लेफ्ट, लिबरल हो या राइटिस्ट, सभी को है सोशल मीडिया से दिक्कत

उत्तर प्रदेश, केरल, असम, पश्चिम बंगाल, इन सब जगहों पर लोग मुख्यमंत्री पर पोस्ट करके अरेस्ट हो चुके हैं.

अभिव्यक्ति की आजादी भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत दिया गया सिर्फ एक अधिकार नहीं है. इसकी पहुंच बहुत दूर तक है. कायदे से कहा जाए तो लोकतंत्र टिका ही इस पर है. इस लाइन पर आगे बढ़ने से पहले आंकड़ों से शुरुआत करते हैं.

1. असम में मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल को लेकर ट्विटर पर टिप्पणी करने वाले बीजेपी के ही आईटी सेल के सदस्य को अरेस्ट किया गया. पुलिस के मुताबिक नीतू बोरा नाम के इस शख्स ने सीएम पर अभद्र टिप्पणी करने के अलावा सांप्रदायिक बातें लिखी थीं. साथ में लिखा था कि बीजेपी सरकार प्रवासी मुस्लिम से स्थानीय असमियों की रक्षा करने में नाकाम है और इसके जिम्मेदार सोनोवाल हैं. पुलिस ने बोरा के अलावा तीन और लोगों को इसी तरह के आरोपों में गिरफ्तार किया.

Yogi Adityanath, लेफ्ट, लिबरल हो या राइटिस्ट, सभी को है सोशल मीडिया से दिक्कत

2. केरल में मुख्यमंत्री पिनराई विजयन के खिलाफ सोशल मीडिया पर अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोप में पुलिस ने पिछले 3 साल में 119 लोगों को अरेस्ट किया है. इनमें से 12 लोग सरकारी कर्मचारी हैं. 29 लोगों पर विभागीय जांच बैठी हुई है. ये आंकड़े खुद सीएम विजयन ने विधानसभा में दिए थे.

Yogi Adityanath, लेफ्ट, लिबरल हो या राइटिस्ट, सभी को है सोशल मीडिया से दिक्कत

3. उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से संबंधित एक वीडियो शेयर करने के आरोप में पुलिस ने एक पत्रकार को दिल्ली से उठा लिया. मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और कोर्ट ने पत्रकार को छोड़ने का आदेश दिया. उसी वीडियो पर स्टोरी करने के जुर्म में दो और पत्रकारों को जेल में अभी तक बंद कर रखा है. बीजेपी के ही एक विधायक ने एक चैनल के पत्रकार को थप्पड़ मारा और खबर चलाने पर गोली मारने की धमकी दी.

Yogi Adityanath, लेफ्ट, लिबरल हो या राइटिस्ट, सभी को है सोशल मीडिया से दिक्कत

4. पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का एक meme बनाकर शेयर करने के चक्कर में पिछले महीने एक महिला को अरेस्ट किया गया. प्रियंका शर्मा नाम की ये महिला भारतीय जनता युवा मोर्चा से जुड़ी हुई है. कोर्ट ने माफी मांगने की शर्त पर प्रियंका शर्मा को रिहा करने का आदेश दिया. प्रियंका ने कहा कि मैं माफी नहीं मांगूंगी, केस लड़ूंगी.

Yogi Adityanath, लेफ्ट, लिबरल हो या राइटिस्ट, सभी को है सोशल मीडिया से दिक्कत

ये चार राज्य, चार सरकारों, चार मुख्यमंत्रियों से संबंधित आंकड़े हैं. दो मुख्यमंत्री बीजेपी के हैं, एक टीएमसी की और एक कम्युनिस्ट पार्टी का है. विचारधारा की भिन्नता के अलावा जो चीज इनमें कॉमन है वो है इंटॉलरेंस. मुख्यमंत्री वामपंथी हो, दक्षिणपंथी या लिबरल हो, किसी को अपनी आलोचना सुनना बर्दाश्त नहीं है. जहां प्रधानमंत्री बताते हैं कि उनकी सेहत का राज ये है कि वो रोजाना एक दो किलो गाली खाते हैं. वहीं के मुख्यमंत्री गाली छोड़िए, हल्की सी आलोचना पर भी सीधे अंदर करा देते हैं.

सवाल ये है कि क्या सवाल करना इतना खतरनाक है? क्या सवाल या आलोचना में इतनी पावर है कि उससे मुख्यमंत्रियों का सिंहासन डोलने लगता है और वो अपनी पुलिस को काम पर लगा देते हैं. जिन्हें वोट देकर हम जिम्मेदारी सौंपते हैं उन्हीं का नाम नहीं ले सकते. आम आदमी अब अपने मुख्यमंत्री का नाम लिए बिना आलोचना कर सकता है क्या? जय जयकार करने के अलावा अपनी समस्या भी कह सकता है क्या? ये सारे सवाल हैं जो पूछे जाने चाहिए लेकिन पूछने में रिस्क है, पुलिस उठा सकती है.