विचार से बचेगा विश्व: कोरोनावायरस महामारी के दौर में फिर रक्षक बनकर उभरी भारतीय संस्कृति

प्रकृति के संसाधनों (Natural Resources) पर कब्जा करने की मानसिकता ने पर्यावरण पर संकट खड़ा किया है. प्रकृति के साथ अमानवीय व्यवहार के कारण पहले भी अनेक रोग जैसे स्वाइन फ्लू, सार्स, इबोला, मैडकाऊ आदि हम देख चुके है. आज का कोरोना संकट (Coronavirus) भी इस मानसिकता से ही उपजा है.
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कोरोनावायरस संक्रमण से विश्व लंबे अंतराल से जूझ रहा है. विश्व भर के लगभग 180 देश इसकी गिरफ्त में आ गए हैं. फिलहाल 40 लाख से ज्यादा लोग संपूर्ण दुनिया में संक्रमित हैं. 2 लाख 77 हजार लोग मृत्यु के शिकार हो चुके हैं. भारत में करीब 60 हजार लोग संक्रमित हुए और दो हजार लोगों की मृत्यु अब तक हो चुकी है .

लॉकडाउन के कारण समस्त विश्व अपने ही घरों में ठहर गया है. आवागमन के सभी साधन अवरुद्ध होने के कारण प्रदूषण मुक्त वातावरण निर्माण हो गया है. नदियों का जल शुद्ध एवं निर्मल होकर बह रहा है. सैकड़ों वर्ष पूर्व जैसा शुद्ध नदियों का जल दीखता था वैसा ही अब दिख रहा है. पर्यावरण शुद्ध एवं आकाश स्वच्छ होने के कारण हिमालय दूर से ही दिखने लगा है. पशु-पक्षी चहचहाने लगे हैं. पक्षियों का कलरव अब सुनाई देता है. जंगली जानवर अब जंगल से निकलकर निर्भीक होकर शहरों की सीमा तक घूम रहे हैं. इस संकट ने इस बात का आभास करा दिया है कि सारे संकट की जड़ में मनुष्य की अपरिमित इच्छायें ही हैं.

कोविड-19 महामारी के दौर में प्रश्नों के दायरे में चीन

चीन के वुहान शहर से प्रारंभ हुआ यह संकट हमें एक नई दिशा में विचार करने के लिए प्रेरित करता है. दुनिया भर में यह शोध का विषय बना हुआ है कि यह वायरस चीन की प्रयोगशाला में तैयार किया हुआ मानव निर्मित है अथवा चमगादड़ से निकला प्राकृतिक. इस प्रश्न का उत्तर तो भविष्य ही बताएगा. विश्व भर के संसाधनों पर कब्जा करने की होड़ एवं अपने वर्चस्व को निर्माण करने की प्रवृत्ति के कारण चीन को जो संयमित व्यवहार दिखाना चाहिए था वह प्रश्नों के दायरे में है. रोग को छुपाना एवं विश्व भर में रोग न फैले, इसके लिए समय पर सचेत न करना दोनों ही अपराध के श्रेणी मे आने चाहिए. विश्व भर में रोग फैलने के बाद स्वास्थ्य संबंधित संसाधनों की बिक्री में घटिया माल देना, यह व्यापार बुद्धि का ही लक्षण है एवं अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को बर्बाद करने की ही मनोवृति का परिचायक है.

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दुनिया का सबसे समृद्धशाली देश अमेरिका कोरोना संक्रमण से सबसे अधिक प्रभावित है. स्वास्थ्य सेवाओं की उत्तम व्यवस्थाओं के लिए पहचाने जाने वाले यूरोपीय देश अपने नागरिकों को बचाने में अक्षम दिखाई दे रहे हैं. अनेक ने हर्जाने के लिए चीन पर आर्थिक दावा भी किया है. अपना पड़ोसी पाकिस्तान अपने देश में कोरोना संक्रमण से अपने नागरिकों की रक्षा करने के स्थान पर भारत में आतंकी भेज रहा है.

गलाकाट प्रतिस्पर्धा के पीछे पूंजीवाद और साम्यवाद

दुनिया के सभी देश वे पूंजीवादी, साम्यवादी एवं समाजवादी किसी भी व्यवस्था का अनुपालन करते हो उन्होंने अपनी व्यवस्था में अर्थ को ही प्रधानता दी है. पूंजीवादी अर्थव्यवस्था पहले आर्थिक संसाधनों पर कब्ज़ा जमाती है एवं बाद में राज्य पर कब्ज़ा करती है. पूंजीवाद एवं साम्यवाद स्वामित्व की भावना से ओत-प्रोत है. इस कारण उनका सारा व्यवहार शोषणवादी मानसिकता को जन्म देता है. हमारा ही वर्चस्व संपूर्ण विश्व में हो इस मानसिकता से एक गलाकाट प्रतिस्पर्धा का जन्म हुआ है. प्रकृति के संसाधनों पर कब्जा करने की मानसिकता ने पर्यावरण पर संकट खड़ा किया है. प्रकृति के साथ अमानवीय व्यवहार के कारण पहले भी अनेक रोग जैसे स्वाइन फ्लू, सार्स, इबोला, मैडकाऊ आदि हम देख चुके है. आज का कोरोना संकट भी इस मानसिकता से ही उपजा है.

योग के बाद अब दुनिया में स्थापित हो रहा आयुर्वेद

देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मन की बात के अपने उद्बोधन में उल्लेख किया कि संकट को अवसर में बदलें और एक नए प्रकार की व्यवस्था का सृजन करें. उन्होंने कहा कि जैसे दुनिया ने योग को स्वीकार किया, वैसे ही हम इस समय आयुर्वेद को भी विश्व मे स्थापित कर सकते हैं. आयुर्वेद आयु को बढाने वाला एवं “सर्वे सन्तु निरामया:” (सभी निरोगी हो) का विचार करने वाला चिकित्सा शास्त्र है. जिसका उपचार अतिरिक्त प्रभाव (Side Effect) नही देता. इस समय अनेक विद्वान कहने लगे हैं कि अब हमारी व्यवस्था का आधार स्वदेशी होना चाहिए . गांधी जी ने कहा था, ” पश्चिम की व्यवस्था मनुष्य की आत्मा की महाशत्रु है.” जब आज विश्व में नए सिरे से विचार करने की चर्चा चली है तब भारतीय चिंतन के आधार पर मानव मात्र के कल्याण का विचार ही उस स्थान की पूर्ति कर सकता है.

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स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी और प्रयास बाकी

किसी गीतकार ने लिखा है, ” यह न भूलो इस जगत में सब नहीं है संत मानव, व्यक्ति भी है, राष्ट्र भी है जो प्रकृति के घोर दानव.” इस तथ्य को समझकर इन सब शक्तियों के समकक्ष खड़े होने के लिए हमको अपने देश को सक्षम एवं समर्थ बनाना होगा. सामरिक एवं आर्थिक दोनों ही दृष्टि से हमको शक्तिशाली होना है. स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी हमारी व्यवस्थाएं विश्व मानकों के समकक्ष होनी चाहिए. गत कुछ दिनों में सभी क्षेत्रों में अनेक योजनाएं आई हैं. स्वास्थ्य के क्षेत्र में आयुष्मान योजना, रक्षा के क्षेत्र में शस्त्रों की खरीद, गरीब कल्याण के प्रयास सराहनीय है, लेकिन अभी के अनुभव से लगता है इन क्षेत्रों में अभी और भी प्रयास होने बाकी हैं.

स्वदेशी की भावना से होगा विकेंद्रित विकास

गांधी जी ने कहा कि स्वदेशी की हमारी भावना का अर्थ है – “हमारी वह भावना जो हमें दूर के क्षेत्र को छोड़कर अपने समीपवर्ती प्रदेश का ही उपयोग और सेवा करना सिखाती है.” कोरोना संक्रमण में देश के सम्मुख प्रवासी मजदूरों का एक गंभीर विषय है. उनकी सुरक्षा एवं भोजन व्यवस्था को लेकर सभी राज्य चिंतित है. वास्तव में हमको स्वदेशी एवं विकेंद्रित इस प्रकार की अर्थव्यवस्था खड़ी करनी होगी जिसमें पर्यावरण संरक्षण एवं रोजगार दोनों हो सके. रोजगार का विचार करते समय हमें विचार करना होगा कि रोजगार के लिए व्यक्ति को अपना घर एवं परिवार छोड़ना न पड़े.

उत्तर प्रदेश सरकार का ‘One District One Product’ उस दिशा मे एक कदम है. इससे स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा मिलेगा, लेकिन हमें इतने पर ही संतुष्ट होने के बजाय और छोटे स्तर पर संकुलशः विचार करना चाहिए. घर से अधिक लंबे समय दूर रहने के कारण परिवार से अलगाव, वृद्ध माता-पिता की सेवा से दूरी एवं सामाजिक विघटन जैसे दोष निर्माण होते हैं . इसलिए महान विचारक पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने कहा था कि रोजगार की व्यवस्था ऐसी हो कि व्यक्ति कार्य करने के बाद रात्रि को अपने परिवार में आ सके.

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दुनिया की मदद करना भारतीय संस्कृति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी मन की बात में पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के विचारों मे उल्लेखित प्रकृति, विकृति एवं संस्कृति की चर्चा की है. जहां दुनिया ने विकृति एवं प्रकृति तक ही अपना व्यवहार सीमित किया, वहीं भारत ने अपने स्वभाव के अनुसार स्वास्थ्य संबंधी सामग्री दुनिया के देशों को उपलब्ध कराकर संस्कृति निष्ठ व्यवहार का परिचय दिया है. दुनिया ने नरेंद्र मोदी एवं भारत की जनता को “Thank You People Of India” कहकर भारत के व्यवहार की सराहना की है. भारतीय चिंतन में प्रकृति को मां मानने की जो दृष्टि है वह हमारा संबंध वृक्ष, नदी एवं जीवों से जोड़ती है. “ईशावास्यमिदं सर्वं” के आधार पर हम सभी प्राणी जगत में एक तत्व का दर्शन करते हैं.

इसलिए पृथ्वी हमारे लिए बाजार नहीं परिवार है. हम भोग नहीं त्याग पूर्ण जीवन दृष्टि से युक्त है. हम शोषण नहीं पोषण के पक्षधर हैं. हमारे संस्कार मे विकार नही सहकार है. हम ईश्वर के प्रति विश्वासी हैं. इस कारण हम संकट में दूसरो के सहयोगी बनते हैं. ‘तेन त्यक्तेन भुंजीथा’ अर्थात त्याग पूर्वक उपभोग यह हमारी जीवन दृष्टि है. “त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्, ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्” अर्थात् कुल के लिए अपना, समाज एवं राष्ट्र के लिए कुल का एवं मानवता के लिए सर्वस्व त्याग हमारा जीवन आदर्श है.

आज मानवता के सम्मुख जो संकट खड़ा है उस संकट में हम एवं हमारा विचार ही मानवता को बचा सकता है. हम भारत वर्ष को शक्तिशाली बनाकर एवं अपनी संस्कृति का गौरव लेकर खड़े हों यही समय की मांग है. अर्नाल्ड टॉयनबी ने कहा था, “भारत की उदारता एवं विशाल दृष्टि मानव की एकता की सिद्धि में उसकी विशेष देन होगी और मेरा विश्वास है कि विश्व की भावी पीढ़ियां संयुक्त मानव जाति के लिए इसे भारत की एक विशेष भेंट के रूप में स्वीकार करेंगी.” आओ हम सभी इस कर्त्तव्य को पूर्ण करने का संकल्प लें.

– राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री, भाजपा

(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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