ओपिनियन : ‘शाहीन’ की उड़ान को नियंत्रित करने का वक्त!

किसी बात या फैसले के विरोध का अधिकार सबको है. लेकिन दूसरे लोगों की कीमत पर नहीं. शाहीन बाग के लोग विरोध जारी रख सकते हैं लेकिन तरीका बदला जा सकता है.
Time to contain Shaheen Bagh Protests, ओपिनियन : ‘शाहीन’ की उड़ान को नियंत्रित करने का वक्त!

करीब 90 साल की रुखसाना बानो को अपनी बची हुई जिंदगी में अपने लिए कुछ नहीं चाहिए. लेकिन वह लड़ रही हैं. कई दूसरे लोगों की तरह उन्हें भी लगता है कि नया नागरिकता कानून ठीक नहीं है. रुखसाना दिल्ली के शाहीन बाग में करीब महीने भर से चल रहे आंदोलन का हिस्सा हैं. वह रोज घंटों धरनास्थल (प्रदर्शनस्थल) पर बैठती हैं. उनकी तरह कई और लोग हैं. इन हजारों लोगों में महिलाओं की तादात आश्चर्यजनक रूप से काफी ज्यादा है. कुछ लोगों का मानना है कि महिलाएं ही दरअसल इस आंदोलन की अगुवाई कर रही हैं.

ऐसे दौर में जब लोग अपनी बातें मनवाने और छोटे-छोटे हितों को साधने के लिए आक्रामकता से आगे बढ़कर हिंसा तक उतर आते हैं, ये बेहद शांतिपूर्ण आंदोलन सराहनीय है. धैर्य और संयम के लिए इसमें शामिल लोगों को सैल्यूट जरूर किया जाना चाहिए. वैसे तो ये आंदोलन घोषित तौर पर सीएए के खिलाफ है. लेकिन सवाल सिर्फ नए नागरिकता कानून के समर्थन या विरोध का नहीं है. सीएए के खिलाफ बनाम सीएए के साथ से जुदा एक अलहदा मुद्दा भी है. बेशक, शाहीन बाग का आंदोलन सीएए के एकसूत्री विरोध पर टिका है, पर अपने आंदोलन को लेकर इनकी प्रतिबद्धता काबिलेगौर है और काबिलेतारीफ भी.

मुमकिन है कि 90 साल की रुखसाना बानो के ऊपर अब दैनन्दिन की कोई पारिवारिक जिम्मेदारी न हो, लेकिन आंदोलन में जो लोग शामिल हो रहे हैं, उनमें सभी ऐसे नहीं हैं. बहुतेरे वे लोग हैं, जो नौकरीपेशा हैं, कामकाजी हैं. जिनके कंधे पर बड़ी-बड़ी जिम्मेदारियां हैं.  लेकिन ये सारे लोग आंदोलन को वक्त दे रहे हैं. क्योंकि उन्हें लगता है कि ये एक तरीके से बेहतर भारत के लिए उनकी ओर से अपने हिस्से का वक्त, श्रम और संसाधनों का निवेश है.

कानून के शासन वाला भारत तो सबको चाहिए

आखिर एक बेहतर और कानून के शासन वाला भारत किसे नहीं चाहिए? यकीनन ऐसी चाहत इन आंदोलनकारियों की भी है और उन लोगों की भी, जो सीएए के खिलाफ ऐसे आंदोलनों के विरोधी हैं. ऐसे ही लोगों में शुमार बड़ी संख्या में शाहीन बाग के आसपास के लोग पिछले दिनों सड़कों पर उतर आए. इनमें से कुछ लोग सीएए के विरोधियों को खरी-खोटी कहते भी सुने गए, लेकिन असल शिकायत ट्रैफिक में हो रही परेशानियों को लेकर ही थी. सवाल उन लाखों लोगों की परेशानियों का था, जो पिछले करीब महीने भर से भुगत रहे हैं. उन लोगों का, जो रोज जाम की वजह से बेवजह घंटों सड़क पर गुजार रहे हैं. उन लोगों का, जिन्हें घर-दफ्तर-स्कूल-अस्पताल जाने में परेशानी हो रही है.

सीएए के साथ नहीं, लेकिन सड़क जाम के खिलाफ

एक बड़ी प्राइवेट कंपनी के अधिकारी गुरप्रीत सिंह रोजाना नोएडा से दक्षिण दिल्ली अपने दफ्तर को जाते हैं. देर शाम उनकी वापसी होती है. पहले 5 से 6 बजे के बीच अपने परिवार के साथ होते थे. कालिंदी कुंज-नोएडा रोड बंद होने से अब कई बार घर पहुंचते-पहुंचते रात के 8-9 बज जाते हैं. घरवाले सवाल पूछते हैं, पुलिस उन्हें हटाती क्यों नहीं? न गुरप्रीत सीएए के समर्थक हैं और न ही उनके परिवार के बाकी लोग. इन्हें सीएए के खिलाफ हो रहे आंदोलनों से कोई शिकायत भी नहीं है. लेकिन शाहीन बाग आंदोलन की वजह से लग रहे जाम ने उन्हें इस कदर परेशान कर रखा है कि वे प्रदर्शनकारियों से नाराज दिखने लगे हैं. बावजूद इसके कि वे भी आंदोलन की प्रतिबद्धता से प्रभावित हैं.

पुलिस और जनप्रतिनिधियों का रोल संदिग्ध

सड़क जाम करने के खिलाफ देश में बाकायदा दंड विधान है. दोषी होने पर कुछ महीनों से लेकर लंबी अवधि तक कैद तक की सजा है. तो क्या दिल्ली की कड़क सर्दी से बेपरवाह और अपनी मांगों के समर्थन में महीने भर से डटी महिलाओं, बच्चों और दूसरे लोगों को जेल में डाल दिया जाए? ये बिल्कुल भी सही नहीं होगा. लेकिन क्या दिल्ली पुलिस प्रदर्शनकारियों को लगातार ये समझा पा रही है कि सड़क जाम रखने की जगह वे दूसरे विकल्पों का इस्तेमाल करें? क्या राजनीति से जुड़े नुमाइंदों ने उन्हें सतत ये समझाने की कोशिश की कि वे किसी और वैकल्पिक रास्ते से उतने ही प्रभावी तरीके से अपना आंदोलन कैसे जारी रख सकते हैं?

अलोकप्रिय होने का खतरा

लंबे समय तक सड़क जाम रखना समाधान नहीं है. इसमें कोई दो राय नहीं हो सकती. इससे उल्टे आंदोलन एक सीमा के बाद अलोकप्रिय हो सकता है. खुद आंदोलनकारियों को इस खतरे को समझना होगा. उन्हें याद ये भी रखना होगा कि दिल्ली की चुनावी मजबूरियों के निपटते ही स्थिति अलग हो सकती है.

शाहीन होना अच्छा है, लेकिन उड़ान नियंत्रित रहे

कहते हैं कि ‘शाहीन’ का मतलब दृढ़ निश्चय होता है. शाहीन एक ऐसी चिड़िया का नाम है, जो बड़ी ऊंचाई पर उड़ते हुए शिकार करती है और उड़ते-उड़ते ही अपने शिकार को चट कर जाती है. बाज की प्रजाति की इस चिड़िया को अदम्य हौसले का प्रतीक माना गया है. अब तक शाहीन बाग के आंदोलनकारियों ने ऐसी ही इच्छा शक्ति दिखाई है. स्थान के नाम को चरितार्थ किया है. लेकिन अपनी ‘उड़ान’ को नियंत्रित रखने और सही दिशा देने (या थोड़ी दिशा बदलने की) की चुनौती अब बिल्कुल सामने है. याद रहे कि आंदोलन से होने वाली परेशानियों से उभरने वाले गुस्से को कैश करने के लिए भी कुछ लोग ताक में जरूर बैठे होंगे.

मांगें अपनी जगह हैं. किसी बात या फैसले के विरोध का अधिकार सबको है. लेकिन दूसरे लोगों की कीमत पर नहीं. शाहीन बाग के लोग विरोध जारी रख सकते हैं. लेकिन तरीका बदला जा सकता है. जिम्मेदारी इसलिए और ज्यादा बढ़ गई है क्योंकि शाहीन बाग नए नागरिकता कानून के विरोध का रोल मॉडल बन चुका है. देश के अलग-अलग शहरों से लेकर विदेशों तक.

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