जब कमला नेहरू बीमार थीं तब जवाहरलाल नेहरू एडविना से इश्क फरमा रहे थे – सच या झूठ ?

जवाहरलाल नेहरू को लेकर अक्सर सोशल मीडिया पर सच्चे-झूठे ज्ञान का प्रदर्शन चलता रहता है. बिन पांव की अफवाह की तरह ऐसे वायरल मैसेज हर कहीं दिख जाते हैं. ऐसी ही एक पोस्ट हमारी नज़र में आई जिसमें दावा किया गया कि जब कमला नेहरू टीबी से पीड़ित थीं , तब उनका ध्यान रखने के बजाय नेहरू एडविना माउंटबेटन के साथ प्रेम प्रसंग चला रहे थे. पेश है इस पोस्ट का फैक्ट-चेक.
Jawaharlal, जब कमला नेहरू बीमार थीं तब जवाहरलाल नेहरू एडविना से इश्क फरमा रहे थे – सच या झूठ ?

देश के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू को लेकर लिखे गए वायरल मैसेज आपने खूब पढ़े होंगे. उनसे इत्तफाक ना रखनेवाले बहुत सारे लोग अक्सर सोशल मीडिया पर ऐसे मैसेज फैलाते मिलते हैं. ऐसा ही एक मैसेज कई सालों से सोशल मीडिया पर खूब फैला है. हमने तय किया कि उसके सच की पड़ताल की जाए. पहले आप वो मैसेज पढ़िए और उसके बाद हम लिखते हैं उसका सच- झूठ.

Jawaharlal, जब कमला नेहरू बीमार थीं तब जवाहरलाल नेहरू एडविना से इश्क फरमा रहे थे – सच या झूठ ?

अब आपको बताते हैं कि इस मैसेज में कितना सच और कितना झूठ है.

पहली बात तो ये है कि एड्स संक्रमण से नहीं फैलता जबकि टीबी फैलता है, इसलिए उस बीमारी में मरीज़ को लोगों से अलग रखा जाना मजबूरी होती है. कमला नेहरू इसकी अपवाद नहीं थीं. पहले तो साल 1934 के अंतिम महीनों में सेहत खराब होने के बाद उनकी देखरेख के लिए इलाहाबाद के स्वराज भवन में डिस्पेंसरी बनवाई गई. नेहरू उस वक्त देश की कई जेलों में बंद रहे. अपनी आत्मकथा में वो खुद 1934 के अगस्त महीने का ज़िक्र करते हैं जब उन्हें ग्यारह दिनों के लिए देहरादून जेल से छोड़ा गया ताकि वो बीमार पत्नी को देखने के लिए जा सकें. अपनी आत्मकथा के अध्याय ‘ग्यारह दिन’ में वो विस्तार से जो लिखते हैं उससे कोई भी अनुभव कर सकता है कि अपनी पत्नी को खो देने का डर उन्हें कैसे परेशान रखता था. 11 दिन पत्नी के पास रहने के बाद उन्हें नैनी जेल में डाल दिया गया.

अपनी आत्मकथा के ‘फिर जेल में’ अध्याय में नेहरू बताते हैं किस तरह कमला की फिक्र ने उनके दिमाग से राजनीति को एकदम निकाल दिया. इसके बाद नेहरू को अल्मोडा ज़िला जेल में शिफ्ट कर दिया गया ताकि वो पास ही के भुवाली में इलाज कराने पहुंची अपनी पत्नी से मुलाकात करते रह सकें. खुद नेहरू लिखते हैं कि साढ़े तीन महीनों में वो 5 (भोवाली अस्पताल की रिकॉर्डबुक में 6 मुलाकात दर्ज हैं) बार कमला नेहरू से मिल सके, जबकि भारत मंत्री सर सेम्युअल होर अक्सर ये कहते रहते थे कि नेहरू को हफ्ते में एक या दो बार पत्नी से मिलने दिया जाता है. नेहरू ने इन मुलाकातों के लिए अंग्रेज़ी सरकार का शुक्रिया किया.

इसी अल्मोड़ा जेल में नेहरू ने अपनी आत्मकथा का अंत किया और उपसंहार में तारीख 25 अक्टूबर 1935 को लिखा कि पिछले महीने मेरी पत्नी भुवाली से यूरोप इलाज कराने गई है. उसके यूरोप चले जाने से मेरा मुलाकात करने के लिए भुवाली जाना बंद हो गया है. बाद के दिनों में उन्होंने किताब में जोड़ा था कि गत 4 सितंबर को एकाएक मैं अल्मोड़ा जेल से छोड़ दिया गया क्योंकि समाचार मिला था कि मेरी पत्नी की हालत नाज़ुक हो गई है. स्वार्ट्सवाल्ड (जर्मनी) के बेडनवीलर स्थान पर उसका इलाज हो रहा था. मुझसे कहा गया कि मेरी सज़ा मुल्तवी कर दी गई है और मैं अपनी रिहाई के साढ़े पांच महीने पहले छोड़ दिया गया. मैं फौरन हवाई जहाज से यूरोप को रवाना हुआ। (ये वो दौर था जब नेहरू को पहली बार आर्थिक संकट का सामना भी करना पड़ा. उन्होंने पत्नी के इलाज के लिए बड़ी मुश्किल से रुपए का इंतज़ाम किया. बिरला परिवार ने मदद का जो प्रस्ताव रखा वो नेहरू ने ठुकरा दिया।)

नेहरू पांच साल बाद अपनी आत्मकथा में छोटा सा हिस्सा जोड़कर बताते हैं कि बेडनवीलर में ही उन्होंने अपनी किताब को थोड़ा और विस्तार दिया था. कमला का देहांत हो जाने के बाद वो खुद को परिस्थिति के अनुकूल नहीं बना पाए. भीड़,कामकाज और अकेलेपन ने उनके जीवन में घर कर लिया.

बहरहाल नेहरू द्वारा दी गई जानकारी से पता चलता है कि कमला नेहरू को इलाज के लिए जर्मनी भेजा गया, ना कि पोस्ट लेखक के हिसाब से ‘प्राग में किसी दूसरे इंसान के साथ’. आत्मकथा से ही साबित होता है कि नेहरू का अपनी पत्नी से कितना प्रेम था. उनकी आत्मकथा में इस बात का ज़िक्र भी मिलता है कि स्वतंत्रता संघर्ष में व्यस्तता के बावजूद नेहरू कमला का इलाज कराने के लिए उनके साथ में कोलकाता तक की यात्रा करते थे, और तो और इससे पहले 1925 में कमला का कई महीनों तक लखनऊ में इलाज हुआ लेकिन जब डॉक्टरों ने साफ कहा कि उन्हें स्विट्ज़रलैंड ले जाया जाए तो नेहरू खुद अपनी पत्नी और बेटी इंदिरा को लेकर मार्च 1926 में बंबई से वेनिस रवाना हुए.  इस सफर में उनकी बहन और बहनोई भी थे. ज़ाहिर है कि वो अपनी पत्नी को लेकर बेहद संजीदा थे. वहां कमला नेहरू का इलाज स्विट्ज़रलैंड के जिनेवा और मोंटाना के पहाड़ी सेनिटोरियम में चला.

कमला जी का देहांत स्विट्ज़रलैंड के लोज़ान शहर (बेडनवीलर के बाद उनका इलाज यहां भी चला) में 28 फरवरी 1936 में हो गया था लेकिन पोस्ट लेखक के हिसाब से वो 10 साल तक सेनिटोरियम में रहीं जो सरासर मनगढ़ंत बात है. पोस्ट लेखक नेहरू पर इतना नाराज़ है कि लिखता है नेहरू उन दस सालों तक दिल्ली में एडविना से इश्क फरमाते रहे जबकि एडविना अपने पति के साथ दिल्ली की धरती पर 1947 में पधारीं. ये भी झूठ है कि कमला की बीमारी के दौरान नेहरू कई बार लंदन गए और एक बार भी उनका हालचाल नहीं लिया. ज़ाहिर है, नेहरू 1935-36 के दौरान ब्रिटेन कभी नहीं गए बल्कि दूसरी बार कांग्रेस का अध्यक्ष चुने जाने पर वो हवाई जहाज से हिंदुस्तान ही आए लेकिन पत्नी की एकदम खराब हो चुकी हालत की खबर पाते ही वो फिर से स्विट्ज़रलैंड की तरफ दौड़े.

कमला नेहरू को टीबी थी और विदेश में इलाज के लिए उन्हें अपनी बेटी और डॉक्टर मदन अटल के साथ भारत से वियना के लिए रवाना होना पड़ा था. जवाहरलाल नेहरू साथ में नहीं गए क्योंकि जेल में कैद थे. खुद कमला नेहरू कई बार जेल जाकर और अंग्रेज़ी सरकार की नज़रों में आकर देश की राजनीति में नाम कमा चुकी थीं. लिहाज़ा ऑस्ट्रिया के वियना में पहले से मौजूद सुभाषचंद्र बोस और एसीएन नांबियार ने उनका भारत की नेत्री के तौर पर स्वागत किया.

Jawaharlal, जब कमला नेहरू बीमार थीं तब जवाहरलाल नेहरू एडविना से इश्क फरमा रहे थे – सच या झूठ ?
नेहरू और सुभाष बंबई (अब मुंबई) में आयोजित कांग्रेस समिति की बैठक में एक साथ. (P.C. द हिंदू)

सुभाषचंद्र बोस और नेहरू कुछ मतभेदों के बावजूद बेहद करीबी दोस्त थे.अक्टूबर 1935 को सुभाष ने नेहरू को खत लिखकर कहा कि इस परेशानी में मैं आपके जिस काम भी आ सकूं मुझे बताइएगा. देश में अंग्रेज़ों से टकरा रहे नेहरू की सबसे अच्छी मदद यही हो सकती थी कि सुभाषचंद्र बोस कमला नेहरू का ख्याल रखते.उन्होंने यही किया. वो कमला नेहरू के साथ बर्लिन तक आए. उन्होंने इसके बाद कमला की बीमारी और इलाज का लगातार जायज़ा लिया. अक्टूबर के अंत में सुभाष कमला को देखने के लिए बीडनवेलर भी आए, और आखिर में जब कमला नेहरू ने दम तोड़ा तो वो लोज़ान शहर में ही मौजूद थे. जवाहरलाल नेहरू भी पत्नी के साथ ही थे, ठीक उस वायरल मैसेज के दावे के उलट जिसमें उन्हें एडविना से इश्क फरमाते बताया गया है.

सुभाष ने कमला नेहरू के अंतिम संस्कार में भी काफी मदद की. परदेस में ऐसे मुश्किल वक्त में नेहरू और सुभाष एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए. ये वही दौर था जब सुभाषचंद्र बोस यूरोप में घूमकर लोगों से मिल रहे थे. सुभाष ने कठिन समय में जवाहरलाल नेहरू का हौसला बढ़ाया जो कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष थे. आगे चलकर नेहरू ने भी सुभाष का समर्थन किया और वो अध्यक्ष बने, हालांकि बाद में दोनों के वैचारिक मतभेद तेज़ी से उभरे भी।

इतनी बातों से कई चीज़ें स्पष्ट होती हैं। एक तो ये कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस यूरोप में कमला नेहरू के साथ ज़रूर थे लेकिन इसकी वजह नेहरू की पत्नी के प्रति बेरुखी नहीं थी. वो दोस्त का फर्ज़ अदा कर रहे थे. दूसरी बात, नेहरू लगातार कमला नेहरू के साथ उनकी मौत तक बने रहे, बस बीच में उनकी तबीयत थोड़ी सुधरने के दौरान कांग्रेस का काम संभालने के लिए भारत आए. तीसरी बात, मैसेज में उल्लिखित बुसान जैसा कोई शहर स्विट्ज़रलैंड में है ही नहीं. चौथी बात, नेहरू अपने पैसों से कमला नेहरू का इलाज करा रहे थे जबकि वो भारी आर्थिक तंगी से गुज़र रहे थे. सुभाषचंद्र बोस को कमला के इलाज के लिए रकम नहीं जुटानी पड़ी. पांचवीं बात, नेहरू ने कमला नेहरू की अस्थियां भारत लाकर त्रिवेणी में बहाई जिससे स्पष्ट होता है कि उनके मन में पत्नी को लेकर प्रेम और सम्मान अंत तक रहा. अपनी आत्मकथा में वो पत्नी के जाने के बाद अपनी बेहाली का विस्तृत ज़िक्र करते हैं.

संदर्भ-  मेरी कहानी (नेहरू की आत्मकथा), NEHRU & BOSE (Parallel Lives), FEROZE the forgotten GANDHI), अहा ज़िंदगी (नवंबर 2016), टाइम्स ऑफ इंडिया 14 नवंबर 2014

(लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के निजी हैं)

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