रामविलास पासवान का वो सियासी दांव जिसने भारतीय राजनीति का रुख मोड़ दिया

रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) भले ही दुनिया छोड़ चुके हों, लेकिन भारतीय राजनीति में उनकी भूमिका अविस्मरणीय मानी जाएगी.

साल 1989 में रामविलास पासवान वीपी सिंह सरकार में न्याय/ सामाजिक कल्याण मंत्री थे और कहा जाता है कि रामविलास पासवान ने मंडल कमीशन लागू करवाने में अहम भूमिका निभाई थी. गौरतलब है कि बोफोर्स सौदे में कथित घोटाले के बाद वीपी सिंह ने कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा देकर जनता दल का गठन किया था और साल 1989 में जनता दल, बीजेपी और लेफ्ट पार्टियों की मदद से केंद्र में सरकार बनाने में कामयाब हुए थे.

इसी चुनाव में रामविलास पासवान (Ram Vilas Paswan) रिकॉर्ड मार्जिन से चुनाव जीते थे और भारतीय राजनीति को एक नई दिशा देने में अहम भूमिका निभाई थी.

मंडल कमीशन लागू कराने में पासवान की क्या थी भूमिका?

1989 में बनी वीपी सिंह सरकार में चौधरी देवीलाल उपप्रधानमंत्री थे. चौधरी देवीलाल की लोकप्रियता उन दिनों चरम पर थी. उन्होंने ही वीपी सिंह को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठाया था, लेकिन चंद महीने बीतते ही वीपी सिंह और चौधरी देवीलाल की अनबन हो गई, जिसके चलते चौधरी देवीलाल ने 9 अगस्त 1990 को वोट क्लब पर रैली बुलाकर वीपी सिंह की नींद उड़ा दी थी.

ज़ाहिर है किसान नेता चौधरी देवीलाल के बगावती तेवर का सामना करना वीपी सिंह के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था, इसलिए इस समस्या से निपटने के लिए समाधान खोजा जा रहा था. वीपी सिंह सरकार में केन्द्रीय मंत्री रहे रामविलास पासवान ने शरद यादव के साथ मिलकर मंडल कमीशन लागू करने की सलाह दे डाली, जिससे कि पिछड़े और अति पिछड़े समाज सरकार पर पकड़ मज़बूत हो सके.

फाइल फोटो- रामविलास पासवान

कहा जाता है कि चौधरी देवीलाल की धार को कुंद करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने आनन-फानन में 7 अगस्त 1990 की रात में मंडल कमीशन की एक सिफारिश लागू कर दिया, जिसके बाद देश की राजनीति में पूरी तरह खलबली मच गई. बिहार के पूर्व सांसद और पूर्व मंत्री रामजीवन सिंह कहते हैं कि रामविलास पासवान, शरद यादव के साथ तत्कालीन प्रधानमंत्री मिलकर वीपी सिंह को समझाने में कामयाब रहे थे कि मंडल कमीशन की सिफारिश को लागू करना सरकार के लिए कैसे हितकर साबित होगा.

भारत सरकार में सचिव रहे पीएस कृष्णन ने भी नौकरी में आरक्षण लागू कराने में राममिलास पासवान की भूमिका की कई जगह पर तारीफ की है. ध्यान रहे पीएस कृष्णन भी आरक्षण लागू कराने को लेकर कई सालों तक लंबी लड़ाई लड़ते रहे हैं. वैसे बिहार की राजनीति पर पैनी नजर रखने वाले पॉलिटिकल एक्सपर्ट डॉ संजय कुमार कहते हैं वीपी सिंह मंडल कमीशन के पक्षधर नहीं थे, इसीलिए उन्होंने मंडल कमीशन की सारी सिफारिशों को लागू करने से परहेज रखा. यही वजह रही कि रामविलास पासवान सारी सिफारिशों को पूर्ण रूप से लागू कराने के लिए सरकार के खिलाफ जंतर-मंतर पर भी बैठे.

रामविलास पासवान ने जंतरमंतर पर क्यों किया था प्रदर्शन?

साल 1989 में हो रहे लोकसभा चुनाव में जनता दल ने अपने घोषणा पत्र में मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करने का जिक्र किया था. मंडल कमीशन की रिपोर्ट में 14 मुख्य सिफारिशें थीं, जिनमें से एक पिछड़े वर्ग के लोगों के लिए सरकारी नौकरी में आरक्षण की व्यवस्था थी. वीपी सिंह की सरकार ने इसी एक सिफारिश को लागू कर अन्य सिफारिशों को किनारे कर दिया था.

कैसे तैयार हुई थी मंडल कमीशन रिपोर्ट?

दिसंबर 1978 में मोरारजी देसाई की सरकार ने पिछड़े वर्ग की स्थिति की समीक्षा के लिए बीपी मंडल की अध्यक्षता में आयोग का गठन किया था, जिसका नाम मंडल आयोग के नाम से प्रसिद्ध हुआ. दो साल बाद 31 दिसंबर 1980 को बीपी मंडल ने राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह को अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंप दी थी, जिसमें पिछड़े और अति पिछड़े वर्ग को मजबूत करने की सिफारिश की गई थी.

आयोग ने पूरे देश में तकरीबन 3000 जातियों के बारे में विस्तृत रिपोर्ट तैयार की थी, लेकिन जब आयोग का काम पूरा हुआ तब तक मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री पद को त्याग चुके थे. इसी वजह से मंडल आयोग की रिपोर्ट 1980 से लेकर 6 अगस्त 1989 तक धूल फांकती रही, लेकिन पासवान ने एक दांव ने बाजी पूरी तरह पलटकर रख दी थी. मंडल आयोग की इसी रिपोर्ट की काट के लिए बाद में बीजेपी को कमंडल थामना पड़ा था मतलब राममंदिर आंदोलन ने पहली बार इसी दौर में जोर पकड़ा.

 

Related Posts