Diwali:एक नन्‍हा सा दीया और अधंकार के समूचे सागर को पीने की चुनौती

दीपावली भी एक ललित तत्व ही है. ललित प्रस्तुति. ललित संसर्ग. यह लालित्य अपने शास्त्रीय अंदाज में दीपावली पर्व के साथ आता है.

दीपावली जीवन के गहन अंधकार के बीच रोशनी का उत्सव है. वर्ष की सर्वाधिक अंधेरी रात में आती है, यह दीपावली. दीपमालिकाओं का ये उत्सव एक माध्यम है जिसके जरिए एक नन्हा दीया अधंकार के समूचे सागर को पीने की चुनौती स्वीकार करता है. इस दीए की लौ में एक उम्मीद नाचती है. उम्मीद इस बात की, कि अगला वर्ष उजियारे से भरापूरा होगा. इस नन्हें दीए का साहस ही हमारी परंपराओं में घुली हुई उत्सवधर्मिता का सनातन संदेश है.

इस दीए की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका आलोक अपने लिए नही, बल्कि दूसरों के लिए होता है. अपने लिए तो केवल जलना होता है. यही दीए का दर्शन है. उसके प्रकाश की कोई सीमा नही होती. वह जहाँ तक पहुँचता है, आलोक बिखेरता है. प्रकाशित करता है. दीपावली का अर्थ ही है आलोक का विस्तार. एक नन्हा-सा दीप असंख्य दीपों को दीपशिखा प्रदान कर प्रकाश की अनंत ऋंखला स्थापित कर सकता है. प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है. शिक्षा का प्रतीक है. दीपावली प्रतीक है शस्य, श्यामल सम्पन्नता का. दान के, देय के उत्साह का. दूर दूर से आने वाले पक्षियों के चहचहाने का. दीपावली आवाहन है नए वर्ष का. नव हर्ष का. स्वयं को ख़ाली कर, नए सिरे से भरने का. वैदिक शब्दों में परिभाषित करें तो स्वयं के अतिरेचन का.

अंधेरा हमेशा से मनुष्यता का शत्रु रहा है. अंधकार डराता है. अस्तित्व को नष्ट करता है. इसीलिए मनुष्य अपने अस्तित्व की सुरक्षा के लिए सदैव से प्रकाश का मुखापेक्षी रहा है. विधाता ने प्रकृति में प्रकाश और अंधकार का अदभुत संतुलन स्थापित किया है. दिन अगर प्रकाश की यात्रा है तो रात अंधेरे का विस्तार. अंधकार एक आवरण है. एक भय है. आशंका है, दुस्वप्न है. इसीलिए उसमें जड़ता है, अकर्मण्यता है, एकरसता है, निंद्रा है. अस्तित्व का विलय है. इसलिए अंधेरा त्याज है. जबकि प्रकाश में चेतना है.विविधता है. सक्रियता है, कर्मठता है और अस्तित्व की सुरक्षा है. इसी कारण आलोक वरेण्य है.

अंधकार के सागर में प्रकाश बिखेरने की लालसा ने ही मानव सभ्यता के इतिहास में प्रगति के अनेक पगचिन्ह छोड़े हैं. पत्थरों को रगड़कर चिंगारी पैदा करने से लेकर आज के लेजर लाईट दौर तक मनुष्य ने सदैव ज्योतिमुखी यात्रा ही की है. अपनी इसी प्रकाश यात्रा के ज़रिए हम अतीत से प्रेरणा पाते हैं और भविष्य की आशा साधे रहते हैं. हमें समाज और जीवन को नियमित करने के लिए जिन गुणों और तत्वों की ज़रूरत होती है, उत्सवों के जरिए हम उसे भी पाते हैं. हमने अपने देवताओं और महापुरूषों को भी उन्हीं गुणों का प्रतीक बना लिया है. शिव अभय के प्रतीक हैं तो राम मर्यादा के. कृष्ण प्रेम के तो बुध्द करुणा के और महावीर तप के. त्यौहारों के माध्यम से हम इन्हीं गुणों की रक्षा करते हैं. इसी सत्व को साधते हैं. हमारे चित्त की समृद्धि का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि हमारे सभी त्यौहार आनंद के त्यौहार हैं. उत्सव के पारावार हैं.

इतिहास बताता है कि सभी त्योहारों की शुरुआत ऋतु उत्सव के रूप में हुई. शीत आनंद की ऋतु है. स्वच्छता की ऋतु है. संधि ऋतु है. आर्य एवं आर्येतर जातियां सामूहिक शरदोत्सव मनाती थीं. रात भर अग्निशिखाओं के प्रकाश में नृत्य-गीत की कलाएं थिरकती थीं. आज भी बुंदेलखंड में दीपावली पर सामूहिक ‘कहरवा’ गाया जाता है. बाद में यही ऋतु उत्सव कृषि उत्सव में बदल गया, क्योंकि कृषि के विकास के साथ साथ ग्रामीण स्वतंत्रता भी विकसित हुई. फसल पकी. धान, कोदों, सामा, ज्वार, मक्का और बाजरा की फसलें कटकर घर आईं. किसानो के त्योहार मनाने का क्षण आया. इसमें सबसे अधिक प्रमुखता मिली धान को, क्योंकि यह आदिम अन्न है. हमारे यहॉं सारे पूजा विधान में चावल का प्रयोग होता है. कही आटे या गेंहू का प्रयोग नहीं है. इसीलिए धान की खील बनी.

यही कारण है कि दीपावली सिर्फ आलोक-उत्सव ही नहीं, अन्नोत्सव भी है. अन्न ब्रह्म है. आदि युग में मनुष्य भी पशु की भांति कच्चा अन्न खाता था. अग्नि से परिचय हुआ तो पाक-शास्त्र वजूद में आया अर्थात मानव ने भून कर खाना सीखा. दीपावली की रात में गणेश-लक्ष्मी की ‘खील’ बिखेरकर पूजा की गई. अंधकार में प्रकाश बिखेरने का काम नन्हें दीपकों ने संभाला और भूख के अंधकार से निपटने का काम नन्हीं-नन्हीं खीलों ने. खील अपने आप में प्रकाश की प्रतीक है. काली-कलूटी धान की वर्णराशि, अग्नि के संपर्क में आकर, उसके ताप से खिल जाती है. श्वेत-शुभ्र खील. परवर्ती युग में खील के साथ बताशा भी जुड़ गया. यह किसी बालक की मधुर सूझ रही होगी या संभव है किसी ब्राह्मण की माधुर्य लिप्सा का नतीजा हो. कहा भी गय है- ‘ब्राह्मण मधुरं प्रियम.’

दीपावली तो हम हर साल मनाते है. ये अलग बात है कि अब उसके अर्थ और उद्देश्य धुँधले पड़ गए हैं. उसके मनाने के तरीक़े में भी एक तरह की यांत्रिकता आ गयी है. दीवाली का संदेश यही है कि हमें अपने जीवन के अंधेरे पहलुओं को दूर करते हुए उजाले की तरफ़ बढ़ना है. यह माना जाता है कि इसी रोज़ अतीत में भगवान राम वनवास के बाद वापस अयोध्या लौटे थे. उनके लौटने की खुशी में अयोध्या वासियो ने जो उत्सव मनाया था, वह दीवाली के तौर पर प्रसिध्द हुआ. यह कथा सही भी हो सकती है, सत्याशं भी क्योंकि दिवाली पर भगवान राम की कोई पूजा नही होती है. पूजा होती है लक्ष्मी जी की. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में, ‘‘दीवाली आकर कह जाती है कि अंधकार से जूझने का संकल्प ही यथार्थ है. उससे जूझना ही मनुष्य का मनुष्यत्व है. जूझने का संकल्प ही महादेवता है. उसी को प्रत्यक्ष करने की क्रिया को लक्ष्मी-पूजा कहते हैं.’’

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार समस्त सृष्टि की मूलभूत आद्याशक्ति महालक्ष्मी है. वह सत, रज और तम तीनों ही गुणों का मूल हैं. वही आद्याशक्ति हैं. वह समस्त विश्व में व्याप्त हैं. वह लक्ष्य और अलक्ष्य, इन दोनो ही रूपों में रहती हैं. लक्ष्य रूप में यह चराचर जगत ही उनका स्वरूप है और अलक्ष्य रूप में वह समस्त जगत् की सृष्टि का मूल कारण हैं. इसी बात को और भी स्पष्ट करते हुए वैदिक ऋषि ने कहा था कि जो अग्नि में है, जल में है, वायु में है, औषधियों में है, वनस्पतियों में है, उसी महादेव को मैं प्रणाम करता हूँ!

दीपावली सम्पन्नता का अनुष्ठान है. सम्पन्नता को सिध्द करने का साधन पैसा है. और पैसे का स्वभाव क्या है? इसे समझाने के लिए दिवाली पर जुआ खेलने की प्रथा है. यहॉं पैसा अपने स्वामियों को तेज़ रफ़्तार से बदलता रहता है. दिवाली में खेला गया जुआ व्यसन नही है. यह अनुष्ठान है. यह बताने की खातिर कि पैसा स्थायी नही है. उसके चंचल स्वभाव से हमें परिचित रहना चाहिए. पैसा हमारी सम्पन्नता का माध्यम हो सकता है. पर पैसा सम्पन्नता का पर्याय नही है. जिस समाज में पैसा सम्पन्नता का पर्याय हो गया, उसकी सम्पन्नता लम्बे वक़्त तक टिकाऊ नही रह सकती है. इसलिए जुए का संदेश यही है कि हम पैसे के क्रूर और चंचल स्वभाव को समझें. इसलिए कहीं कहीं इसे लक्ष्मी-पुत्रों का त्योहार भी कहा गया. मनुष्य ने बड़े बड़े भवनों की ऊंचाइयों से आतिशबाजी करने की आदत सीखी और औद्योगिकीकरण की उंगली पकड़कर ‘दीपों’ के स्थान पर ‘बल्बों’ से श्रृंगार करना सीखा. फिर भी पूजन की वेदिका पर दीप का अस्तित्व आज भी सुरक्षित है. दीपावली पर नन्ही-नन्ही दीपमालाए आज भी सजाई ही जाती हैं. ऊँचाइयों पर ‘कंदीले भी टाँगी जाती हैं. रंग-बिरंगी क़ंदीलों की यह परंपरा समुद्र तटीय क्षेत्रों के उन आकाशदीप’ का अनुकरण है, जो भटके हुए जलयानों को रास्ता दिखाते थे. ‘कंदील’ अंधियारी रात में उगा हुआ एक इंद्रधनुष है जो प्रकाश को सप्तवर्णी बनाता है.

दीपावली भी एक ललित तत्व ही है. ललित प्रस्तुति. ललित संसर्ग. यह लालित्य अपने शास्त्रीय अंदाज में दीपावली पर्व के साथ आता है. वैसे तो दीप सामान्य रूप में साल भर जलते हैं पर दीपावली का दीप विशिष्ट होता है. दीपावली सामान्य से असामान्य की वह यात्रा है, जो अमीर गरीब सबको रोमांच से भर देती है. घर में धान कटकर आता है. धन-धान्य संपन्न हो जाते हैं घर. स्त्रियां इस रोज सूप से ‘दलिद्दर’ भगाती हैं.

आज हमारे जीवन में बाजार की दखल बढ़ी है. बाजार एक यथार्थ है तो एक स्वप्न लोक भी. आपके पास जो नहीं होता है, वही आप चाहते हैं. बाजार आपको ललचाता है. पर बाजार का संतुलित उपयोग हमें पुष्ट भी बनाता है. मगर बाजार को अपने ऊपर हावी मत होने दीजिए. बाजार का उचित उपयोग कीजिए. बाजार की आराधना मत कीजिए. इससे दीपावली अर्थहीन हो जाएगी! हमारा हर त्यौहार संसार में रहते हुए, उसके उतार चढ़ाव को सहते हुए, आनंद और पुरुषार्थ के भाव को साकार करने का ज़रिया है. इस दीपावली हम आपके सम्पन्नता और सिद्धि से भरे-पूरे जीवन की प्रार्थना करते हैं. आपके मांगल्य की कामना करते हैं. यह दीपावली आपके अंतस को प्रकाशित करे, आपको जीवन को उद्देश्य की सार्थकता से ओतप्रोत करे, इन्हीं शुभकामनाओं के साथ.