मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है तकलाकोट, सख्त-बेरहम और बदजुबान थे चीनी पुलिसवाले

तिब्बत पर पांव रखते ही अहसास हुआ, अरे, ये तो हमारे सारनाथ जैसा है. स्थानीय लोगों का व्यवहार बड़ा आत्मीय था. यहां भाषा फेल थी, न हिंदी, न अंग्रेजी, बातें आंखों और इशारों से हो रही थीं. भाषा के नाम पर गांव के बच्चे, बाजारवाले सभी नारे लगाते हैं—‘ॐ नम: शिवाय’. तकलाकोट चीन का सीमांत शहर है.
Taklakot is the Shinghadwara of Manasarovar Yatra, मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है तकलाकोट, सख्त-बेरहम और बदजुबान थे चीनी पुलिसवाले

द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला – भाग 4

दूसरे रोज सुबह हम सिमिकोट से हिलसा के लिए उड़े. हिलसा चौदह हजार फीट पर था. ऊंचाई ज्यादा थी, इसलिए हेलीकॉप्टर पूरी क्षमता से नहीं उड़ सकता था. तीन और चार के ग्रुप में हम बारी-बारी से वहां पहुंचाए गए.

हिलसा पचास घरों का छोटा सा अस्थायी गांव है. अस्थायी इसलिए कि सर्दियों में जब जयां बर्फ पड़ती है तो ये गांववाले सिमिकोट चले जाते हैं. एक पतली लेकिन हाहाकारी नदी करनाली हिलसा में नेपाल और तिब्बत की सीमा बनाती है.

नदी के उस पार चीन है, दोनों को जोड़ने वाला एक लक्ष्मण झूला जैसा पुल है. इस पुल को पैदल पार करना होता है. करनाली नदी मानसरोवर से निकलती है. पूरा नेपाल पार करते हुए जब भारत में पहुंचती है तो सरयू कही जाती है, यही अयोध्या के बाद घाघरा बन जाती है. यानी मानसरोवर से निकलकर बलिया के पास गंगा में मिलते-मिलते यह नदी तीन नामों से जानी जाती है.

हम हिलसा में थे, हिलसा में सब टुन्न थे, परम बुद्धत्व को प्राप्त. कस्बे के लगभग सभी घर यहां चाय-नाश्ते की दुकान चलाते हैं या ऊन बेचते हैं. हेलीकॉप्टर से आनेवाले तीर्थयात्रियों के लिए लकड़ी की आग में बनाई गई चाय और भोजन से ही इनकी आजीविका है. महिलाएं दुकान संभालती हैं और पुरुष नेपाल व चीन के सीमांत सम्मोहन से ऊपर उठ परम टुन्न. हमारे दूसरे साथियों के इंतजार में हमें यहां चाय-नाश्ता करना पड़ता है, सबके आने के बाद हम पैदल पुल पार कर चीन के तकलाकोट पहुंचते हैं.

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तकलाकोट शहर तो यहाँ से दूर है, पर सीमा चौकी पास ही है, जहाँ कस्टम और आव्रजन की जांच होती है. हमारे पासपोर्ट और परमिट देखे जाते हैं. हमारी घड़ियों की सुई ढाई घंटे आगे बढ़ा दी गई, क्योंकि वहाँ का टाइम जोन हमसे ढाई घंटे आगे है. किसी के पास भारतीय मुद्रा और सीमांत क्षेत्र में खींची गई फोटो तो नहीं है—इसकी भी जांच हुई.

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चीन में भारतीय मुद्रा नहीं ले जा सकते, चीनी पुलिसवालों के साथ हमारा पहला अनुभव अच्छा नहीं था, वे सख्त, बेरहम और बदजुबान थे. एक ने मेरे पास किताबें देख पूछा, दलाई लामा का फोटो तो नहीं है. मैंने कहा, किताब में नहीं, दिल में है. वह मेरी ओर खीझ से देख रहा था. चीन में दलाई लामा के चित्रों पर पाबंदी है, अगर आप दलाई लामा के चित्रों का सार्वजनिक प्रदर्शन करें तो दस साल की सजा का प्रावधान है.

हम चीन-शासित तिब्बत में थे, हमारे ड्राइवर तिब्बती थे. भाषा की समस्या थी, हमें देखते ही वे चीखे, ‘बम भोले’, ‘हर-हर महादेव’! सिर्फ इतनी ही हिंदी वे जानते थे. तिब्बत पर पांव रखते ही अहसास हुआ, अरे, ये तो हमारे सारनाथ जैसा है. स्थानीय लोगों का व्यवहार बड़ा आत्मीय था. यहां भाषा फेल थी, न हिंदी, न अंग्रेजी, बातें आंखों और इशारों से हो रही थीं. भाषा के नाम पर गांव के बच्चे, बाजारवाले सभी नारे लगाते हैं—‘ॐ नम: शिवाय’. तकलाकोट चीन का सीमांत शहर है. सुरक्षा के नाम पर काफी संवेदनशील. हमें थोड़ी-थोड़ी दूर पर सैन्य चौकियां दिख रही थीं. यहां के सरकारी रेस्ट हाउस में हमारे ठहरने का इंतजाम था. छह से सात हजार की आबादी है इस शहर की, तिब्बती, नेपाली, भारतीय सबके बाजार हैं यहां. भारतीय व्यापारियों का कभी यहां वर्चस्व हुआ करता था. सन् 1962 की लड़ाई के बाद उनका आना-जाना बंद हुआ, लेकिन यहां अभी भी 30-40 दुकानें भारतीय व्यापारियों की हैं, बाकी दुकानें चीनी और नेपाली लोगों की हैं.

Taklakot is the Shinghadwara of Manasarovar Yatra, मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है तकलाकोट, सख्त-बेरहम और बदजुबान थे चीनी पुलिसवाले

तकलाकोट कस्टम ने यहां फिर से हमारा पासपोर्ट और परमिट जांचा, तब हमें आगे जाने की इजाजत दी. यहीं हमें काठमांडू से आए गाइड और खानसामा मिले अपने ट्रक के साथ. ट्रक में पूरा किचन था, खाने के सभी सामान, बरतन, पीने का पानी, सबके लिए दवाइयां, ऑक्सीजन सिलेंडर और खासतौर पर बनी जैकेट भी इसमें थीं. रात का खाना इन्हीं लोगों ने बनाया. नेपाली गाइड हमें समझा रहा था कि खाने के लिए किसी चीनी दुकान में न जाएं. न जाने क्या खिला दें—कुत्ता, बिल्ली, बंदर? तिब्बती ड्राइवर गुंफा दोरजी बातचीत में चीनी प्रभाव के खिलाफ आक्रोश प्रकट कर रहा था. उसकी जिज्ञासा दलाई लामा और भारत में रह रहे तिब्बतियों का हाल जानने की थी. हमने भारत में तिब्बतियों के प्रति अपने प्रेम की जानकारी उन्हें दी, उससे हमारी मित्रता अब आत्मीयता के स्तर पर थी.

यहां भी वही स्थिति, सूर्य अस्त, पहाड़ मस्त. शहर में काफी गंदगी है, हमारे लिए पीने के नाम पर चाय थी. पर सावधान, तिब्बती चाय नमकीन होती है और ऊपर से उसमें याक के दूध का मक्खन डाल देते हैं. पूरी यात्रा में सिर्फ एक बार मैंने यह चाय पी, वह भी तिब्बतियों से भाईचारा दिखाने के लिए नाक बंद कर पीनी पड़ी. भारत में उत्तराखंड के धारचूला के जरिए जो सरकारी यात्रा आती है, वह भी सबसे पहले तकलाकोट ही पहुंचती है. इस लिहाज से तकलाकोट भारत की सीमा के सबसे करीब है और मानसरोवर यात्रा का सिंहद्वार है.

जारी … रात 9 बजे तक रहता है मानसरोवर में उजाला, ये अमृत है तो 15 हजार फीट की ऊंचाई पर राक्षसताल विष

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