फोर्स और हैप्पी लैंडिंग के बीच अटकी रहीं सांसें, कैलास मानसरोवर से लौटकर नहीं मानता बावरा मन

ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है. जो इस काया के साथ देखते हैं, सिद्ध होते हैं. न हम सिद्ध थे, न मरे. फिर भी अहसास किया. अगर इस अहसास का आपको सहभागी बना पाया तो यह मेरा पुण्य, नहीं बना पाया तो मेरी असफलता. लौटने के बाद भी मेरा बावरा मन मानने को तैयार नहीं था. वह वहीं रम रहा था. बार-बार मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं. इतनी दूर से हमें बुलाया, प्रभु. प्रेरणा दी, ताकत दी.
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द्वितीयोनास्ति, कैलास: पर्वत एक अकेला भाग – 12

नदी के उस पार से ही हमें हिलसा में खड़ा अपना हेलीकॉप्टर दिख रहा था. हेलीकॉप्टर में हमारा सामान रखा गया. ऊंचाई ज्यादा थी, इसलिए आते वक्त की तरह इस बार भी हमें दो ग्रुप में जाना पड़ा; क्योंकि गगनचुंबी चोटियों पर हेलीकॉप्टर पूरी क्षमता से नहीं उड़ पाता. हम सिमिकोट उतरे. इस ऊबड़-खाबड़ कच्ची हवाई पट्टी पर एक छोटा जहाज नेपालगंज जाने के लिए पहले से तैयार खड़ा था. पर अभी हमारे दूसरे साथियों को आना था. जब वे आए तो हम सबके सामान उस जहाज में चले गए. यह कसरत हेलीकॉप्टर का वजन कम करने के लिए थी. अब हम सबको एक साथ नीचे नेपालगंज तक हेलीकॉप्टर से जाना था, सामान के बिना.

तभी एक मुसीबत बिना सूचना के आ गई. हमें स्टार्ट हेलीकॉप्टर से उतरने के लिए कहा गया. मैं समझा नहीं. सब एक-दूसरे को देखने लगे. कहीं कोई गड़बड़ है. ‘हम हेलीकॉप्टर चेक कर रहे हैं.’ कैप्टन ने कहा. सब लोग नीचे आ इस उत्सुकता के साथ इंतजार कर रहे थे कि आखिर हुआ क्या है? कोई घंटे भर बाद हेलीकॉप्टर से सारा ईंधन निकाला गया. मुझे लगा, शायद तेल में कोई गड़बड़ होगी, कचरा होगा. फिर तेल दुबारा भरा गया.

अब तक मैं गड़बड़ी समझ चुका था. हेलीकॉप्टर का ईंधन बतानेवाला यंत्र काम नहीं कर रहा था. वह टैंक खाली बता रहा था. मुझे थोड़ी जानकारी थी. मैंने भी 1979 में विमान उड़ाने का निजी विमानन लाइसेंस लिया था—110 घंटे की उड़ान के साथ. उड़ने और उड़ाने के बुनियादी सिद्धांत तो मुझे समझ ही आते हैं. कप्तान मुझे कह रहा था कि कोई गंभीर बात नहीं है. लेकिन इस मामूली गड़बड़ से हेलीकॉप्टर में ‘सिक्यूरिटी अलार्म’ बज रहा था. कई लोग मिलकर उसे ठीक कर रहे थे. पर मामला बन नहीं पा रहा था.

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थोड़ी देर बाद हेलीकॉप्टर के कैप्टन इस प्रस्ताव के साथ आए कि हम फिर दो फेरी लगाएंगे, बारी-बारी से. क्योंकि हेलीकॉप्टर जो संकेत दे रहा है, उसमें पूरी क्षमता का वजन उस पर देना ठीक नहीं है. गड़बड़ी का पता चल गया. सब एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे. सब ठीक तो है? कहीं फिर तो गड़बड़ नहीं होगी? हमने कैप्टन से पूछा, जरा भी संदेह हो तो आप दूसरा हेलीकॉप्टर मंगाएं. तब तक हम यहीं रह लेंगे. यहां रहने का इंतजाम भी है. पर वे चलने को तैयार थे.

हम चार लोग पहले जत्थे में उड़े. कोई 10 मिनट के बाद ही हम खतरनाक पहाड़ियों के ऊपर थे. तभी खतरे का अलार्म फिर बजा. मैं पायलट के सिर पर चिंता की रेखाएं साफ पढ़ रहा था. उसने एटीसी (एयर ट्रैफिक कंट्रोल) से बात की. एटीसी ने फौरन ‘फोर्स लैंडिंग’ की हिदायत दी. मैं अगली सीट पर था, सब समझ में आ रहा था. मित्रगण पीछे थे, उन्हें कम समझ में आ रहा था. पर कोई गड़बड़ है, इतना तो सब समझ ही रहे थे. वहीं पास में एक छोटा गांव था. कभी-कभी हेलीकॉप्टर वहां उतरते थे. ऐसा लग रहा था, क्योंकि वहां एक टॉवर और ईंधन के कुछ ड्रम रखे थे. हेलीकॉप्टर ने हमें वहीं उतार दिया. उतरने के बाद हमने बाकी के मित्रों को बताया कि गड़बड़ क्या है. हम आगे नहीं जा सकते. कोई जोखिम न लेते हुए हेलीकॉप्टर हमें उतार सिमिकोट लौट गया. इस वायदे के साथ कि जल्दी ही गड़बड़ी सुधारकर वह दुबारा आ रहा है.

यह एक ऐसी जगह थी, जहां रुकने या रहने का कोई इंतजाम नहीं था. इस जगह हमारा फोन भी काम नहीं कर रहा था. खाने-पीने की दुकान नहीं थी. तब तक नेपाली सेना का एक सिपाही आ गया. मैंने उससे पूछा कि हमें नेपालगंज जाना था, वह कितनी दूर है? उसने कहा, ‘खच्चर पर जाएंगे तो पांच रोज में उस जगह पहुचेंगे. जहां से बस मिलेगी. और फिर बस दो दिन लगाएगी.’ यह सुनने को मन तैयार नहीं था. मैंने पूछा, अगर पीछे सिमिकोट जाना हो तो? वहां कम-से-कम ठहरने की तो जगह है. अपने चार साथी भी वहीं अटके पड़े हैं. इस विपत्ति में कम-से-कम साथ तो रहेंगे. सिपाही ने कहा, ‘पीछे जाने में भी खच्चर चार रोज लगाएगा.’ सुनकर हम सबके प्राण सूख गए.

 

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भोलेनाथ याद आने लगे. कहीं कोई गलती हुई है. भगवान ने यह संकट क्यों पैदा किया? यह परीक्षा की घड़ी थी. बाकी दुनिया से संपर्क नहीं हो पा रहा था. दिल्ली भी फोन नहीं कर पा रहा था. आखिर क्या करूं? तभी दिमाग चला. सिपाही से कहा कि वे अपने संचार माध्यम के जरिए अपनी अगली चौकी को सूचित करें और पता करें कि क्या उन्हें हमारे फ़ोर्स लैंडिंग की कोई सूचना मिली है. हमारे लिए कोई वैकल्पिक इंतजाम हो रहा है क्या?

किसी के पास पहनने-ओढ़ने का सामान भी नहीं है. शाम होने को है. ठंड बढ़ेगी. सूरज डूबा तो फिर हेलीकॉप्टर भी नहीं उड़ेगा. सिपाही ने ठहरने के लिए कहा कि गांव में ही किसी के घर इंतजाम करना होगा. चार परदेशियों को देख कुछ आवारा किस्म के नेपाली भी वहां आ गए थे. वे परम मस्त. उन्हें देखकर और भी डर लग रहा था. तब तक सिपाही दौड़ता हुआ आया. उसने बताया कि उनकी चौकी से सिमिकोट बात हो गई. एटीसी के पास यहां फोर्स लैंडिंग की सूचना है. आपके लिए एक ‘रेस्क्यू हेलीकॉप्टर’ आ रहा है. तब हमारी जान में जान आई.

फिर भी आंखें आसमान में टंगी थीं, अब तक हेलीकॉप्टर आया नहीं. कब आएगा? यकायक एक हेलीकॉप्टर आता दिखा. हमारी प्रसन्नता चेहरे और शरीर से फूट रही थी. नेपाल के ‘फिस्टेल एयर’ का हेलीकॉप्टर जैसे ही उतरा, हम उसकी ओर लपके. पायलट को देखकर लगा, वह कोई देवदूत है. हम फिर से ऊंचाइयां छू रहे थे. इस बार यह पायलट महोदय बहुत नीचे से उड़ रहे थे. हम पहले से ही डरे हुए थे. डर और बढ़ने लगा कि किसी चोटी से छू न जाए. डेढ़ घंटे के तनाव के बाद दूर नेपालगंज दिखने लगा. नेपालगंज में हमारी ‘हैप्पी लैंडिंग’ हुई. उधर हमारे दूसरे साथियों को रात भर सिमिकोट में ही रहना पड़ा, क्योंकि तब तक सूरज ढल चुका था. वहां हेलीकॉप्टर जा नहीं सकता था. हमें बताया गया कि वे सुबह आएंगे. हम नेपालगंज के होटल में उनका इंतजार कर रहे थे. सुबह-सुबह वे सभी आ गए.

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हमारा सपना पूरा हुआ. जो देखा, वह ज्ञान से परे था. जो भोगा, वह समझ से परे था. इस आश्चर्यलोक और पुण्यभूमि के विस्मय का बखान मेरे वश की बात नहीं है. ईश्वर को देखने के लिए मरना होता है. जो इस काया के साथ देखते हैं, सिद्ध होते हैं. न हम सिद्ध थे, न मरे. फिर भी अहसास किया. अगर इस अहसास का आपको सहभागी बना पाया तो यह मेरा पुण्य, नहीं बना पाया तो मेरी असफलता. लौटने के बाद भी मेरा बावरा मन मानने को तैयार नहीं था. वह वहीं रम रहा था. बार-बार मैं ईश्वर को धन्यवाद देता हूं. इतनी दूर से हमें बुलाया, प्रभु. प्रेरणा दी, ताकत दी. आपका कृतज्ञ हूं. उन आंखों का भी, जो यह सब देख सकीं; काया का, जिसने साथ दिया; मन का, जिसने यह तमाम अहसास ग्रहण किए. अब उसी मन से आपके लिए.

जारी … आखिर कैसे पहुंचें कैलास मानसरोवर? पढ़िए- यात्रा से पहले उठने वाले हर एक जरूरी सवाल का जवाब

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