं छोड़ेंगे? नहीं पता कि सुशांत को छोड़कर जाने की रिया की टाइमिंग का दोनों मौतों से कोई लेना-देना है या नहीं? नहीं पता कि अंकिता लोखंडे के इस भरोसे में कितना दम है कि सुशांत कभी खुदकुशी कर ही नहीं सकते? नहीं पता कि जब भी कैमरे के सामने होता है, तो सिद्धार्थ पिठानी कुछ बताने से ज्यादा बहुत कुछ छुपाने की बेचैन मजबूरी में क्यों दिखता है? जिन्हें इन सवालों का जवाब तलाशना है, वे इसके लिए कतई तैयार नहीं दिखे. और जो इन सवालों की तहकीकात करना चाहता है उसे क्वारंटीन में भेज दिया गया. फिर तो सीबीआई ही रास्ता था.

सॉरी सुशांत. सॉरी दिशा. आपको तो पता ही है कि हमारी सरकारी व्यवस्था ही ‘क्वारंटीन’ में है और चाबी उनके हाथों में, जिनकी ताकत असीम है. इसलिए बहुत ज्यादा उम्मीद अभी भी न लगाएं. केस में अभी और भी कानूनी करवटें आ सकती हैं. केस की वजह से राजनतिक करवटें भी बदल सकती हैं. आप दोनों जहां कहीं भी हैं सुकून और शांति से रहें.

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